मौर्य काल में नारी - women in maurya period

मौर्य काल में नारी - women in maurya period


नारियों की स्थिति में पिछले युगों की अपेक्षा कुछ परिवर्तन आने लगा था। वैदिक समाज में स्त्रियों की स्थिति बहुत अच्छी थी, उन्हें पति के साथ समानता की स्थिति प्राप्त थी। इस समय पति-पत्नी एक दूसरे के साथी या मित्र थे। उनके स्वत्वों और सामान्य कार्यों में कोई बड़ी विषमता या भेद नहीं था। उनका सामूहिक नाम दंपती अर्थात् घर का स्वामी था। इससे सूचित होता है किदोनों का घर पर समान रूप से स्वत्व था। मैकडानल और कीथ ने लिखा है “दंपती शब्द ऋग्वेद के समय में स्त्रियों की उच्च स्थिति का बोधक है।" यह स्थिति 600 ई. पू. तक बनी रही। इसके बाद वैदिक युग के अंत में स्त्रियों को यज्ञाधिकार से वंचित किया गया। इसके प्रधान कारण संभवत: कर्मकांड की जटिलता एवं पवित्रता में वृद्धि,

स्त्रियों का मासिक धर्म, अंतर्जातीय विवाह तथा उपनयन संस्कार के अभाव में स्त्रियों का शूद्र समझा जाना था। वैदिक युग में पत्नी पति के साथ बैठकर यज्ञ करती थी, उसके बिना पति का यज्ञ पूरा नहीं हो सकता था, किंतु 200 ई. पू. में उसका इतना अध: पतन हुआ कि वह शूद्र बना दी गई। इसका एक बड़ा कारण यह प्रतीत होता है कि छठी श. ई. पू. से हिंदू समाज में बाल विवाह का प्रचार होने से स्त्रियों के उपनयन की प्रथा अप्रचलित होने लगी थी। नियत अवधि तक उपनयन संस्कार न होने से गृह्य सूत्रों के समय से व्यक्ति को शूद्र समझा जाता था। स्त्रियों के उपनयन की प्रथा न रहने के कारण उनसे यज्ञ और मंत्रोच्चारण का अधिकार छिनना स्वाभाविक था। मनु इसका कारण स्पष्ट करते हुए कहता है

कि यज्ञ करने वाला वेद का पारंगत विद्वान् तथा यज्ञक्रिया में निष्णात होना चाहिये। उपनयन न होने से स्त्रियाँ वेद की विदुषी नहीं होती थीं, अतः उन्हें यज्ञ करने का अधिकार नहीं दिया गया। मनु ने यह कहा कि पत्नी को मंत्रों के बिना ही यज्ञ में आहुति देनी चाहिये। उसका कथन है कि स्त्रियों के सब संस्कार मंत्रों के बिना


किये जाने चाहिये। स्त्रियों की स्थिति हीन होने पर इनके आजीवन संरक्षण का विचार विकसित हुआ। धर्मसूत्रों के समय से प्रायः प्रत्येक शास्त्राकार ने इस बात की घोषणा की है कि स्त्री को कहीं भी स्वतंत्रता प्राप्त नहीं है। मनु के कथनानुसार स्त्री की रक्षा बचपन में पिता, यौवन में पति और बुढ़ापे में पुत्र करते हैं,

अतः स्त्री स्वतंत्र नहीं हैं, एक आधुनिक लेखिका रमाबाई ने इस पर कटु व्यंग्य करते हुए लिखा है कि हिंदू स्त्री केवल एक ही स्थान-नरक में स्वाधीन रह सकती है, किंतु स्त्रियों की परतंत्रता का सिद्धांत सर्वमान्य होते हुए भी इस युग में नारियों को कुछ क्षेत्रों में महत्वपूर्ण अधिकार और स्वतंत्रता प्राप्त थी । यद्यपि मनु के अनुसार स्त्रियों को संपत्ति रखने का अधिकार नहीं समझा जाता था, फिर भी मनु ने स्वयमेव स्त्रीधन पर पत्नी को पूर्ण अधिकार दिया है, वह इस बात की व्यवस्था करता है कि राजा को चाहिए कि वह पत्नियों की, साध्वी विधवाओं की, बाँझ और रोगग्रस्त स्त्रियों की संपत्ति की विशेष रूप से रक्षा करे। यदि संबंधी इस संपत्ति को हथियाने का प्रयत्न करें तो वह उन्हें चोरों की भाँति दण्डित करे। भाइयों को अपनी अविवाहित बहिन को संपत्ति में से कुछ हिस्सा बाधित रूप से देना पड़ता था। मनु ने माता को और याज्ञवल्क्य ने पहली बार पुत्रों के न होने की दशा में पत्नी को पति की संपत्ति का उत्तराधिकारी बनाया है। इन व्यवस्थाओं से यह स्पष्ट है कि यद्यपि नारी को सामान्य रूप से संपत्ति रखने का अधिकार नहीं था, फिर भी कुछ विशेष दशाओं में तथा स्त्रीधन पर उसे पूर्ण अधिकार प्राप्त था। इस दृष्टि से इस युग में भारतीय नारी की स्थिति अंय देशों की नारियों की अपेक्षा अधिक उन्नत थी ।