गुप्तकाल : स्वर्णकाल : विभिन्न मत (2) - Gupta period: golden period: different opinions (2)

गुप्तकाल : स्वर्णकाल : विभिन्न मत (2) - Gupta period: golden period: different opinions (2)

सामाजिक जीवन


गुप्तकाल में सामाजिक जीवन के क्षेत्र में भी विशेष उन्नति हुई। गुप्तों की दिग्विजय के परिणामस्वरूप भारतीय सामाजिक जीवन में एक नवीन स्फूर्ति का जन्म हुआ और भारतीय समाज ने उन्नति की ओर अग्रसर होना आरंभ किया। इस काल में जाति व्यवस्था की मान्यता कम होने लगी थी। वर्णों का आदर एवं सत्कार उनके कर्तव्य पालन के आधार पर किया जाता था। ब्राह्मणों का समाज में बड़ा मान था। इस काल में वे अपने कार्य को बड़ी योग्यता एवं तत्परता से किया करते थे। क्षत्रियों ने अपने कर्तव्य को बड़ी निष्ठा एवं सतर्कता से संपन्न किया। उन्होंने प्रत्येक समय प्रजा की रक्षा का भार अपने ऊपर लिया। वैश्य व्यापार एवं वाणिज्य की ओर विशेष ध्यान देते थे।

उनके प्रयत्नों से व्यापार एवं वाणिज्य की विशेष उन्नति हुई, जिसने भारतीयों के जीवन को अधिक उन्नत किया। शूद्रों ने अपनी शक्ति के अनुसार समाज सेवा संबंधी कार्य किए। शूद्रों की कुछ जातियाँ अछूत के रूप में मानी जाती थीं। वे नगर अथवा गाँव के एक किनारे निवास करती थीं। वे घृणा की दृष्टि से देखी जाती थीं। उसकी गणना | भारतीय समाज में नहीं की जाती थी। वे नगर तथा गाँव के भीतरी भागों में बहुत कम प्रवेश करते थे। जिस समय वे ऐसा करते थे तो वे ढपली बजाते थे, जिससे लोग मार्ग से हट जाएँ। इस समय वर्णों तथा व्यवसायों का परिवर्तन संभव था। अंतर्जातीय विवाह तथा प्रीतिभोज प्रथा का प्रचलन था। अतः इस काल के समाज में संकणिता का अभाव था।


(क) विवाह - गुप्तकालीन साहित्य के आधार पर कहा जा सकता है कि यह युग अंतर्जातीय विवाहों का युग था। इस काल के साहित्य में इस प्रकार के विवाहों की विशेष चर्चा है। गुप्तकालीन क्षत्रिय सम्राटों ने ब्राह्मण वाकाटकी के साथ वैवाहिक संबंधों की स्थापना की। इस समय विधवा विवाह निषेध नहीं माना जाता था। उसका भी प्रचलन था। चंद्रगुप्त विक्रमादित्य ने अपने ज्येष्ठ भ्राता रामगुप्त की विधवा पत्नी ध्रुवदेवी से विवाह किया। अनमेल वृद्ध विवाहों का भी प्रचलन था। स्वयं कुमारगुप्त ने अपनी वृद्धावस्था में एक नवयुवती कन्या से विवाह किया था। इस समय बहु-विवाह का भी प्रचलन था।


(ख) स्त्रियों का समाज में स्थान- गुप्तकालीन समाज में स्त्रियों को उन्नत स्थान प्राप्त था। माता का नाम पिता के साथ सम्मिलित किया जाता था। स्त्रियों की शिक्षा की ओर भी ध्यान दिया जाता था।

स्त्रियों ने शासन संबंधी कार्यों में अपने पतियों को बड़ा सहयोग प्रदान किया। प्रभावती गुप्ता ने शासन संचालन बड़ी योग्यता एवं दक्षता के साथ किया। साधारणतः स्त्रियों में पर्दाप्रथा का प्रचलन नहीं था। वे सामाजिक, धार्मिक आदि कार्यों में पुरुषों के समान भाग लिया करती थीं। सती प्रथा का आरंभ इसी काल में हुआ। गुप्तकालीन साहित्य में इस ओर संकेत किया गया है।


(ग) भोजन अधिकांश जनता का भोजन सात्विक था। प्रायः लोग शाकाहारी थे। फाहियान ने अनुसार - मांस, मदिरा, लहसुन, प्याज आदि का प्रयोग केवल चांडाल ही किया करते थे। इससे स्पष्ट होता है कि उस समय के लोगों पर जैन और बौद्ध धर्म का प्रभाव विशेष रूप से था।


(घ) वस्त्र, आभूषण जनता साधारण वस्त्रों का प्रयोग करती थी। साधारण श्रेणी के लोग सूती वस्त्र और उच्च श्रेणी के लोग रेशमी वस्त्रों का प्रयोग करते थे। स्त्रियाँ और पुरुष दोनों आभूषणों का प्रयोग करते थे। पुरुष धोती बाँधते थे और स्त्रियाँ साड़ी और चोली धारण करती थीं। इनको शृंगार का विशेष चाव था। स्त्रियाँ अपने केशों को विशेष प्रकार से गूँथती थीं।


