गुप्त काल में नारी - women in the Gupta period

गुप्त काल में नारी - women in the Gupta period


गुप्तकालीन समाज में नारियों की स्थिति उत्तरवैदिक काल की अपेक्षा पतित होती प्रतीत होती है। बाल-विवाह की प्रथा प्रारंभ हो जाने से सामान्यता नारियों के लिये उच्च शिक्षा का द्वार अवरूद्ध हो गया होगा। कन्याओं का उपनयन संस्कार और वैदिक शिक्षा बंद हो गयी थी, फिर भी मनुस्मृति में पुरुषों के समान ही स्त्रियों के शिक्षण और पालन-पोषण का मत प्रतिपादित किया है। स्त्री शिक्षा की ओर ध्यान दिया जाता था। सुखी और समृद्धशाली परिवारों में कन्याओं को साहित्यिक और सांस्कृतिक शिक्षा दी जाती थी। मृच्छकटिक नाटक में अनेक पढ़ी-लिखी स्त्रियों का वर्णन है। संपन्न परिवार बृहनन्द, गणदास और हरदत्त जैसे विशेष शिक्षकों को अपनी कन्याओं की शिक्षा देने के लिये नियुक्त करते थे।

स्त्रियाँ गायन, नृत्य, गृह कार्य आदि में प्रवीण होती थीं। स्त्रियों को इतनी ऊँची शिक्षा भी दी जाती थी कि वे संस्कृत में ऋचाओं और श्लोकों को समझ सकती थीं और इनकी रचना भी कर सकती थीं। गुप्त काल में शीला भट्टारिका आदि स्त्रियाँ कवित्रियाँ और लेखकों के रूप में प्रख्यात हैं। निर्धन खियाँ पति की अनुपस्थिति में अध्यापन कार्य करके अपना जीवन निर्वाह करती थीं। सांस्कृतिक कार्यों में उच्च जातियों और श्रेणियों की सियाँ रुचि पूर्वक हाथ बटाती थीं और शासन संचालन में प्रमुख भाग लेती थीं। चंद्रगुप्त द्वितीय की कन्या और वाकाटक नरेश रूद्रसेन द्वितीय की पत्नी प्रभावती गुप्त उच्च श्रेणी की शिक्षित और प्रतिभाशाली स्त्री थी। उसने अपने पुत्र दिवाकरसेन और दामोदरसेन की बाल्यावस्था में सफलतापूर्वक शासन संचालित किया। आदित्य सेन की माता और पत्नी शिक्षित थीं और सार्वजनिक कार्यों में विशेष अभिरूचि रखने वाली स्त्रियाँ थीं।


स्त्रियों की इस महत्ता के कारण वे सामाजिक और धार्मिक कार्यों में सहयोग प्रदान करती थीं। अनेक धार्मिक क्रियाविधियाँ और संस्कार बिना पत्नी के सहयोग और उपस्थिति के पूर्ण नहीं माने जाते गुप्तकाल में सम्राट की महारानी सामाजिक और धार्मिक दृष्टि से एक विशिष्ट महत्वपूर्ण स्थान रखती थीं। गुप्त युग की मुद्राओं पर उत्कीर्ण राजमहिषियों की आकृतियाँ इसके परिचायक है। इस युग के साहित्य स्त्रियों के "स्त्री-धन" का उल्लेख है। इसमें से वे दान-पुण्य करती थीं। इससे विदित होता है कि खियों को संपत्ति का अधिकार था। कभी-कभी गृहस्थी जीवन से निराश होकर या ऊबकर भी स्त्री तपस्विनी या सन्यासिनी हो जाती थी। 


नारी शिक्षा


वैदिक काल में पुरुषों के समान ही स्त्रियों को भी शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार था

और वे विद्याभ्यास के निमित्त ब्रह्मचर्य धारण करती थीं। उनका भी उपनयन संस्कार होता था। घोषा और लोपामुद्रा उस काल की उन विदुषियों में हैं जिन्होंने ऋचाओं की रचना की थी। परवर्ती काल में भी नारी- शिक्षा का महत्त्व बना हुआ था पर वे वैदिक अध्ययन से वंचित कर दी गयीं थीं। मनुस्मृति में एक ओर तो स्त्रियों के उपनयन की बात कही गयी है, दूसरी ओर उनके वैदिक मन्त्र उच्चारण करने का निषेध किया गया है और कहा गया है कि जिस यज्ञ में नारी का योग हो, उस आयोजन में ब्राह्मणों को भोजन नहीं करना चाहिए। गुप्त काल आते-आते स्त्रियाँ उपनयन संस्कार से भी वंचित कर दी गयीं थीं। उनकी शिक्षा के विषय वैदिक साहित्य के स्थान पर लौकिक साहित्य हो गये।


