वैदिक काल में नारी - women in vedic period

वैदिक काल में नारी - women in vedic period


आर्यों के प्रारंभिक समाज में स्त्रियाँ स्वच्छ थीं। वे बिना किसी प्रतिबंध के सामाजिक गतिविधियों में सम्मिलित होती थीं। वस्तुतः वैदिक युगमें स्त्री जितनी स्वतंत्र और मुक्त थी, उतनी परवर्ती काल के किसी भी युग में नहीं थी। सभी दृष्टियों से वह पुरूषों के समान थी। उसके अधिकार किसी भी प्रकार पुरूषों से कम नहीं थे। शिक्षा, ज्ञान, यज्ञ आदि विभिन्न क्षेत्रों में वह निर्विरोध स्वच्छंदतापूर्वक सम्मिलित होती तथा सम्मानपूर्वक आदर प्राप्त करती थी। उस युग में ऐसी अनेक विदुषी स्त्रियाँ थीं, जिन्होंने ऋग्वेद और अथ वेदों की अनेक ऋचाओं का प्रणयन किया था। लोपामुद्रा, विश्ववारा, सिक्ता, घोषा आदि ऐसी ही पंडिता स्त्रियाँ थीं। शिक्षा, ज्ञान और विद्वत्ता के क्षेत्र में ही नहीं बल्कि याज्ञिक कार्यों में भी वे अग्रणी थीं।

'ब्रह्मयज्ञ' में जिन ऋषियों की गणना की जाती है उनमें सुलभा, गार्गी, मैत्रेयी आदि विदुषियों के भी नाम लिये जाते हैं। जिनकी प्रतिष्ठा वैदिक ऋषियों के समान थी। विदेह शासक जनक ने यज्ञ के अवसर पर जो धार्मिक शास्त्रार्थ आयोजित किया था, उसमें गार्गी ने अपनी अद्भुत प्रतिभा, विलक्षण तर्क शक्ति, विलक्षण मेघा और सूक्ष्म विचार तंतुओं से दुरूह प्रश्नों की पृच्छाएँ करके याज्ञवल्क्य ऋषि के दाँत खट्टे कर दिये। इन साक्ष्यों से यह विदित होता है कि उस युग में स्त्रियाँ बिना पर्दे के स्वतंत्रतापूर्वक पुरुषों के साथ विद्वगोष्ठियों और दार्शनिक वाद-विवादों में सम्मिलित होती थीं। उनके मान और सम्मान में किसी प्रकार की कमी नहीं थी। समाज में वे पुरुषों की तरह ही आदृत थीं।

सामाजिक और धार्मिक उत्सव, समारोहों में वे अलंकृत होकर बिना किसी प्रतिबंध के उन्मुक्त होकर हिस्सा लेती थीं। पुरुषों के साथ वे यज्ञ में सम्मिलित होकर कार्यविधि संचालित करती थीं। बिना उनके सहयोग के यज्ञ पूरा नहीं माना जाता था। वे यज्ञ की अधिकारिणी थी। अकेला पुरुष यज्ञ के लिए अयोग्य था। पुरुषों के लिए उनका याज्ञिक और धार्मिक सहयोग कालांतर में अनिवार्य हो गया। अतः यज्ञ और धार्मिक आयोजनाओं में पत्नी का होना आवश्यक था। अन्यायन्य याज्ञिक क्रियाओं में वह पति का सहयोग करती थी।


उत्तरवैदिक काल में परवर्ती युग से ही नारी की दशा अवनति की ओर अग्रसर होने लगी। उसके सामाजिक और धार्मिक अधिकार तो अवश्य बने रहे,

