वैदिक काल : महाकाव्य काल- महाभारत - Vedic Period: Epic Period - Mahabharata

वैदिक काल  : महाकाव्य काल- महाभारत - Vedic Period: Epic Period - Mahabharata


महाभारत वेदव्यास द्वारा संकलित एक विशाल ग्रंथ है। यह मुख्य तौर पर काव्य न होकर ऐतिहासिक गाथाओं का संग्रह है। इस समय के महाभारत ग्रंथ में श्लोकों की संख्या लगभग एक लाख है। इसीलिए इसे "शतसाहस्त्री संहिता' भी कहते हैं। महाभारत ग्रंथ में समय-समय पर नए आख्यानों का समावेश होता रहा। प्रारंभ में महर्षि व्यास ने अपने शिष्य के सम्मुख इस कथा का प्रवचन किया था। इस मूलग्रंथ का नाम 'जय' था। समय के साथ-साथ उसमें अनेक प्रकरण जोड़े गए। धीरे-धीरे वह शतसाहस्त्री संहिता बन गई। इस महाकाव्य का प्रधान विषय कौरवों और पाण्डवों के बीच उस महायुद्ध का वर्णन है,

जो कुरुक्षेत्र के रणक्षेत्र में लड़ा गया। तथापि प्रसंगवश उसमें भारत की प्राचीन ऐतिहासिक अनुश्रुति, तत्वज्ञान, धर्मशास्त्र, राजधर्म और मोक्षशास्त्र का भी विस्तृत समावेश हैं। अतः इसे प्राचीन भारतीय ज्ञान का विश्वकोश भी माना जाता है। भगवान श्रीकृष्ण की 'भगवद्गीता' भी महाभारत का ही एक अंग है। तत्वज्ञान और धर्म की दृष्टि से गीता संसार की उत्कृष्ट पुस्तक है। वैदिक युग से भारत में ज्ञान और तत्वचिंतन की उत्पन्न लहर इस काल तक चरम सीमा छू चुकी थी। महाभारत के अनुशीलन द्वारा सभ्यता और संस्कृति का चित्र पूरे समाज को परिलक्षित करता है।


राजनीतिक अवस्था


महाभारत में राज्य की उत्पत्ति के विषय में पर्याप्त सामग्री प्राप्त होती है। इसके अनुसार एक स्वर्ग युग वाले समाज में धर्म भावना से सभी मनुष्य सुख-शांति से रहते थे,

परंतु धीरे-धीरे राजा और दंड व्यवस्था के न होने के कारण अराजकता फैलने लगी, जिसके कारण देवता ब्रह्मा के पास गए। व्यवस्थित करने के लिए ब्रह्मा ने एक नीतिशास्त्र की रचना की और संसार में धर्माचरण की प्रतिष्ठा कराने के लिए एक मानसपुत्र उत्पन्न किया। इस प्रकार संसार में राज्य और राजा की उत्पत्ति हुई। आंशिक रूप से यह राज्य की दैवी उत्पत्ति का सिद्धांत था।


महाकाव्य भी राजतंत्र को ही प्रमुख शासन तंत्र मानते हैं। महाभारत का कथन है कि भिन्न-भिन्न अवस्थाओं में जो धर्म-समन्वित हो उसी को राजा समझना चाहिए। उसका ध्येय प्रजा का हित होना चाहिए।


धर्म राजा के ऊपर सबसे बड़ा अंकुश था। राजा को न्याय और नैतिकता के सिद्धांतों पर चलना पड़ता था। अत्याचारी राजा को लोगों द्वारा पदच्युत किया जा सकता था। राजा पर मंत्री परिषद का भी अंकुश था। राज्याभिषेक के समय राजा को प्रजा का धर्मपूर्वक पालन करने की प्रतिज्ञा लेनी पड़ती थी। राजा महत्वपूर्ण कार्यों के लिए मंत्री परिषद पर निर्भर रहता था। प्रत्येक महत्वपूर्ण विषय इसके समक्ष रखे जाते थे, परंतु कुछ विषय अत्यंत गुप्त और गंभीर होते थे। महाभारत में आठ मंत्रियों की आवश्यकता की चर्चा की गई है। मंत्री परिषद के अमात्यों की संख्या अधिक होती थी, वे महत्वपूर्ण राजकीय विषयों पर राजा को सलाह देते थे। रामायण में भी मंत्री परिषद की आवश्यकता पर बल दिया गया है। देश में राज पुरोहित विशेष परामर्शदाता होता था।