 पत्नी रूप में नारी


वात्स्यायन के अनुसार गुप्तकालीन आदर्श पत्नी का स्वरूप यह था कि वह अपने पति की देवता के समान सेवा करे,

उसके घर आने पर उसकी देख-भाल करे और उसके खाने-पीने की समुचित व्यवस्था करे, व्रत-उपवासों में पति का साथ दे, उत्सवों, सामाजिक कृत्यों और धार्मिक जुलूसों में पति की आज्ञा प्राप्त करके ही जाये, उन्हीं आमोद-प्रमोदों में भाग ले जो उसके पति को पसंद हो, पति अपनी पत्नी में कोई दोष न देखे इसलिए वह संदिग्ध चरित्र की सियों के संसर्ग में न रहे, द्वार पर खड़ी न हो, अधिक देर तक एकांत में न रहे, अपने धन का अभिमान न करे, पति की अनुज्ञा बिना किसी को दान न दे, अपने पति के मित्रों का माला, सुगंधिआदि से यथोचित सम्मान करे, सास-ससुर की सेवा करे और उनकी आज्ञा का पालन करे, उनकी उपस्थिति में उत्तर न दे, मृदुवचन कहे, जोर से हँसे नहीं, नौकरों से समुचित काम ले और उत्सवों पर उनका यथोचित मान भी रखे।


पत्नी के लिए यह भी उचित था कि पति के विदेश जाने पर वह सन्यासी-सा जीवन व्यतीत करे,

धर्मचिह्नों के अतिरिक्त कोई अय आभूषण न धारण करे, धर्म-कार्य और व्रत-उपवास में लगी रहे, बड़े जो कहें वही करे, सुख-दुःख के अवसरों को छोड़ कर अंय अवसरों पर अपने सगे-संबंधियों के यहाँ भी न जाये और यदि जाये भी तो पति-परिवारवालों के साथ और वहाँ से थोड़ी ही देर में लौट आये, पति के वापस आने पर शालीन वस्त्रों में उससे मिले।


इस प्रकार का वैयक्तिक आचरण करते हुए पत्नी पर संपूर्ण गृह व्यवस्था का उत्तरदायित्व था। वह पति उसके माता-पिता, सगे-संबंधियों की देखभाल करती थी, घर को स्वच्छ, फर्श को चिकना रखना और गृहदेवता की पूजा करना उसका काम था, उसका यह भी काम था कि अपने बगीचे में तरकारी, फूल,

फल, जड़ी-बूटी के पेड़-पौधे लगाये, उनके बीजों को समय पर एकत्र कर बोये, घर में अन्न की पूरी व्यवस्था रखे, खेती और दुधार तथा ठाठ पशुओं की देख भाल करे, परिवार का वार्षिक बजट बनाकर उसके अनुसार व्यय करे, नित्य प्रति का हिसाब रखे। पति की अनुपस्थिति में घर की व्यवस्था बिगड़ने न पाये यह भी उसका उत्तरदायित्व था। इसके लिए वह आय बढ़ाने और व्यय घटाने का प्रयत्न करे। यदि परिवार में सौत हो और वह आयु में छोटी हो तो उसे बहन के समान और यदि बड़ी हो तो माता के समान माने। 


स्त्री-संग्रहण


सर्व विदित है कि गुप्तकाल में पत्नी से सदैव पति के प्रति निष्ठ रहने की आशा की जाती थी, पर व्यवहार में कदाचित् ऐसा नहीं था।

