राजपूतों की उत्पत्ति संबंधी मत एवं समीक्षा(2) - Opinion and review on the origin of Rajputs (2)
राजपूतों की उत्पत्ति संबंधी मत एवं समीक्षा(2) - Opinion and review on the origin of Rajputs (2)
विदेशी मत
(1) टॉड का मत
राजपूतों के विदेशी मूल की विचारधारा का प्रतिपादन सर्वप्रथम कर्नल जेम्स टॉड ने किया था। राजपूताना का इतिहास लिखते समय प्रथमतः उनका ध्यान पृथ्वीराज रासो तथा अन्य चारण ग्रंथों के उन उल्लेखों ने आकर्षित किया जहाँ प्रतिहारों, चाहमानों, परमारों एवं चालुक्यों की उत्पत्ति वशिष्ठ द्वारा आबू पर्वत पर किए गए यज्ञ कुंड से बताई गई थी। इन श्रुतियों को कल्पना मात्र स्वीकार करते हुए उन्होंने राजपूतों की उत्पत्ति विदेशियों अर्थात् सीथियायी जातियों से मान ली। इस निष्कर्ष पर पहुँचने के लिए प्रमुख आधार यह था कि सीथियायियों और राजपूतों के कुछ रीति-रिवाज तथा पूजा पद्धतियों एवं अन्य परंपराएँ समान थीं।
उपरोक्त विद्वान के तर्कों को मानने में अनेक आपत्तियाँ हैं। सबसे आश्चर्यजनक बात यह है कि इनके द्वारा दिए गए तर्कों में परस्पर मतभेद है। आपने एक ओर यज्ञ विध्वंसक असुरों दैत्यों तथा दानवों की पहचान Indo seythic Tribes से की है, जो उत्तर पश्चिम में निवास करती थी तथा उन्होंने ब्राह्मणों का अनादर किया था। लेकिन दूसरी तरफ प्रतिहारों, चाहमानों, परमारों एवं चालुक्यों की भी पहचान सीथियायियों का रक्षक जातियों से की है। इससे ऐसा निष्कर्ष निकलता है कि आक्रमणकारी तथा रक्षक एक ही थे तथा ब्राह्मणों के षडयंत्र से आपस में ही संघर्ष कर बैठे। लेकिन यहाँ यह ध्यान देने योग्य है कि इंडो-सीथियन जातियों ने जैसा कि उन के लेख एवं मुद्राएँ सूचित करती हैं ब्राह्मणों और उनके धर्म के प्रति शत्रुता नहीं प्रदर्शित की।
इसके अतिरिक्त हम देखते हैं कि रीति-रिवाजों में समानता के आधार पर प्रस्तुत किए गए टॉड महोदय के तर्क सत्यता की कसौटी पर खरे नहीं उतरते। उनमें कल्पना शक्ति का आधार अधिकांशतः दृष्टिगोचर होता है।
राजपूत यहाँ के मूल निवासियों की संतान थे अथवा विदेशियों की? इस पर विचार करते हुए टॉड महोदय ने अग्निकुलीय राजवंशों के बाह्य शरीर की रचना एवं बनावट तथा रंग-रूप की समानता सीथियायियों से करके उन्हें सीथियायी होने का तर्क प्रस्तुत किया, जबकि इनके अनुसार यहाँ के मूल निवासी अग्निकुलों के विपरीत कद के छोटे, काले तथा भद्दे थे। टॉड द्वारा दोनों की समानता में दिए गए अन्य प्रमाण इस प्रकार हैं-
1. रहन सहन एवं वेष भूषा में समानता
2. अश्वमेध यज्ञ प्रचलन
3. मांसाहारी भोजन
4. युद्ध में रथों का प्रयोग
5. शस्त्रास्त्रों की पूजा परंपरा आदि।
अनेक मत राजपूतों एवं सीथियायियों की समानता में प्रस्तुत किए गए। परंतु इनकी समानता का सशक्त आधार नहीं है, क्योंकि ये वैदिक परंपराएँ थी,
जो वैदिक काल से चली आ रहीं थीं। जहाँ तक शरीर रचना का प्रश्न है आर्यों तथा सीथियायियों को स्वयं भारतीय ईरानियों से संबंधित माना गया है। इसके अतिरिक्त अनेक ऐसी परंपराएँ, रीति-रिवाज एवं धार्मिक विश्वास राजपूतों में देखने को मिलते हैं, जो सीथियनों में नहीं पाए जाते थे।