प्रशासन संचालन के लिए राजा के अधीन अनेक उच्च अधिकारी होते थे। रामायण में इनकी संख्या


अठारह मिलती है, संयोग से महाभारत में भी प्रमुख पदाधिकारियों की संख्या अठारह बताई गई है जिनमें प्रमुख होते थे— मंत्री, पुरोहित, युवराज, सेनापति, द्वारपाल, न्यायाधीश, नगराध्यक्ष, कारागाराधिकारी राजा के पास एक संगठित सेना होती थी, जो देश की रक्षा करती थी। सेना में पैदल, अश्वारोही,


गजारोही, रथी होते थे। राजा सर्वोच्च सेनापति होता था एवं युद्ध में नेतृत्व करता था। इस समय का रणविधान


बहुत नैतिक होता था। राजतंत्र के अतिरिक्त महाकाव्य गणतंत्र का भी उल्लेख करते हैं। ये दो प्रकार के थे कुछ तो अकेले गणतंत्र थे और कुछ गणतंत्रों के समूह थे।


सामाजिक अवस्था


महाकाव्यकालीन समाज में वर्ण व्यवस्था प्रतिष्ठित थी। ब्राह्मणों की उत्कृष्टता की भावना स्वीकार कर ली गई थी। समाज को चार वर्णों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र) में विभक्त करके उनके संबंध में यह विचार विकसित हो गया था कि समाज का कल्याण इसी में है कि सब लोग अपने धर्म (कार्य) में स्थिर रहें, परंतु महाभारत में यह भी विचार मिलता है कि चारों वर्णों की सृष्टि गुण और कर्म के अनुसार ही की गई है। कुछ लोग अपने वर्ण के कर्म से विमुख होने पर भी उच्च स्थिति प्राप्त कर लेते थे । वर्ण व्यवस्था का जो विकृत रूप बाद के इतिहास में देखने को मिलता है, उसका सूत्रपात इस युग में हो गया था। महाभारत में अनेक स्थानों पर दास-दासियों का भी उल्लेख मिलता है।


रामायण और महाभारत में स्त्रियों की स्थिति के विषय में अनेक विचार मिलते हैं। राजा दशरथ की तीन पत्नियाँ होने से यह पता चलता है कि इस युग में बहु विवाह की प्रथा प्रचलित थी। महाभारत की कथा में द्रौपदी के पाँच पति थे।


विवाहों के प्रकार


महाभारत व उत्तरवैदिक युग के अन्य साहित्य में आठ प्रकार के विवाहों का उल्लेख मिलता है- ब्रह्म विवाह जब पिता अपनी कन्या को वस्त्र एवं आभूषणों से सुसज्जित कर किसी योग्य वर को प्रदान


करें, तो इस प्रकार के विवाह को ब्रह्म विवाह कहा जाता था। दैव विवाह यज्ञ कराने वाले पुरोहित को अलंकार आदि से विभूषित कन्या प्रदान करके जो विवाह किया जाता था, उसे 'दैव विवाह' कहा जाता था।


प्रजापत्य विवाह जब वर और कन्या का विवाह प्रजापत्य धर्म की वृद्धि (संतोनोपत्ति) के लिए किया


जाए, पिता इसी उद्देश्य से कन्या दान करे, तो प्रजापत्य विवाह' कहा जाता था ।

वस्तुतः ब्रह्म और प्रजापत्य में कोई अंतर नहीं है। आर्श विवाह इसमें वर की ओर से कन्या को गौ आदि भेंट में देनी होती थी। वधू की प्राप्ति के लिए वर कन्या पक्ष को दक्षिणा देता था।