गुप्त काल में पर स्त्री और पर-पुरुष संबंधप्रचलित था और समाज इस बात से भली-भाँति परिचित भी था। वात्स्यायन ने इस प्रकार के प्रेमी-प्रेमिकाओं के मिलन की विस्तार से चर्चा की है। स्मृतिकार भी इस स्थिति से भली-भाँति परिचित थे। कदाचित् इसी कारण उनकी परिभाषा के अंतर्गत न केवल स्त्री-पुरुष का एक ही शैया पर बैठना, सोना, आलिंगन-चुम्बन आदि ही संग्रहण था, वरन् स्त्री के साथ खाना, उसके कपड़े पकड़ना, उसके आभूषण को छूना, उससे मजाक करना और सुगंधि और पुष्पहार भेंट करना भी उनकी दृष्टि में संग्रहण था। यही नहीं उन्होंने एकांत, अरण्य, पनघट, ग्राम के बाहर, नदी के संगम आदि पर पर-पत्नी से वार्तालाप को भी संग्रहण घोषित किया है और इन सबको उन्होंने दंडनीय ठहराया है।

संग्रहण के अपराध के लिए उन्होंने अर्थ-दंड ही नहीं लिंगोच्छेदन और मृत्यु- दंड का भी विधान किया है। उनकी दृष्टि में उच्च वर्ण की स्त्री का संग्रहण निम्न वर्ण की स्त्री की अपेक्षा अधिक गम्भीर अपराध था, इसी प्रकार उन्होंने ब्राह्मण अपराधी के लिए कम और शूद्र अपराधी के लिए अधिक दंड का विधान किया है। विष्णु, याज्ञवल्क्य, नारद और बृहस्पति ने समान वर्ण की स्त्री के संग्रहण के लिए अधिकतम आर्थिक दंड, निम्न वर्ण की स्त्री के संग्रहण के लिए मध्यम अर्थ-दंड और उच्च वर्ण की स्त्री के संग्रहण के लिए मृत्युदंड का विधान किया है। शूद्र को प्रत्येक अवस्था में मृत्युदंड अधिकारी माना है। संग्रहण के संबंध में उन्होंने कुछ अपवाद भी प्रस्तुत किये हैं। यथा- वेश्या तथा ऐसी दासी का संग्रहण अपराध न था, जो स्वामी द्वारा नियंत्रित न हो। ब्राह्मण वर्ण के अतिरिक्त अंय वर्ण की कुलटा स्त्री के साथ, यदि वह किसी की रखैल न हो, सहवास भी अपराध न था। भिक्षुणी के संग्रहण को स्मृतिकारों ने कोई महत्व नहीं दिया है। उसके लिए उन्होंने नाममात्र का अर्थ दंड ही पर्याप्त माना है।


पति की उपेक्षा करने वाली स्त्री के लिए कौटिल्य, याज्ञवल्क्य, मनु, बृहस्पति, विष्णु और कात्यायन ने उसके लिए मृत्युदंड की व्यवस्था की है, किंतु इसके साथ ही स्मृतिकारों का यह भी कहना है कि स्त्री प्रायश्चित्त न करे तभी उसके साथ कठोर व्यवहार किया जाना चाहिए, उसकी उपेक्षा की जानी चाहिए और उसे भोजन से वंचित कर देना चाहिए। संग्रहणकृत स्त्री प्रायश्चित्त मात्र से अथवा कुछ स्मृतियों के अनुसार, मासिक स्राव होने के पश्चात् स्वयं पवित्र हो जाती है। वशिष्ठ और याज्ञवल्क्य का कहना था कि अंय वर्ण के संसर्ग से गर्भवती स्त्री प्रसव काल तक और तदनंतर मासिक स्राव आरंभ होने तक ही अपवित्र रहती है। तदनंतर वह पवित्र हो जाती है। यदि स्त्री शूद्र अथवा निम्न वर्ण के साथ सहगमन करे और उससे गर्भवती हो या पुत्र उत्पन्न करे तो उस अवस्था में उसे त्याग देना चाहिए। इन बातों से ऐसा ज्ञात होता है कि समाज, संग्रहण के संबंध में पुरुष के प्रति अधिक कठोर था और नारी के प्रति उसके भाव उदार थे, किंतु यह उदार भावना कदाचित् उन्हीं अवस्थाओं में रही होगी जब उसकी सहमति से संग्रहण न हुआ हो और उसके साथ बलात्कार किया गया हो । 


विधवा


पति की मृत्यु के उपरांत सामान्यतः स्त्रियाँ वैधव्य जीवन व्यतीत करती थीं। विधवा सियों के लिए स्मृतिकारों ने आत्मसंयम और सतीत्व के साथ रहने और सादा जीवन व्यतीत करने का विधान किया है। वे न तो आभूषण धारण कर सकती थीं और न केश संवार सकती थीं। वे उबटन भी नहीं लगा सकती थीं। इस प्रकार वे सात्त्विक जीवन बिता सकें, इसलिए उन्हें कुछ स्मृतिकारों ने पति की संपत्ति में उत्तराधिकार प्रदान किया था।


