कुषाण युग(2) - Kushan Age(2)

कुषाण युग(2) - Kushan Age(2)

दिग्विजय और साम्राज्य विस्तार


फ़िस युग में कुषाण सत्ता उत्तरी पश्चिमी सीमांत प्रदेश (उत्तरापथ) में सीमित रही थी, परंतु कनिष्क ने अपने पराक्रम से उसे मध्य देश और उत्तरापथ तथा पश्चिम भारत में स्थापित कर विशाल कुषाण साम्राज्य बनाया, जिसमें कश्मीर भी सम्मिलित था। उसने पर्वतों के उस पार मध्य एशिया तक अपनी धाक जमाई। अनुश्रुति के साथ उसके अभिलेखों और सिक्कों से भी पुष्ट होता है कि उत्तरी भारत में उसका साम्राज्य फैला हुआ था। उसके अभिलेख पेशावर से मथुरा होते हुए सारनाथ तक पाए गए हैं, जिससे प्रकट होता है कि मध्य देश और मगध तक उसका अधिकार था। इससे स्पष्ट सिद्ध होता है कि कनिष्क एक महान विजेता था।


अंतर्वेदी


मध्य देश (सामान्यतः गंगा-यमुना दोआब या अंतर्वेदी) में उसके अधिकार के साक्ष्य, अभिलेखों और सिक्कों से मिलते हैं। उसका प्रारंभिक अभिलेख बनारस के निकट स्थित सारनाथ में मिला है। यह उसके राज्य के तीसरे वर्ष का है। इस लेख में महाराज कनिष्क के राज्य काल में जब वाराणसी और उसके आसपास का क्षेत्र (प्राचीन काशी राज्य) उसके क्षत्रप वनस्फर और खरपल्लन द्वारा शासित हो रहा था। खरपल्लन महाक्षत्रप था और वनस्फर एक क्षत्रप था। स्पष्ट है कि मध्य देश, जिसका केंद्र वाराणसी था, उसके राज्य का अभिन्न अंग था।


इस अभिलेख में भिक्षु बल द्वारा बोधिसत्व की मूर्ति और क्षत्रयष्टि प्रतिष्ठापित करने का उल्लेख है। यह मूर्ति मथुरा और इसके निकट स्थित रूपवास आदि खानों से निकलने वाले लाल पत्थर की है,

जिसके लिए मथुरा मूर्तिकला का केंद्र बन गया। यह मूर्ति मथुरा से ही सारनाथ को भेजी गई होगी। मथुरा भी कनिष्क राज्य का प्रसिद्ध केंद्र था। मथुरा में हुविष्क का अभिलेख मिला है। अतः मथुरा राज्य भी, जिसके स्वतंत्र अस्तित्व के साक्ष्य वहाँ के उपलब्ध सिक्के हैं, कनिष्क के राज्य में सम्मिलित था। कनिष्क की एक शिरहीन मूर्ति मथुरा के पास माट गाँव में पाई गई है, जो इस समय मथुरा संग्रहालय में है।


तिब्बती अनुश्रुति से ज्ञात होता है कि कनिष्क ने 'सोकेड' (साकेत) की विजय की थी। मौर्योत्तर युग में पुनः अयोध्या- साकेत (प्राचीन कौशल राज्य) के स्वतंत्र अस्तित्व का साक्ष्य यहाँ के विशिष्ट प्रकार के सिक्के हैं।

अतः स्पष्ट है कि कनिष्क को पूर्वी देश की विजय करने के पूर्व मथुरा और कौशल की भी विजय करनी पड़ी थी। वृहत्संहिता में भी अयोध्या राज्य और साकेत का उल्लेख मिलता है। कुषाणों के पराभव होने पर ही साकेत में गुप्तवंश का उदय हुआ।


आर्जुनायन देश भी जिसकी स्थिति आगरा, भरतपुर, अलवर प्रांतों में थी, कनिष्क के हाथों अपनी स्वतंत्रता खो बैठा। इसी प्रकार कुणिंदों और यौधेयों तथा मालवों के राज्यों को पराभूत होना पड़ा। इस प्रकार थानेश्वर से लेकर वाराणासी तक संपूर्ण मध्य देश कनिष्क के राज्य में सम्मिलित हो गया।


पूर्व देश


कनिष्क की मृत्यु के कुछ बाद लिखे गए। बौद्धग्रंथ कल्पनामं डितिका में इसके लेखक कुमारलात ने लिखा है, "कनिष्क ने पूर्वी भारत पर आक्रमण किया और उसे जीता। उसकी शक्ति अदम्य थी। पूर्व देश जीतने के बाद वह अपने देश को वापस गया। "


श्री धर्मपिटक निदान सूत्र के अनुसार, "कनिष्क ने पाटलिपुत्र पर आक्रमण किया और वहाँ के राजा को करद बनाया। साथ ही वहाँ से उसने बौद्ध आचार्य अश्वघोष को भी अपनी राजधानी में ले गया। बिहार विजय पर उसके सिक्कों की प्राप्ति से भी ज्ञात होता है।"