गंधर्व विवाह परस्पर स्वच्छंद प्रेम के कारण वर और कन्या अपनी इच्छा से जो विवाह करते थे, उसे गंधर्व विवाह कहते थे।


असुर विवाह- कन्यापक्ष को भरपूर धन देकर संतुष्ट कर कन्या प्राप्त करके जो विवाह होता था, उसे असुर विवाह' कहा जाता था। राक्षस विवाह कन्या का जबर्दस्ती अपहरण कर जो विवाह होता था, 'राक्षस विवाह' कहलाता था।


पैशाच विवाह बेहोश, रोती हुई अथवा पागल कन्या के साथ समागम किया जाता था एवं इस प्रकार के विवाह को पैशाच विवाह' कहते थे।

आठ विवाह प्रकारों में ब्रह्म, दैव, आर्श और प्रजापत्य को धर्म माना जाता था। कुछ गंधर्व को भी


धर्म एवं कुछ अधर्म मानते थे। शेष तीन विवाह प्रकार असुर, राक्षस और पैशाच अधर्म माने जाते थे। इस काल में नियोग प्रथा प्रचलित थी। कुछ सूत्रकारों के अनुसार विधवा स्त्री पुत्र प्राप्ति की इच्छा से अपने देवर के साथ संबंध स्थापित कर सकती थी। महाभारत में नियोग के अनेक दृष्टांत मिलते हैं। पांडवों की माता कुंती ने युधिष्ठिर एवं अन्य पुत्रों को नियोग द्वारा ही जन्म दिया था।


स्त्रियों की स्थिति संतोषजनक थी। उसे पुनर्विवाह और संबंध विच्छेद का भी अधिकार था। पर्दा प्रथा न होने के कारण वह धार्मिक और सार्वजनिक कार्यों में अपने पति का सहयोग दे सकती थी। वह वेदाध्ययन की अधिकारिणी भी थी।


इस काल में शिक्षा दो प्रकार से होती थी— गुरुकुलों में अथवा घर पर रखे गए आचार्यों द्वारा । रामायण में भारद्वाज एवं वाल्मीकि के आश्रमों के बारे में उल्लेख किया गया है। महाभारत में मारकंडेय और कण्व के आश्रमों का वर्णन मिलता है। इन आश्रमों में शिष्य गुरु के निरीक्षण में अपनी बौद्धिक उन्नति करते थे। दूसरी शिक्षा प्रणाली के अंतर्गत द्रोणाचार्य हस्तिनापुर में रहकर कौरव और पांडव राजकुमारों को धनुर्विद्या सिखाते थे। इस काल में वैदिक शिक्षा का विशेष महत्व था।


आर्थिक अवस्था


महाकाव्यों से कृषि कर्म पर प्रचुर प्रकाश पड़ता है। कृषि और पशु पालन इस काल में भी मुख्य व्यवसाय थे। इस काल में कृषि कर्म हल की सहायता से होता था।

रामायण के वर्णन के अनुसार राजा जनक को खेत में सीता प्राप्त हुई थी। हल लकड़ी का होता था और उसका फाल लोहे का । कृषि के अन्य उपकरणों जैसे कुदाल, हँसिया आदि की भी महाकाव्यों में चर्चा मिलती है। कृषकों को उपज का 1/10 से लेकर 1/6 भाग तक देना पड़ता था। इस काल में पशुओं के स्वभाव, गुणों, रोगों और विशेषताओं के बारे में भी ज्ञान था।


कृषि और पशु पालन के अतिरिक्त समाज में अन्य व्यवसाय भी थे। तंतुवाय और कंबलकार सूती और ऊनी वस्त्रों का भी व्यवसाय करते थे। स्वर्णकार और मणिकार विविध आभूषणों का निर्माण करते थे। इसके अतिरिक्त महाकाव्यों में लोहकार, कुंभकार, चर्मकार, वैद्य, मालाकार, रजक आदि अनेक अन्य व्यवसायियों का उल्लेख मिलता है।