साथ ही गुप्त काल में विधवा एवं अंय स्त्रियों के पुनर्विवाह के प्रचलन की भी बात ज्ञात होती है। यद्यपि वह बहुप्रचलित न था। नारद और पराशर ने पाँच विशिष्ट अवस्थाओं में स्त्रियों को पुनर्विवाह कर लेने की अनुमति दी है।

उनमें एक पति की मृत्यु भी है, किंतु इस प्रकार का विवाह उन्होंने देवर या संबंधी के साथ ही उचित ठहराया है। अमरकोश में पुनर्विवाहित के अर्थ में न केवल पुनर्भू शब्द का उल्लेख किया है वरन् पुनर्भु पत्नीवाले द्विज पति के लिए विशेष शब्द और उसके पर्याय भी दिये हैं। कात्यायन स्मृति में वयस्क और ऊन संतान रहते हुए दूसरा पति करने वाली स्त्रियों की चर्चा की है। दायभाग और उत्तराधिकार के अंतर्गत उन्होंने ऐसी स्त्री के पुत्र के दाय पर भी विचार किया है जिसने पति को नपुंसक होने के कारण त्याग दिया हो, किंतु वात्स्यायन के कामसूत्र से ऐसा प्रतीत होता है कि विधवाओं का विधिवत् पुनर्विवाह नहीं होता था। वे स्वैच्छित पुरुष के साथ दाम्पत्य जीवन व्यतीत कर सकती थीं और समाज उसे मान्य करता था, किंतु वात्स्यायन के कथन से यह भी प्रकट होता है कि पुनर्भू पत्नियों को विवाहित पत्नी के समान सामाजिक स्थिति प्राप्त न थी।

उनकी स्थिति को उन्होंने कुमारी और सुरैतिन (रखैल) तथा देवी और गणिका के बीच बतायी है। उनके इस कथन में कितना सार है कहना तनिक कठिन है। द्वितीय चंद्रगुप्त ने अपने भाई की पत्नी ध्रुवस्वामिनी के साथ पुनर्विवाह किया था, किंतु ध्रुवस्वामिनी की स्थिति किसी विवाहित पत्नी से कम प्रतीत नहीं होती। 


 संपत्तिक अधिकार


पूर्ववर्ती काल के समान ही गुप्त काल में संयुक्त परिवार व्यवस्था समाज में प्रचलित थी। वयोवृद्ध व्यक्ति का पूरे परिवार पर अनुशासन होता था और परिवार के सभी लोग उसका अनुशासन मानते थे।

पारिवारिक विवादों में उसका निर्णय सर्वथा मान्य होता था और न्यायालय भी उसकी बातों का आदर करती थी। इसी प्रकार उसकी पत्नी का भी परिवार के भीतर उतना ही महत्त्व था। स्मृतियों ने पिता के जीवन काल में बँटवारे की बात को हेय ठहराया है।


पारिवारिक संपत्ति में पुत्रों का जन्मना समान भाग था। कतिपय अपवाद की स्थिति में ज्येष्ठ पुत्र को कुछ अधिक अंश प्राप्त होता था। पति की संपत्ति में विधवा के अधिकार के संबंध में स्मृतिकारों में मतभेद हैं।

यदि मृत्यु के समय पति संयुक्त परिवार का सदस्य था तो उन्होंने विधवा का जीवन-निर्वाह का अधिकार स्वीकार किया है, किंतु यदि वह अलग रहता था तो याज्ञवल्क्य और बृहस्पति ने विधवा का जीवन-काल तक पति के अंश पर उत्तराधिकार माना है पर विधवा के इस अधिकार को भी उस समय तक बहुत मान्यता प्राप्त न हो सकी थी।


इस प्रकार नारियों को पारिवारिक संपत्ति में तो कोई अधिकार न था पर विवाह के उपलक्ष्य में मिली वस्तुओं, पति-गृह जाते समय दिये गये धन, प्रेमस्वरूप प्राप्त भेंट, माता, पिता और भाई से मिले न पर उनका एकाधिकार था। वह स्त्री धन कहा जाता था और उसके उपयोग और उपभोग की उन्हें पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त थी।