क्षत्रियों को हम अश्वमेध के अतिरिक्त वाजापेय तथा राजसूय यज्ञ करते हुए पाते हैं, जबकि सीथियनों को इसका ज्ञान न था। सामाजिक रीति-रिवाज भी दोनों में विभिन्नता प्रदर्शित करते हैं तथा वस्त्राभूषण भी समान नहीं पाए जाते। राजपूतों का जीवन चार आश्रमों में बँटा था।
वे कभी प्रातः काल की दिनचर्या (स्नान एवं प्रार्थना) नहीं भूलते थे। किसी व्यक्ति विशेष द्वारा हम विभिन्न देवताओं की उपासना करते हुए पाते हैं। विभिन्न धर्मों के प्रति आस्था रखते हुए भी हम पति-पत्नियों के आपसी संबंधों में त्रुटि नहीं पाते। उनका प्राचीन परंपराओं के प्रति अगाध प्रेम था तथा वे कर्तव्य निष्ठ थे। तुर्कों की कड़ी चुनौती एवं कुर्यवहार के बावजूद भी वे अपनी आचरण संहिता को भंग करना पाप समझते थे। अनेक युद्धों के पश्चात् भी उन्होंने अपने सिद्धांतों को नहीं त्यागा।
युद्ध के अतिरिक्त प्रशासन में भी वे अपने को 'रक्षक' समझकर प्रजा की रक्षा एवं देश की मान मर्यादा का पालन अपना प्रमुख धर्म समझते थे। सीथियायियों के विचार इस संबंध में राजपूतों से भिन्न थे।
अतः कल्पना शक्ति पर आधारित अनैतिहासिकता के दोष से परिपूर्ण कर्नल टॉड का मत कदापि स्वीकार करने योग्य नहीं है।
(2) क्रुक का मत
कर्नल टॉड के समान से ही अनेक भारतीय तथा यूरोपीय इतिहासकारों द्वारा राजपूतों की उत्पत्ति पर विभिन्न मत व्यक्त किए। जैसे-जैसे नए ऐतिहासिक तथ्य प्रकाश में आते गए नई-नई विचारधाराओं का जन्म होता गया परंतु लगभग सभी मतों का प्रमुख आधार मूलतः अग्निकुल विचारधारा ही था।
इसी समय विलियम कुक ने अपना नया मत प्रतिपादित किया कि ब्राह्मणों ने तत्कालीन समाज में फैले बौद्ध एवं अन्य नास्तिक धर्मों को दबाने के लिए यहाँ बसी हुई कुछ विदेशी जातियों को शुद्ध
प्रक्रिया द्वारा पवित्र कर नए राजवंशों की नींव डाली। स्पष्ट है कि इतिहास तत्कालीन समाज में घटित ऐसी किसी भी घटना पर प्रकाश नहीं डालता।
अतः काल्पनिक मनगढ़ंत एवं अनैतिहासिकता के दोष से परिपूर्ण मत स्वीकार करना उचित नहीं होगा।
(3) स्मिथ का मत
राजपूतों के विदेशी मूल की विचारधारा के प्रति समर्थकों में स्मिथ का नाम प्रमुख है, लेकिन इनका मत भी सत्यता की कसौटी पर खरा नहीं उतरता, बल्कि इनके तर्क आपस में विरोधाभास उत्पन्न करते प्रतीत होते हैं। वे लिखते हैं-
"I have no doubt that the ruling families of both the Sakas and Kushanas, when they become Hinduised, were admitted rank as Kshatriyas in the Hindu caste system."
दूसरी तरफ वे आगे लिखते हैं-
'The earliest foreign immigration within the limits of historical period which
can be verified, is that the Sakas in 2nd century B.C. and the next is that of the yue-
chi or Kushanas in the first century after Christ. Probably none of the existing
Rajput clans can carry back their genuine pedigrees nearly so far."
