गुप्तकाल : आर्थिक जीवन (2) - Gupta Period: Economic Life(2)

गुप्तकाल : आर्थिक जीवन (2) - Gupta Period: Economic Life(2)

कृषि


गुप्तयुग समुचित शासन व्यवस्था और शांति के कारण आर्थिक दृष्टि से वैभवशाली, समृद्ध और गौरवमय था। लोगों की आर्थिक दशा सुदृढ़ और उन्नत थी, देश धन-धान्य से पूर्ण था तथा जनता सुखी, संतुष्ट, समृद्ध और संपन्न थी। लोगों का जीवनस्तर ऊँचा था। नगरों में लोगों का जीवन ऐश्वर्यपूर्ण था। विविध उद्योग व्यवसाय तथा प्रचुर वाणिज्य और व्यापार संपन्नता के स्रोत थे। इसी गुप्तयुग में देश की बहुमुखी आर्थिक उन्नति भी हो सकी।


गुप्तकालीन साहित्य के अध्ययन से ज्ञात होता है कि तत्कालीन आर्थिक जीवन कृषि प्रधान था। इस युग में राज्य की ओर से प्रयास हुआ था कि अधिक से अधिक भूमि खेती के योग्य बनाई जाए।

राज्य लोगों को भूमि छिद्र-धर्म और नीवी-धर्म के अनुसार भूमि दे रहा था। अग्रहार के रूप में ब्राह्मणों को भी भूमि प्राप्त हो रही थी। इस प्रकार क्रमशः भूमि प्राप्त करने और भू-संपत्ति बढ़ाने की प्रवृत्ति लोगों में बढ़ने लगी थी। लोग भूमि का क्रय-विक्रय करने लगे थे। फलस्वरूप भूमि संबंधी विवादों का जन्म हो गया था, यह बात तत्कालीन स्मृतियों से प्रकट होती है। स्मृतियों में भू-विवाद की चर्चा विस्तार से की गई है। संभवतः भू-विवादों को ही दृष्टि में रखते हुए राज्य ने भू-वितरण के लिए कठोर व्यवस्था की थी। गुप्तकालीन प्रशासन से ज्ञात होता है कि भूवितरण ग्राम परिषद् की स्वीकृति या उसके माध्यम से होता था। भू-संपत्ति का हस्तांतरण ग्राम के सह-निवासियों की सहमति अथवा ग्राम परिषद् की अनुमति से होता था। भू-हस्तांतरण ग्राम महात्तारों की उपस्थिति में किया जाता था और वे उसका सीमा रेखांकन कर देते थे।


स्मृतियों में कृषि कर्म वैश्यों का धर्म बताया गया है, अतः यह अनुमान किया जा सकता है कि 'भू-स्वामित्व अधिकांशतः उनमें ही सीमित रहा होगा। किंतु साथ ही राज शासनों के देखने से यह भी ज्ञात होता है कि अग्रहार आदि के रूप में ब्राह्मणों को भी प्रचुर मात्रा में भूमि प्राप्त होती थी। संभव है कि राजानुज्ञा से क्षत्रियों को भी भूमि दी जाती हो किंतु शासन में इस प्रकार की चर्चा नहीं है। इसका मात्र अनुमान किया जा सकता है। किस सीमा तक भू-स्वामी अपने हाथों से कृषि कर्म करते थे, यह कहना कठिन है, पर स्मृतियों से यह बात अवश्य झलकती है कि कितने ही भू-स्वामी स्वयं कृषि कर्म न करके उसे जोतने बोने वाले लोगों को दे देते थे और वह उसे जोतता-बोता था और इस श्रम के बदले उसे 35 से 50 प्रतिशत उत्पादन प्राप्त होता था। इस काल में विष्टि बेगार की प्रथा प्रचलित थी,

ऐसा भी ज्ञात होता है। अतः जिन लोगों को विष्टि लेने का अधिकार प्राप्त था, वे लोग निःसंदेह उसका उपयोग अपने कृषि कार्य के लिए करते थे। इस प्रकार समाज का बहुत बड़ा वर्ग कृषिरत था।