धार्मिक स्थिति


और बौद्ध धर्म का पतन आरंभ हो गया था। (क) ब्राह्मण धर्म - गुप्तकालीन सम्राट ब्राह्मण धर्म के अनुयायी थे, किंतु उनकी धार्मिक नीति बड़ी उदार थी। जनता को धार्मिक स्वतंत्रता पूर्णरूप से प्राप्त थी। राजाओं की ओर से लोगों की धार्मिक भावनाओं तथा कृत्यों में किसी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं था।

इस काल में यज्ञों की बहुलता थी। ब्राह्मण धर्म का प्रभाव दक्षिणी प्रदेशों में भी होना आरंभ हो गया था। वैदिक धर्म में आवश्यक परिवर्तन किए गए। देवताओं का मानवीकरण किया गया। सूर्य की प्रतिमा की पूजा का प्रचलन हुआ। सूर्य के मंदिरों का निर्माण किया गया। विष्णु और शिव की विशेष रूप से उपासना की जाने लगी।


(ख) बौद्ध धर्म बौद्ध धर्म हीनयान और महायान नामक दो संप्रदायों में विभाजित हुआ। बौद्ध धर्मावलंबी बुद्ध की सर्वसत्ता और सर्वशक्तिमत्ता में विश्वास करने लगे। महात्मा बुद्ध तथा बोधिसत्वों की मूर्तियों का निर्माण किया जाने लगा और उनको मंदिरों में प्रतिष्ठित भी किया जाने लगा।

उनमें भी स्तुति पूजन तथा अर्चन की प्रथा का प्रचलन हुआ। महायान संप्रदाय में भक्ति के मार्ग का उदय हुआ। वह वैदिक धर्म के अधिक निकट आता हुआ दिखलाई देने लगा। अतः दोनों धर्मों में समन्वय की स्थापना आरंभ हुई। इस समय भी बौद्ध धर्मावलंबियों की संख्या बहुत थी। उस समय के लेखों से ऐसा आभास होता है। कि वैदिक प्रतिक्रिया तथा आवश्यक परिवर्तनों के कारण बौद्ध इस ओर प्रभावित होने लगे। कुछ समय के उपरांत बौद्ध अनुयायियों की संख्या में कमी होने लगी।


(ग) जैन धर्म - गुप्तकाल में जैन धर्म के अनुयायियों की संख्या बहुत कम थी। उनके आचरण संबंधी नियम कठोर होने के कारण भारतीय जनता उनकी ओर विशेष रूप से आकृष्ट नहीं हो सकी।

जैन धर्म उत्तर भारत की अपेक्षा दक्षिण में अधिक पल्लवित हुआ। जैनियों में भी मूर्ति प्रथा का प्रचलन वैदिक प्रभाव के कारण आरंभ हो गया था। उन्होंने भी अपने तीर्थंकरों की मूर्ति का निर्माण करना आरंभ किया और उनको मंदिरों में प्रतिष्ठित करने लगे तथा उनमें स्तुति, पूजन, अर्चन आदि की प्रथाओं का प्रचलन हुआ।


अतः यह कहा जा सकता है कि गुप्तकालीन युग ब्राह्मण धर्म के पुनरुत्थान का युग था। इस धर्म का प्रभाव अन्य धर्मों पर भी विशेष रूप से पड़ा जिसके कारण बौद्ध धर्म के अनुयायी उस धर्म में विलीन हो गए और जैन धर्म के अनुयायियों की संख्या न्यून हो गई। उनका कार्य क्षेत्र उत्तरी भारत से हटकर दक्षिण भारत हो गया।


आर्थिक स्थिति


गुप्तकालीन भारत में जनता की आर्थिक व्यवस्था बहुत उन्नत थी। इस काल में उत्पत्ति के साधन तथा आवागमन के मार्ग उन्नत थे। राज मार्ग विशेष रूप से सुरक्षित थे। जनता को चोर और डाकुओं का भय नहीं था। इसका कारण यह है कि लोगों को थोड़े परिश्रम से ही आवश्यक वस्तुएँ उपलब्ध हो जाती थी एवं चोरी की आवश्यकता नहीं पड़ती थी। कृषि, उद्योग, व्यापार, वाणिज्य आदि उन्नत दशा में थे। राज्य की ओर से उनकी उन्नति तथा विकास के लिए विशेष प्रयास किया जाता था। इस समय का बाह्य व्यापार बहुत उन्नत था तथा जल एवं स्थल मार्गों द्वारा किया जाता था। व्यवसायिकों के संघ थे। उनके अपने नियम तथा कोष थे। बैंक का कार्य संघ करते थे। इन संघों ने प्राचीन भारतीय आर्थिक व्यवस्था को संपन्न बनाने में बड़ा महत्वपूर्ण योग प्रदान किया। विनिमय के लिए कई प्रकार के सिक्के थे।