लेकिन वास्तव में ये प्रारंभिक अविकसित राज परिवार शकों एवं कुषाणों द्वारा आक्रांत हुए। •शकों ने उत्तर पश्चिम तथा मथुरा में अस्थायी रूप से शासन किया जबकि उनका प्रमुख शासित क्षेत्र मालवा और सौराष्ट्र था। वहाँ उन्होंने लगभग 400 वर्षों तक शासन किया तथा गुप्तकाल में चंद्रगुप्त द्वितीय/विक्रमादित्य के समय उनकी प्रभुता समाप्त हो गई तथा अब तक वे अपने प्राचीन नाम 'शक' द्वारा ही जाने जाते रहे और यद्यपि आगे चलकर हिंदू धर्म एवं संस्कृति स्वीकार कर वे हिंदू वर्ण व्यवस्था में समा गए तथा राजनैतिक क्षेत्र में उन्हें विदेशी ही माना जाता रहा।
शकों की तरह कुषाण भी यद्यपि कालांतर में हिंदू वर्ण व्यवस्था में शामिल हो गए तथापि उन्होंने शायद अपने को क्षत्रिय वंशो से जोड़ना अच्छा न समझा और लगभग 8 शताब्दियों तक वे हिंदू समाज से पृथक रहकर अपने को गर्व के साथ 9 वीं शताब्दी तक कुषाणों की यूची शाखा के सबसे महान शासक कनिष्क का वंशज मानते रहे। स्मिथ ने स्वयं लिखा है-
"The Turkey Sahiyas in the ninth century boasted their descent from the great Kushana king Kaniska."
उच्च सामाजिक स्थिति के प्रति सजग क्षत्रिय भी समाज में अपने पद पर प्रतिष्ठित रहे। इस प्रकार 9वीं शताब्दी तक दोनों का स्वाभिमान आपस में विलीनीकरण को बचाता रहा। ऐसी स्थिति में शक एवं कुषाणों से क्षत्रियों की उत्पत्ति का संबंध जोड़ना पूर्णतः असंगत है।
अग्निकुल विचारधारा पर टिप्पणी करते हुए स्मिथ ने क्रुक महोदय के मत का समर्थन कर अग्नि कुलीय मिथक को इस बात का द्योतक माना है कि विदेशी आक्रमणकारियों को अग्नि द्वारा शुद्ध संस्कार से पवित्र कर हिंदू समाज में दीक्षित कर लिया गया।
इस संस्कार का स्थल दक्षिण राजपूताना था। लेकिन भौगोलिक स्थिति पर दृष्टिपात करने से स्पष्ट हो जाता है कि प्रतिहारों के अतिरिक्त अन्य राजवशों का उदय स्थल दक्षिण राजस्थान नहीं था।
प्रतिहारों को निश्चित रूप से गुर्जरों की संतान मानते हुए अपने अन्य तीन राजवंशों की उत्पत्ति भी गुर्जरों अथवा उन्हीं के साथ भारत में प्रविष्ट होने वाले अन्य विदेशियों से मान ली। लेकिन चूँकि इन राजवंशों से भिन्न-भिन्न स्थानों से भिन्न-भिन्न कालों में पृथक्-पृथक् अपनी राजनैतिक सत्ता की स्थापना की। इसीलिए इनमें आपस में घनिष्ट संबंध स्थापित नहीं किया जा सकता। इसी आधार पर स्मिथ का यह मत भी स्वीकार नहीं किया जा सकता है कि "राजपूतों का 8 वीं 9 वीं शताब्दी में उत्तर भारत में उदय हुआ।"
प्रतिहारों के विषय में गुर्जरों अथवा गुज्जरों से उनकी उत्पत्ति की स्मिथ की निश्चित धारणा भी दोषपूर्ण है। अनेक भारतीय विद्वानों ने इस मत का खंडन कर सबल तर्कों द्वारा प्रतिहारों को क्षत्रिय स्वीकार किया है।
पुनः स्मिथ द्वारा क्षत्रिय शब्द का अर्थ संदिग्ध मानते हुए इसका अर्थ- 'Simply denoting the Hindu ruling class which did not claim Brahmin descent." मानना भी असंगत प्रतीत होता है।