कृषि की रक्षा राजा के कर्तव्यों में एक महत्वपूर्ण कर्तव्य माना जाता था। इसलिए प्रतीत होता है कि राज्य की ओर से सिंचाई आदि का समुचित प्रबंध किया जाता रहा होगा कुएँ, वापी, तालाब तडाग की समुचित व्यवस्था की जाती रही होगी। इस प्रकार के जलाशय निर्माण किए जाने के उल्लेख अभिलेखों में भी प्राप्त होते हैं। गुप्तकाल में सिंचाई संबंधी व्यवस्था की ओर राज्य कितना सजग था इसका एक महत्वपूर्ण उल्लेख स्कंदगुप्त के जूनागढ़ अभिलेख में मिलता है।

गिरनार पर्वत पर सुदर्शन नामक एक विशाल झील चंद्रगुप्त मौर्य के समय बनी थी। उस झील से उनके पौत्र अशोक के समय में सिंचाई के निमित्त एक नहर निकाली गई थी। इस झील का बाँध स्कंदगुप्त के समय में टूट गया तो उसके अधिकारियों ने तत्काल बड़ी तत्परता से उसकी मरम्मत कराई। यदि राज्य की ओर से सिंचाई के प्रति सजगता न होती तो इस प्राचीन झील की सहज उपेक्षा की जा सकती थी किंतु ऐसा नहीं हुआ।


गुप्तकाल में मुख्य कृषि उत्पादन क्या था इसका स्पष्ट उल्लेख कहीं नहीं मिलता। साहित्य में उपलब्ध प्रासंगिक उल्लेखों से ही कुछ अनुमान किया जा सकता है।

कालिदास के ग्रंथों से ऐसा प्रतीत होता है कि उन दिनों ईख और धान की पैदावार बहुत होती थी। धान के रूप में उन्होंने शालि, नीवार, कलम और श्यामाक का उल्लेख किया है। इनके अतिरिक्त उनके ग्रंथों में केवल जौ और तिल का उल्लेख मिलता है। लंकावतार सूत्र में स्वीकृत खाद्यों की जो सूची दी हुई है, उनमें जौ, चावल और चीनी के अतिरिक्त गेहूँ और दाल का भी उल्लेख है, अतः इस काल में उनकी खेती का भी अनुमान किया जा सकता है। चरक और सुश्रुत ने सूत्रस्थान में अन्नों की एक काफी लंबी सूची दी है। वे अन्न निश्चित ही इस काल में भी उपजाए जाते रहे होंगे, पर उनकी उपज सीमित ही रही होगी, ऐसा प्रतीत होता है।


उद्योग


गुप्तकाल में सामान्य जीवन से संबंधित उद्योग तो किसी न किसी रूप में हर नगर और जनपदों में उसी परंपरा में होता रहा होगा,


जो अब तक कुटीर उद्योगों के रूप में प्रत्येक गाँवों में रही थी। समकालीन ग्रंथों से प्रतीत होता है कि मिट्टी के बर्तन बनाने का काम कुम्हार, लोहे के बर्तन, अस्त्र-शस्त्र, खेती के उपकरण लुहार, धातु के बर्तन आदि कसेरे, लकड़ी के काम बढ़ई और आभूषण आदि बनाने का काम सुनार करते थे। इसी प्रकार जुलाहों के हाथ में कपड़े बुनने का उद्योग था। निष्कर्ष यह है कि वर्गगत व्यवसाय के रूप में लोग अपने-अपने घरों में अपना-अपना परंपरागत व्यवसाय करते थे।



पुरातात्विक और साहित्यिक सूत्रों से ज्ञात होता है कि गुप्त काल में तंतु उद्योग कपड़े अत्यंत विकसित था। सूती, रेशमी, ऊनी और अलसी आदि की छाल से बने कपड़ों का प्रायः उल्लेख मिलता है।

कालिदास के ग्रंथों में कौशेय, क्षौम, पत्रोर्ण, कौशेय-पत्रोर्ण, दुकूल, अंशुक आदि वस्त्रों का उल्लेख हुआ है, जो विभिन्न प्रकार के वस्त्रों का परियच देते हैं। कालिदास के कथन से यह भी ज्ञात होता है कि उन दिनों इतने महीन कपड़े पहने जाते थे, जो साँस से उड़ जाए। अमरकोश में रूई और छाल के रेशों से बने क्षौम दुकूल, फलों की छालों से बने बदर, कीड़ों की लार से बने रेशम और पशुओं के रोम से बने ऊनी वस्त्रों का उल्लेख है। उसमें बुने, धोये, चिकनाए कपड़ों के विविध नाम भी दिए गए हैं और मोटे महीन विविध प्रकार के कपड़ों, बिछाने की चादरों, दरियों आदि का भी उल्लेख प्राप्त होता है।