डॉ. चट्टोपाध्याय का विचार है, “चीनी वृत्तों के अनुसार उसने पश्चिमी बंगाल के कुछ भाग को भी जीता। मुरुंड नामक जाति, जिसे पूर्व देश से संबद्ध किया गया है, भी कनिष्क द्वारा पराजित हुई। " • भावलपुर (पाकिस्तान) प्रांत के सुइविहार नामक स्थान में कनिष्क के राज्य के 11 वें वर्ष का एक


पश्चिम देश


अभिलेख प्राप्त हुआ है, जिसके अनुसार महाराज राजाधिराज देव-पुत्र कनिष्क इस क्षेत्र में राज्य कर रहे थे। सुइविहार जोहियाबार अर्थात् यौधेयगण के पुराने राज्य में स्थित है। अतः यह स्पष्ट है कि यौधेयों से ही यह प्रांत कनिष्क ने छीना होगा।


सुइविहार के दक्षिण पश्चिम में स्थित सिंध प्रांत भी उसके अधिकार में रहा होगा। कुषाण अक्षरों से युक्त कुछ पुराने मिट्टी के बर्तनों के टुकड़े थल घाटी लोराकाई और बिलोचिस्तान में मिले हैं। इन के आधार पर स्टेन का मत है कि कनिष्क या उसके उत्तराधिकारी के शासन काल में कुषाण राज्य का प्रसार हुआ।


उत्तरापथ


पुराणों और राजतरंगिणी में कुषाणों को तुरुष्क कहा गया है। अतः स्वाभाविक था कि वे उत्तरापथ के स्वामी थे, जहाँ कैडफाइसिस प्रथम और द्वितीय ने अपना राज्य स्थापित किया था। कनिष्क ने इस राज्य का चतुर्दिक विस्तार किया।


सिंधु नदी के पश्चिमी तट पर ओहिंद के निकट स्थित जेदा गाँव से संवत् 1 का एक लेख मिला है, जिससे कनिष्क का इस प्रदेश में अधिकार सिद्ध होता है। इसी क्षेत्र में उसकी राजधानी पुरुषपुर (पेशावर) भी स्थित थी।


हुआन सांग के अनुसार गांधार उसके राज्य में सम्मिलित था। कनिष्क के सिक्कों पर ईरानी (पारसी) और यूनानी देवी देवताओं के नाम तथा मूर्तियाँ अंकित मिलती हैं। इन सिक्कों का प्रचलन इन लोगों में ही मुख्य रूप से था जो विदेशी थे और उत्तरी पश्चिमी सीमांत प्रदेश में बसे हुए कनिष्क की प्रजा थे। कनिष्क के प्रयास और प्रोत्साहन से इस युग में यहाँ गांधार कला प्रस्फुटित हुई, जिसके फलस्वरूप बामियान के आसपास आज भी विशाल बौद्ध मूर्तियाँ उपलब्ध हैं।"



कल्हण की राजतरंगिणी के अनुसार, "कश्मीर उसके राज्य में सम्मिलित था और कनिष्कपुर नामक नगर की स्थापना भी कनिष्क ने ही की थी।"


मध्य एशिया


इस युग में चीन राज्य के सेनापति पंचाऊ ने चीनी सत्ता का अधिक विस्तार किया। वह विजय करता हुआ रोम राज्य की सीमा तक पहुँच गया। महाराज कनिष्क की महत्वकांक्षा ने भी करवट ली और उसने अपनी दृष्टि मध्य एशिया की ओर डाली। उसने पंचाऊ के पास अपने दूत द्वारा एक संदेश भेजा कि चीनी सम्राट अपनी कन्या का विवाह उसके साथ करे। इस संदेश को चीन के लिए अपमानजनक समझ कर उसने दूत को बंदी बना लिया, जिससे क्रुद्ध होकर कनिष्क ने घुड़सवारों की एक प्रचंड सेना को चीन विजय के लिए भेजा।

दुर्गम पर्वतीय मार्ग को पार कर जब यह सेना घाटी के नीचे चीन में उतरी तब पंचाऊ ने इनको बड़ी सुगमता से पराजित कर दिया। अब कनिष्क को विवश होकर प्रति वर्ष चीन सम्राट को कर देना पड़ता था। इसका उसके राज्य की दृढ़ता पर कोई असर न पड़ा और भारतीय प्रांतों पर उसका अधिकार शिथिल न हुआ।


कुछ समय बाद सेनापति पंचाऊ की मृत्यु हो गई और अब पुनः कनिष्क ने आक्रमण किया और काशगर, यारकंद तथा खोतन के प्रांतों पर अधिकार जमाया। अनुश्रुति के अनुसार कहा जाता है कि कनिष्क ने बंधक की भांति चीनी राजकुमार को लाकर कश्मीर में रख दिया। इस कार्य से मध्य एशिया के साथ भारत का सांस्कृतिक आदान-प्रदान द्रुत गति से बढ़ गया। इस प्रकार स्पष्ट है कि कनिष्क का साम्राज्य अत्यंत विशाल था, जिसे उसने सुशासन द्वारा सुदृढ़ और मुख्यवस्थित किया।