आर्थिक दृष्टि से गुप्त सम्राटों का शासनकाल समृद्धि का काल रहा। लोगों की जीविका का प्रमुख स्रोत कृषि कर्म था। इस युग के सम्राटों ने कृषि की उन्नति पर ध्यान दिया। प्रायः सभी प्रकार के अन्नों एवं फलों का उत्पादन होता था। सिंचाई की बहुत ही उत्तम व्यवस्था की गई थी। कालिदास के विवरण से पता चलता है कि इस समय धान एवं ईख की खेती प्रचुरता से होती थी। कृषि के साथ ही साथ व्यापार और व्यवसाय भी उन्नति पर थे। समूचे राज्य में अनेक व्यापारिक श्रेणियाँ तथा निगम थे। पाटलिपुत्र, वैशाली, उज्जयिनी, दशपुर भड़ौच, आदि इस काल के प्रसिद्ध व्यापारिक नगर थे। भड़ौच तथा ताम्रलिप्ति प्रमुख बंदरगाह थे।

स्थल तथा जल दोनों ही मार्गों से व्यापार होता था। इस समय भारत का व्यापार अरब फारस, मिस्र, रोम, चीन तथा दक्षिण-पूर्वी एशिया से होता था। बाह्य देशों में भारतीय वस्तुओं की बड़ी माँग थी। कालिदास के अनुसार चीनी रेशमी वस्त्र का भारत में प्रचार था। जलीय व्यापार के लिए इस समय बड़े-बड़े जहाजी बेड़ों का निर्माण किया गया था। जावा के बोरोबुदुर स्तूप के ऊपर जहाज के कई चित्र अंकित मिलते हैं जिससे इस बात की सूचना मिलती है कि भारतीयों ने बड़े-बड़े जहाजों द्वारा वहाँ प्रवेश किया था। सुप्रसिद्ध कलाविद् आनंद कुमारस्वामी के शब्दों में गुप्तकाल ही भारतीय पोत निर्माण कला का महानतम युग था जबकि पेगु कंबोडिया, जावा, सुमात्रा बोर्नियो में भारतीयों ने उपनिवेश स्थापित किए तथा चीन, अरब और फारस के साथ उनका व्यापारिक संबंध था। इस प्रकार निःसंदेह गुप्तकाल आर्थिक संपन्नता का काल था।


वैदेशिक संबंध


व्यापार के माध्यम द्वारा भारत का संपूर्ण विदेशों से संबंध स्थापित हुआ। जल तथा थल दोनों ही मार्गों से विदेशों से आवागमन होता था। भारत से अनेक प्रचारक तथा व्यापारी चीन, पूर्वी द्वीप समूह, सुमात्रा, जावा, आदि देशों में गए। उन्होंने वहाँ के निवासियों को अपनी सभ्यता एवं संस्कृति से प्रभावित किया। एशिया के पश्चिमी देशों में इसका विशेष रूप से प्रचार हुआ। अजंता की चित्रकारियों में एक ऐसा दृश्य है जिसमें भारतीय राजा की सभा में एक ईरानी दूतमंडल खिलाया गया है। इस प्रकार बृहत्तर भारत की नींव गुप्त काल में पड़ी।


गुप्त-काल भारतीय संस्कृति के प्रचार और प्रसार के लिए प्रसिद्ध है। यद्यपि गुप्त युग के पहले से ही उत्साही भारतीयों ने मध्य तथा दक्षिणी-पूर्वी एशिया के विभिन्न भागों में अपने उपनिवेश स्थापित कर लिए थे तथापि इन उपनिवेशों में हिंदू-संस्कृति का प्रचार विशेषतया गुप्त युग में ही हुआ।

फूनान, कंबुज, मलाया, चंपा, जावा, सुमात्रा, बाली, बोर्नियो, स्याम, बर्मा आदि इस समय के प्रमुख हिंदू राज्य थे। इन द्वीपों के शासक अपने को भारतीयों के वंशज मानते थे। तंत्रीकामन्दक नामक जावा के ग्रंथ में एश्वर्यपाल नामक सूर्यवंशी राजा अपने को समुद्रगुप्त का वंशज बताता है। प्रयाग प्रशस्ति में 'सर्वद्वीपवासिभिः का उल्लेख हुआ है। इससे तात्पर्य दक्षिणी-पूर्वी एशिया के द्वीपों से ही है। हम कह सकते हैं कि इन द्वीपों के शासकों ने समुद्रगुप्त को अपना सार्वभौम सम्राट मान लिया होगा। गुप्तकाल में अनेक भारतीय धर्म- प्रचारक चीन गए तथा फाहियान नामक प्रसिद्ध चीनी यात्री भारत आया। इसके अतिरिक्त तिब्बत, कोरिया, जापान तथा पूर्व में फिलीपीन द्वीप समूह तक भारतीय संस्कृति का प्रसार हुआ। इस सांस्कृतिक प्रचार के फलस्वरूप 'बृहत्तर भारत' का जन्म हुआ जो गुप्तकाल को गौरवान्वित करता है।