पुरातात्विक उत्खनन और साहित्यिक उल्लेखों से यह भी ज्ञात होता है कि गुप्तकाल में हाथी- दाँत के साज-सज्जा,

सामान, मूर्तियाँ, मुहरें आदि बना करती थीं। तत्कालीन तक्षण कला का परिचय मूर्तियों और वस्तुओं से मिलता है। इसी प्रकार कुम्हार लोग भी मूर्ति कला में पारंगत थे।


समकालीन साहित्य में विभिन्न प्रकार के सोने, चाँदी और मणियों के आभूषणों का विस्तृत उल्लेख प्राप्त होता है। इससे प्रतीत होता है कि सुनारी की कला भी उन दिनों बहुत उत्कर्ष पर थी। नक्काशी और खुदाई के बारीक कामों के नमूनों के रूप में तत्कालीन सोने के सिक्कों को देखा जा सकता है। उनके ठप्पों की खुदाई जिस बारीकी और कौशल से की गई है, वह तत्कालीन कला का उत्कृष्ट उदाहरण है।

मोतियों का काम भी उन दिनों बहुत होता था, यह आचारांग सूत्र में विस्तार के साथ नाना प्रकार के मुक्ता-हारों के उल्लेख से ज्ञात होता है। हीरा, लाल, नीलम आदि मणियों के काटने और सँवारने के कामों का परिचय भी तत्कालीन साहित्य से मिलता है। मणियों का प्रयोग न केवल आभूषणों में होता था वरन् उनका उपयोग गृहसज्जा के लिए भी किया जाता था यह मृच्छकटिकम् में बसंतसेना के प्रासाद वर्णन से ज्ञात होता है। पुरातात्विक उत्खनन में अनेक स्थानों से गुप्त कालीन विविध प्रकार के मनके प्राप्त हुए हैं, जो तत्कालीन मणि उद्योग का परिचय देते हैं।


गुप्तकाल में लौह उद्योग का जो रूप था, उसका सहज उदाहरण महरौली स्थित चंद्रगुप्त द्वितीय कालीन लौह स्तंभ में देखा जा सकता है। यह स्तंभ 23 फुट 8 इंच लंबा है

और अनुमानतः वजन में 6 टन होगा और इसकी समूची ढलाई एक साथ हुई है। इतनी लंबी और वजनी धातु की ढलाई का प्राचीन कालीन नमूना अन्यत्र कहीं प्राप्त नहीं होता है और आधुनिक युग में इस प्रकार की ढलाई सहज नहीं कही जा सकती। इसकी ढलाई ही नहीं, इसका धातु निर्माण भी तत्कालीन लौह-कला की उत्कृष्टता को प्रदर्शित करता है। इस संबंध में द्रष्टव्य यह है कि लगभग डेढ़ हजार वर्ष से वह गर्मी सर्दी, बरसात सहता हुआ खुले में खड़ा है, किंतु आजतक उसमें जरा भी जंग नहीं लगा। जंग-मुक्त लौह का निर्माण वस्तुतः धातु विज्ञान के क्षेत्र में एक आश्चर्य है। अन्य धातुओं के उद्योग और कला के रूप में तत्कालीन धातु मूर्तियों का उल्लेख किया जा सकता है। पूर्व गुप्त कालिक जैन तीर्थंकरों की मूर्तियाँ जो चौसा जिला शाहाबाद से प्राप्त हुई हैं और अब पटना संग्रहालय में हैं

और उत्तर गुप्तकाल की विशालकाय बुद्धमूर्ति जो सुल्तानगंज जिला भागलपुर में प्राप्त हुई थी और अब बरमिंगघम संग्रहालय में है इस प्रसंग में उल्लेखनीय हैं। चरक संहिता में विभिन्न प्रकार के धातु-पात्रों का उल्लेख किया गया है, उनसे भी धातु- उद्योग पर पर्याप्त प्रकाश पड़ता है।