इस समय अधिकांश व्यवसायी श्रेणियों में संगठित थे। इन श्रेणियों के अध्यक्ष को 'मुख्य' कहते थे। ग्राम या गाँव अब भी आर्थिक व्यवस्था की प्रमुख इकाइयाँ थे। देशी और विदेशी व्यापार की भी चर्चा महाकाव्यों में की गई है। साधारण लोग सूती कपड़े ही पहनते थे, परंतु रेशमी और ऊनी वस्त्र भी बुने जाते थे। लोगों को कढ़ाई और रंगाई का ज्ञान भी था। राज्य की ओर से व्यवसायियों तथा शिल्पियों की सहायता की जाती थी।


धार्मिक अवस्था


इस युग में कुछ महत्वपूर्ण धार्मिक परिवर्तन हुए। वैदिक देवताओं का स्थान मुख्य तौर पर ब्रह्मा, विष्णु और शिव ने ले लिया। इस प्रकार इसी युग में त्रिमूर्ति का उत्कर्ष हुआ। नई देवियों में दुर्गा,

पार्वती आदि की भी आराधना आरंभ हो गई। गणेश की पूजा भी होने लगी। इस युग ने वीर पुरुषों को देवता के पद पर प्रतिष्ठित किया। इस प्रकार राम और कृष्ण को अवतार मानकर उनकी पूजा होने लगी। अब आर्यों में यह धारणा उत्पन्न कि जब अन्याय और अनाचार में वृद्धि होती है तब विष्णु मानव का रूप धारण करके पृथ्वी पर अवतरित होते हैं और मानव समाज को अत्याचारियों से मुक्त करते हैं।


धार्मिक दृष्टि से महाकाव्य काल भक्ति प्रधान था। भागवत धर्म से संबंध रखने वाले अनेक उपाख्यान महाभारत में विद्यमान हैं, पर उसका उत्कृष्ट रूप गीता में मिलता है।

गीता का उपदेश कृष्ण ने कुरुक्षेत्र में अर्जुन को दिया था। कृष्ण ने कहा है कि मोक्ष और मुक्ति की प्राप्ति कर्म के आधार पर होती है। गीता में जहाँ निष्काम-कर्म और स्वधर्म पर जोर दिया गया है, वहाँ साथ ही भक्ति की भी बहुत महिमा बताई गई है। याज्ञिक कर्मकाण्ड का विरोध करते हुए गीता में यज्ञ का नया स्वरूप प्रस्तुत किया गया है। गीता की सम्मति में तपोयज्ञ, स्वाध्याय-यज्ञ, ज्ञान यज्ञ आदि ही वास्तविक यज्ञ हैं। इनके अनुष्ठान के लिए विधि-विधानों की आवश्यकता नहीं। ज्ञान प्राप्ति स्वाध्याय, चरित्र-शुद्धि और संयम द्वारा ही इस यज्ञ का अनुष्ठान होता है। कोई भी व्यक्ति चाहे किसी भी जाति या वर्ण का क्यों न हो, अच्छे कर्म करके तथा आत्मसंयम


रखकर धीरे-धीरे ईश्वर को प्राप्त कर सकता है। इस काल में भागवत धर्म की प्रधानता बढ़ने लगी थी। इस युग में बलि देने का प्रचलन था, जिसमें पशुओं के साथ-साथ मनुष्य की बलि भी दी जाती थी।

इस युग में धीरे-धीरे अहिंसा धर्म का विकास होने लगा था।


महाकाव्य काल विज्ञान तथा दर्शन के क्षेत्र में उन्नति का काल था । कर्मवाद, अवतारवाद, भक्ति मार्ग आदि सिद्धांतों की व्याख्या इस समय की गई। इस काल में विज्ञान में भी काफी उन्नति हुई। ज्योतिष विद्या में अनेक नए-नए ग्रहों का पता लगाया गया था। मनुस्मृति के द्वारा इस काल में मनुष्यों को जीवन व्यतीत करने के अनेक नियमों पर प्रकाश डाला गया था। मनुष्यों, पशुओं एवं पक्षियों के लिए औषधियों का निर्माण किया गया था। इस काल में भवन निर्माण कला में उन्नति हुई थी।