किंतु उसके वैयक्तिक गुणों के प्रति संदेह व्यक्त किया गया। उसके लिए निन्दनीय शब्दों का प्रयोग होने लगा। उसे असत्यभाषी और अभद्र कहा गया। उसके लिए भविष्यवाणी की गई कि अगर वह पति द्वारा धन देकर क्रय की जाती है, तो वह पर-पुरुष के साथ घूमती है। लगता है, इस तरह का विवाह यदा-कदा हुआ करता था, जो समाज में इस युग में निन्दनीय माना गया है। उसे पुरूषों के साथ यज्ञ में सोम का भाग लेने से वंचित कर उसकी स्वतंत्रता पर अंकुश लगाया गया। इस प्रकार उस पर सामाजिक और धार्मिक अनेक प्रकार के नियंत्रण लगाये जाने लगे जो आगे चलकर और विस्तृत हो गए। महाकाव्यों के काल में स्त्रियों की स्वतंत्रता और स्वच्छंदता में कोई विशेष प्रतिबंध नहीं लगा था। सामाजिक उत्सवों और धार्मिक पर्वो पर स्त्रियाँ उन्मुक्त होकर सम्मिलित हुआ करती थीं।

रामायण में सीता का विचरण तथा महाभारत में द्रोपदी का भ्रमण उनकी उन्मुक्तता और स्वच्छंदता व्यक्त करता है। सामाजिक और धार्मिक गतिविधिओं में उनका महत्वपूर्ण योगदान था। उनके प्रति समाज की उदात्त भावना थी। महाभारत में भीष्म पितामह का कथन है कि स्त्री को सर्वदा पूज्य मानकर उससे स्नेह का व्यवहार करना चाहिए। जहाँ स्त्रियों का आदर होता है, वहाँ देवताओं का निवास होता है और उसकी अनुपस्थिति में सभी पूर्ण कार्य अपवित्र हो जाते हैं। रामायण में भी सीता के लिए आदर और सम्मान की बातें कही गई हैं। स्त्रियों के दो प्रकार हैं, साध्वी और असाध्वी साध्वी स्त्रियाँ पृथ्वी की माता और उसकी संरक्षिका हैं

तथा असाध्वी स्त्रियाँ अपनी पापी गतिविधियों से विख्याता धर्मसूत्रों और स्मृतियों के युग में स्त्री की दशा पूर्णतः पतनोन्मुख हो गई। स्त्री के साथ भोजन करनेवाले पुरुष को गर्हित आचरण करनेवाला व्यक्ति घोषित किया गया तथा उस स्त्री की प्रशंसा की गई जो अप्रतिवादिनी थी। उसका स्वतंत्र अस्तित्व समाप्त हो गया तथा उसके शरीर पर उसके पति का स्वत्व माना गया। पितृसत्तात्मक समाज होने के कारण उसकी स्थिति निरंतर हासोन्मुख होती गई। उसकी स्वतंत्रता और उन्मुक्तता पर अनेक प्रकार के अंकुश लगाये जाने लगे। मनु जैसे स्मृतिकारों ने यह विचार प्रकट किया कि स्त्री कभी भी स्वतंत्र रहने योग्य नहीं। जब तक वह कन्या रहे उस पर पिता का संरक्षण रहे जब विवाह हो जाये तब उस पर पति का संरक्षण रहे और जब वह वृद्धावस्था में हो तब उस पर पुत्र का संरक्षण रहे। 


नारी शिक्षा


वैदिक युग में स्त्री की शिक्षा अपनी उच्चतम सीमा पर थी। वह पुरूषों के समकक्ष बिना भेदभाव के शिक्षा प्राप्त करती थी। वह बुद्धि और ज्ञान के क्षेत्र में अग्रणी थी। इस युग में पुत्र की तरह पुत्री का भी विद्यारम्भ से पूर्व उपनयन संस्कार संपन्न किया जाता था तथा वह भी ब्रह्मचर्य का पालन करती हुई विभिन्न विषयों की शिक्षा ग्रहण करती थी। उसे यज्ञ संपादन और वेदाध्ययन करने का पूर्ण अधिकार था। दर्शन और तर्कशास्त्र में भी स्त्रियाँ निपुण थीं। सभी सभागोष्ठियों में वे ऋग्वेद की ऋचाओं का गान किया करती थी। ऋग्वेद में उल्लिखित है कि कतिपय विदुषी स्त्रियों ने ऋग्वेद की अनेक ऋचाओं के प्रणयन में योगदान प्रदान किया था।