प्राचीन राजवंशों से मध्यकालीन राजवंशों का संबंध जोड़ने में स्मिथ महोदय को सबसे बड़ी आपत्ति प्राचीन परंपराओं का आधुनिक समाज में लुप्त हो जाने के कारण है जबकि मध्यकालीन परंपराएँ आज भी जीवित हैं।
दुर्भाग्यवश सामाजिक ढाँचे के विकास एवं परिवर्तन को समझे बिना आपने हूणों के भारत में आगमन को प्राचीन परंपराओं के लुप्त हो जाने का कारण मान लिया तथा इन्हीं विदेशियों से मध्यकालीन राजवंशों की उत्पत्ति स्वीकार कर ली। लेकिन मनुस्मृति के अनुसार अनार्य अथवा विदेशी जातियाँ पौण्ड्क, चोल, द्रविड़, कंबोज, यवन, शक, पारद, पहलव, चीनी, किरात, दरद आदि क्षत्रिय जातियाँ धीरे-धीरे हिंदू समाज में सम्मिलित होकर शूद्रत्व को प्राप्त हो गई।
पाणिनि ने भी यवनों और शकों को शूद्र वर्ण में सम्मिलित किया है। इस प्रकार प्राचीन साहित्य एवं धर्मशास्त्रों से विदेशी जातियों का शूद्र वर्ण में विलय हो जाने का प्रमाण प्राप्त होता है।
इसके अतिरिक्त हूण केवल प्रमुख रूप से देश के पश्चिमी भाग (पंजाब, राजस्थान, मालवा आदि) तक ही सीमित रह सके तथा समाज पर उनका कोई विशेष सांस्कृतिक प्रभाव नहीं पड़ा। ऐसी स्थिति में यह मान लेना कठिन है। कि उनके द्वारा सामाजिक या राजनैतिक तंत्र में कोई परिवर्तन हुआ। विक्रम संवत 950 का ऊना अभिलेख, हूणों की बर्बरता का प्रमाण है। अतः अभी वे हिंदू समाज में उपयुक्त स्थान ग्रहण न कर सके थे।
अतः प्राचीन परंपराओं के लुप्त हो जाने का कारण हूण आक्रमण तथा इन्हीं से क्षत्रिय राजवंशों की उत्पत्ति मान लेना मनगढ़ंत मात्र प्रतीत होता है।
वास्तव में इसका कारण सामाजिक ढाँचे का विकास ही था। फलतः कुछ प्राचीन रीति-रिवाज परंपराएँ या तो विस्मृत हो गई अथवा त्याग दी गई, जिनका स्थान नए रीति रिवाजों ने ले लिया, जो सदियों तक प्रचलित रहीं।
स्वदेशी मत
राजपूतों को भारतीय क्षत्रिय वंशीय होने का तर्क प्रस्तुत किया है। सामाजिक ढाँचे के विकास के समय देश को विदेशी आक्रमणों का शिकार होना पड़ा। फलतः यहाँ के प्राचीन शाही परिवार अपनी शक्ति एवं वैभव को खोकर भोजन एवं सुरक्षा की खोज में भ्रमण करती हुई यह जातियाँ नए-नए व्यवसायों को ग्रहण कर विभिन्न नामों से समाज में उभर आई। इसी समय विदेशी भी धीरे-धीरे हिंदू समाज में अपना पैर जमाने लगे। परिणाम स्वरूप समाज में परिवर्तन होना स्वाभाविक था, परंतु नई सामाजिक संस्थाओं की स्थापना से अनेक जातियों एवं उपजातियों की उत्पत्ति के बावजूद भी चारों मूल वैदिक वर्ण ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र, अपने विशेष रीति रिवाजों एंव - परंपराओं के साथ सामाजिक संगठन के मूल स्तंभ बने रहे तथा समय समय पर राजनैतिक चढ़ाव उतार के बावजूद भी क्षत्रियों का एक वर्ग के रूप में अस्तित्व बना रहा, जिनके माध्यम से कुछ प्राचीन परंपराएँ समाज में प्रचलित रहीं।
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