व्यापार वाणिज्य


कृषि और उद्योग पर अवलंबित आर्थिक जीवन की व्यवस्था का माध्यम व्यापार था। गुप्तकाल में इस व्यापार के दो स्पष्ट रूप थे। एक का नियंत्रण श्रेष्ठि करते थे और दूसरे का सार्थवाह । श्रेष्ठि जनता की आवश्यकताओं की पूर्ति किया करते थे। उनकी दुकानें नगरों और ग्रामों में प्रायः सभी जगह होती थी।

सार्थवाह एक स्थान से दूसरे स्थान तक आते-जाते थे और इस प्रकार वे देश-विदेश का माल एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचाने का काम करते थे। इस प्रकार वे यातायात के व्यवस्थापक और थोक व्यापारी दोनों का काम करते थे।


सार्थवाह


समान अथवा संयुक्त अर्थवाले व्यापारी जो बाहरी मंडियों के साथ व्यापार करने के लिए एक साथ सामान लाद कर चलते थे, वे सार्थ कहलाते थे और उनका वरिष्ठ नेता ज्येष्ठ व्यापारी सार्थवाह कहलाता था। गुप्तकाल में सार्थ व्यवस्था का क्या रूप था, यह तो निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता, पर अनुमान किया जा सकता है कि वह पूर्व परंपराओं के उसी क्रम में रहा होगा, जिसका परिचय जैन- साहित्य में प्राप्त होता है।

ऐसा ज्ञात होता है कि कोई एक उत्साही व्यापारी सार्थ बन कर व्यापार के लिए निकलता था और उसके साथ में अन्य व्यापारी भी सम्मिलित हो जाते थे। साथ में सम्मिलित होने वाले व्यापारियों के बीच एक प्रकार की साझेदारी का समझौता होता था और हानि-लाभ के संबंध में उनके बीच अनुबंध रहता था। सार्थ में सम्मिलित होने वाले सभी व्यापारियों की साझेदारी समान हो, यह आवश्यक न था। एक ही सार्थ के सदस्य हानि-लाभ और पूँजी की साझेदारी की दृष्टि से कई दलों में बँटे हो सकते थे। उन्हें इस संबंध में पारस्परिक संबंध स्थापित करने की पूरी छूट होती थी। किंतु एक यात्रा में किसी एक सार्थवाह के नेतृत्व में यात्रा करने वाले सभी व्यापारी,

चाहे उनमें पूँजी की साझेदारी हो या न हो, सांगात्रिक कहे जाते थे और उन्हें कतिपय नियमों और सार्थवाह के आदेशों को समान रूप से पालन करना पड़ता था। उन्हें सार्थ के रूप में किन उत्तरदायित्वों को निभाना और मर्यादाओं का पालन करना पड़ता था, यह स्पष्टतः नहीं कहा जा सकता।


साधारणतया साथ में पाँच प्रकार के व्यक्ति होते थे। (1) मंड-सार्थ (व्यापारिक माल असबाब लादकर चलने वाले वणिक), (2) 'वहलिका' (ऊँट, खच्चर, घोडे, बैल आदि), (3) 'भारवाह' (माल का बोझा ढोने वाले लोग), (4) 'औदरिका' (ऐसे लोग जो जीविकोपार्जन के लिए एक स्थान से दूसरे स्थान को जाना चाहते थे),

(5) 'कार्पटिक' (भिक्षु और साधु लोग)। सार्थ का अधिकांश भाग पैदल चलता था। वन्य पशुओं, चोरों, लुटेरों और डाकुओं से बचने के लिए प्रायः सार्थ उन मार्गों से आते-जाते थे जो अधिकाधिक गाँवों, बस्तियों और नगरों से निकलते थे।


व्यापार


गुप्त साम्राज्य भारत के पूर्वी और पश्चिमी तट के दोनों ओर के समुद्रों को स्पर्श करता था। उत्तर- पश्चिमी सीमांत क्षेत्र भी जहाँ से भारत के बाहर उत्तर में मध्य एशिया, पूर्वी और पश्चिमी देशों को जाने के स्थल मार्ग निकलते थे, गुप्त साम्राज्य के अंतर्गत ही था। अतएव गुप्त साम्राज्य में स्थल और जलमार्गों द्वारा खूब व्यापार होता था। गुप्तकाल अत्यधिक व्यापार और वाणिज्य का युग था ।