उस युग में बौद्धिक योगदान करने वाली ऐसी बीस कवयित्रियाँ थीं। रोमशा, अपाला, उर्वशी, विश्ववारा, सिकता, निबावरी, घोषा, लोपामुद्रा आदि पंडिता खियाँ इनमें अधिक प्रसिद्ध हैं। पति के साथ समान रूप से वे यज्ञ में सहयोग करती थीं। सूत्र काल तक भी स्त्रियाँ यज्ञ संपादित किया करती थीं। राम के युवराज पद पर अभिषेक के समय तक कौशल्या ने यज्ञ किया था। उत्तरवैदिक युग में भी स्त्री ब्रह्मचर्य में रहकर शिक्षा ग्रहण करती थी । वैदिक गान के अतिरिक्त वह ललित कलाओं में भी पारंगत होती थी। महाभारत से ज्ञात होता है कि पांडवों की माँ कुन्ती अथर्ववेद में पारंगत थी। इससे स्पष्ट है कि उस युग की खियाँ मंत्रवित् और पंडिता होती थीं तथा ब्रह्मचर्य का अनुगमन करती हुई उपनयन संस्कार भी कराती थीं।


संपत्ति में नारी का अधिकार


वैदिक काल में नारियों को आर्थिक स्थिति में रखकर समाज में उनका संपत्ति-विषयक अधिकार स्वीकार किया गया है

तथा उन विशेष परिस्थितियों का भी विश्लेषण किया गया है, जिनके कारण संपत्ति में वे अपना हिस्सा प्राप्त करती थीं। वैदिक कालीन कुछ ऐसे विवरण हैं, जो उसके उत्तराधिकार पर आक्षेप करते हैं, किंतु ये अपवाद ही हैं। संपत्ति में प्रायः उसका हिस्सा रहता रहा है। परिवार में वह पुत्र से किसी प्रकार कम नहीं समझी जाती रही। दत्तक पुत्र से श्रेष्ठ पुत्री समझी जाती थी। अपने भाई के न रहने पर वह अपने पिता की संपत्ति की उत्तराधिकारी मानी जाती थी। अतः वैदिक युग में स्त्री का संपत्ति में अधिकार स्वीकार किया जाता था। चौथी सदी ई. पू. तक यह व्यवस्था समाज में प्रचलित थी, किंतु दूसरी सदी ई. पू. में आकर स्त्री-शिक्षा पर अनेक प्रतिबंध लग गए,

जिनके कारण स्त्री का संपत्ति विषयक अधिकार भी क्षतिग्रस्त हुआ। इस युग में ऐसे अनुदार धर्मशास्त्रकारों के एक वर्ग का आगमन हुआ जिसने भाई के न रहने पर भी बहन के उत्तराधिकार को नहीं स्वीकार किया। आपस्तंब ने यह व्यवस्था दी कि उत्तराधिकारी के अभाव में जब गुरू या शिष्य कोई न हो तब पुत्री उत्तराधिकारी हो सकती है, यद्यपि उसने पुत्री को उत्तराधिकारी न स्वीकार करके सारी संपत्ति धर्म कार्य में लगा देने के लिए निर्देश दिया है। वशिष्ठ, गौतम और मनु ने भी उत्तराधिकारिणी के रूप में पुत्री का कहीं नाम नहीं लिया है। इन व्यवस्थाकारों ने संपत्ति में पुत्री के अधिकार और उसके उत्तराधिकारी के अधिकार को नहीं स्वीकार किया है, परंतु इसके विपरीत दूसरे शास्त्रकारों ने अत्यंत उदारतापूर्वक पुत्री के उत्तराधिकारी होने के मत का प्रतिपादन किया है। महाभारत में उसके इस स्वत्व को पुत्र के समकक्ष स्वीकार किया गया है और यह कहा गया है कि अगर अभ्रातृका को पूरी संपत्ति नहीं मिलती तो आधी अवश्य मिलनी चाहिए।