यक्ष मूर्तियाँ - yaksha idols

यक्ष मूर्तियाँ - yaksha idols


विदित है कि इस समय जनता में नागों की और यक्षों की पूजा बड़ी लोकप्रिय थी। मथुरा मौर्य युग से ही यक्ष मूर्तियों का केंद्र था। पारखम, बड़ौदा आदि गाँवों से मिली यक्ष मूर्तियाँ यह सूचित करती हैं। कि यहाँ इनकी भीमकाय मूर्तियों का निर्माण होता था। यक्षों की पूजा ने आगे चल कर कुबेर की पूजा का रूप ग्रहण किया और इससे संबंध रखने वाले मद्यपान की गोष्ठियों के दृश्यों का भी चित्रण किया जाने लगा। कुबेर भारतीय परंपरा में यक्षों के राजा और धनाधिपति माने जाते हैं। मथुरा में कुबेर को एक मोटे पेट वाले सेठ के रूप में चित्रित किया गया है।

यहाँ कुबेर की मूर्ति पाँव लटकायें हुए, सुख से बैठी हुई, एक हाथ में शराब का प्याला और दूसरे में थैली लिए हुए चिंता रहित मुद्रा में दिखाई जाती है। इसका मद्यपान के साथ संबंध होने के कारण मथुरा में मद्यपान गोष्ठियों के कई दृश्य दिखाये गये हैं। इन परसंभवत: हल्की विदेशी छाप है। यूनान और रोम में बेकस और डियोनिसस मद्यपान के देवता थे। इनकी पूजा में किये जाने वाले समारोहों में शराब के दौर चलते थे। इस समय मद्यपान के बाद बड़ा हुड़दंग मचा करता था। इस प्रकार की पानगोष्ठियों में मद्यपान करती हुई स्त्री-पुरूषों की कई उल्लेखनीय मूर्तियाँ मथुरा के निकट महोली, पालीखेड़ा और नरोली के गाँवों से मिली हैं। यह संभवतः कुबेर की पूजा का केंद्र था। डॉ. अग्रवाल के मतानुसार महोली का पुराना नाम मघुपल्ली था। अर्थात् यह स्थान मघु एवं धन के देवता कुबेर की पूजा का केंद्र था।

कुबेर के साथ ही बच्चों की अधिष्ठात्री देवी हारिती की भी पूजा होती थी। इसे कुबेर की पत्नी मान लिया गया था। मथुरा में कुबेर तथा हारिती की कई मूर्तियाँ मिलती हैं। 


नाग मूर्तियाँ


नाग प्रतिमाओं की परंपरा भरहुत और साँची से चली आ रही थी। मथुरा में नाग राजों की अनेक मूर्तियाँ मिलती हैं। इनमें घुटने तक लटकती हुई माला और फणों का विशाल मंडल दिखाया जाता हैं, जैसे छड़गाँव से प्राप्त महाकाय नागमूर्ति में इसके दोनों पाश्र्वों के कानों में कुंडल और कटि प्रदेश में पतली करघनी हैं। इसी प्रकार की एक छोटी मूर्ति दधिकर्ण नाग की मिली है।