देशी और विदेशी व्यापार गुप्त सम्राटों के संरक्षण में खूब फला-फूला और इससे देश की धन संपत्ति में अपार वृद्धि हुई। व्यापार वाणिज्य से देश में धारासार धन बरसने लगा था। समाज में वाणिज्यपतियों का बड़ा आदर था और राजा स्वयं उनसे आदर और सम्मान का व्यवहार करता था।



मुद्रा


आर्थिक जीवन की समृद्धि की द्योतक मुद्राएँ हुआ करती हैं। अतः आर्थिक दृष्टि से गुप्तकाल का महत्व इस बात में है कि गुप्त सम्राटों ने अत्यधिक मात्रा में सोने के सिक्के प्रचलित किए थे।

इस दृष्टि से इस युग को स्वर्ण युग कहा जा सकता है। भूमि के क्रय-विक्रय में मूल्य का निर्धारण इन्हीं सोने के सिक्कों में होता था। भू-कर के रूप में हिरण्य का उल्लेख मिलता है, इससे भी यह अनुमान होता है कि कर का कुछ अंश सिक्कों में वसूल किया जाता था। सिक्कों के रूप में कर की वसूली से यह भी कल्पना की जा सकती है कि कर्मचारियों को वेतन सिक्कों में ही दिया जाता रहा होगा। चूँकि सिक्के अधिकांशतः सोने के ही हैं, इसलिए वेतन भी इसी सिक्के में मिलता रहा होगा। तात्पर्य यह कि उच्च कर्मचारियों को ही वेतन में सोने के सिक्के दिए जाते रहे होंगे। इन सिक्कों को तत्कालीन अभिलेखों में दीनार अथवा सुवर्ण कहा गया है। कालिदास ने मालविकाग्निमित्रम् में दान के प्रसंग में निष्कशत सुवर्ण परिमाण का उल्लेख किया है। इससे प्रतीत होता है कि इसे निश्चित रूप से 'निष्क' भी कहते थे।


गुप्तकाल में सोने की अपेक्षा चाँदी के सिक्के मिलते हैं। साम्राज्य के पूर्वी भाग में तो चाँदी के सिक्के अत्यल्प मात्रा में मिले हैं। वे अधिकतर पश्चिमी भाग में ही पाए गए हैं, जहाँ सोने के सिक्कों का प्रायः अभाव है। अतः ऐसा जान पड़ता है कि सोने के सिक्कों का पूर्व में और चाँदी के सिक्कों का पश्चिम में प्रचलन था। यह बात अपने-आप में विचित्र जान पड़ती है। दोनों धातुओं के अलग क्षेत्र होने पर भी दोनों के बीच एक मूल्य निर्धारित था। सुवर्ण का एक सिक्का चाँदी के 25 सिक्कों के बराबर समझा जाता था जिसे 'रूपक' कहते थे।


ताँबे के सिक्के पूर्वी और पश्चिमी दोनों ही भागों में कम ही मिले हैं। मध्य भारत में एक मात्र रामगुप्त के सिक्के बड़ी मात्रा में पाए गए हैं, जो नाग सिक्कों की अनुकृति पर हैं। रामशरण शर्मा की धारणा है

कि ताँबे के सिक्कों का अभाव इस बात का द्योतक है कि गुप्तकाल में छोटे राज कर्मचारी अधिक संख्या में नहीं थे, जो उचित नहीं प्रतीत होता ।


इसी प्रसंग में यह भी द्रष्टव्य है कि अभिज्ञानशाकुंतलम् में मंत्री का कथन है किधन की गणना करते-करते सारा दिन बीत गया, इस बात का द्योतक है कि मुद्राओं का अत्यधिक प्रचलन था। दूसरी ओर फाहियान का कहना है कि क्रय-विक्रय में लोग कौड़ियों का प्रयोग करते थे। ये दोनों परस्पर विरोधी बातें कहते हैं; पर दोनों में से किसी की सत्यता से सहसा इनकार नहीं किया जा सकता। कदाचित् यह बात कुछ वैसी ही है जैसी आज से लगभग पचास वर्ष पूर्व तक सिक्कों के प्रचुर प्रचलन के बावजूद गाँवों में बहुत-सी चीजों के लेन-देन में कौड़ियों का व्यवहार होता था।