गुप्तोत्तरकाल (उत्तर भारत) : सामाजिक स्थिति (2) - Post-Gupta Period (North India): Social Status(2)

गुप्तोत्तरकाल (उत्तर भारत) : सामाजिक स्थिति (2) - Post-Gupta Period (North India): Social Status(2)

संस्कार


संतान प्राप्ति के लिए गर्भाधान संस्कार किया जाता था। गर्भधारण के चैथे मास में सीमन्तोन्नयन नामक संस्कार तथा पुत्र प्राप्ति होने पर जात्तकर्मन, नामकरण आदि संस्कार किए जाते थे। संतान उत्पन्न होने पर उस घर में अन्य व्यक्ति अन्न जल ग्रहण नहीं करते थे। यह अवस्था सभी जातियों के लिए अलग- अलग थी। संतान के तीन वर्ष का हो जाने पर चूड़ाकरण संस्कार तथा आठ वर्ष का हो जाने पर कर्णभेद नामक संस्कार किया जाता था।


मृतक का दाह संस्कार किया जाता था परंतु आश्रम में रहने वाले सिद्ध पुरुषों को समाधिस्थ किया जाता था। अलबरूनी का कथन है

कि निर्धनता के कारण जो व्यक्ति शव का दाहकर्म करने में असमर्थ होते थे वे शव को खुला छोड़ देते थे या जल में प्रवाहित कर देते थे। अल- उतबी का कथन है कि शव को जलाने के पश्चात् उसके अवशेषों को नदी में प्रवाहित कर दिया जाता था ऐसा करने से मृतक के पाप नष्ट हो जाते हैं। अलबरूनी कहता है कि मृतक के दाह स्थल पर स्मृति चिह्न बनाया जाता था। मृतक के संस्कार के पूर्व उसे स्नान कराया जाता था तथा उसकी केशसज्जा की जाती थी। तत्पश्चात् चंदन तथा तीव्र अग्निग्राही पदार्थों की सहायता से उसका दहन किया जाता था। मृतक के शव के साथ जो व्यक्ति दाह स्थल तक जाते थे वे लौटते समय अपने कपड़े साफ करते तथा केशों को मुंडवाते थे। शव घर में रहने पर कोई भोजन आदि ग्रहण नहीं करता था। अलबरूनी के वर्णन के अनुसार दाहकर्म के दसवें व तेरहवें दिन विशेष उत्सव होते थे तथा इनका क्रम एक वर्ष तक चलता था।


धर्म और दर्शन


गुप्तोत्तर काल की प्रमुख धार्मिक घटना बौद्ध धर्म का पतन और भागवत धर्म का पुनरूत्थान है। यद्यपि वर्धनकाल इसका अपवाद है। वैष्णव धर्म राजा तथा प्रजा दोनों में समान रूप से लोकप्रिय था। वैष्णव के अतिरिक्त, शैव, शाक्त, और सौर संप्रदाय भी समाज में प्रचलित थे। विष्णु भगवान की पूजा अनेक नामों से की जाती थी, यथा, गरुड़ासनदेव, चक्रस्वामिदेव, त्रैलोक्यमोहन, माधव, वामन, स्वामीदेव, मुरारी आदि। अभिलेखों में उनके दशावतारों मत्स्य, कूर्म, वराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध और कल्कि के नाम मिलते हैं। विष्णु का राम रूप इस काल में लोकप्रिय न था। किसी भी प्रतीहार कलाकृति या अभिलेख में राम की प्रतिमा या देवालय निर्माण का उल्लेख नहीं किया गया है। 


मंदिर एवं प्रतिमाएँ


मंदिरों और मूर्तियों की स्थापना पुण्य कार्य समझा जाता था। गुप्तोत्तर कालीन अनेक अभिलेखों में इसके प्रमाण मिलते हैं। उदाहरणार्थ ग्वालियर अभिलेख से ज्ञात होता है कि नागभट्ट के पौत्र तथा वल्लभट्ट के पुत्र ग्वालियर के कोट्टपाल अल्ल ने विष्णु देवालय का निर्माण कराया था। पहेवा अभिलेख में कन्नौज के निकट भोजपुर ग्राम में ब्राह्मण गूवक द्वारा विष्णु देवालय निर्माण का उल्लेख है। इसी गूवक ने पहेवा में यजनवराह देवालय का निर्माण भी कराया था। प्रतीहार अभिलेखों में बीस से अधिक देवालयों के नाम मिलते हैं जिनका निर्माण प्रतीहार राजाओं ने कराया था। मंदिरों की आर्थिक व्यवस्था के लिए ग्राम, भूमि, भवन आदि दान किए जाते थे। भैल नामक एक व्यापारी ने वामन स्वामीदेव के देवालय को दान दिया था, चण्डुक नामक अन्य व्यापारी ने एक विष्णु देवालय को दान दिया था।


इस समय अनेक विष्णु प्रतिमाओं का निर्माण हुआ। जोधपुर अभिलेख में परमेश्वर का चतुर्मुखी वर्णन है। वे शंख, चक्र, गदा, कमल और कौस्तुभमणि धारण किए हैं। शेषशायी रूप में वे अनेक देवालयों में प्रदर्शित हैं। प्रतीहार नरेशों ने वैष्णव धर्म को प्रोत्साहन दिया था। अभिलेखों में प्रतीहार नरेश देवशक्ति को परम वैश्णव कहा गया है।


धार्मिक संप्रदाय


शैव संप्रदाय भी समाज में लोक प्रिय था। अभिलेखों में इनके नाम उमा महेश्वर, त्रिलोचन, लच्छुकेश्वर महादेव, योगस्वामिन, शंभू सिद्धेश्वर महादेव, पशुपति, महाकाल, काल प्रिय,

तथा अघोरेश्वर मिलते हैं। शिव की पूजा अधिकतर लिंग रूप में की जाती थी। इनकी स्थापना देवालय में ही जाती थी। बाऊक के जोधपुर अभिलेख में कहा गया है कि प्रतीहार राजा सिल्लुक ने पवित्र स्थान त्रेता में सिद्धेश्वर महादेव देवालय का निर्माण कराया था। राजोर अभिलेख के अनुसार मथनदेव ने शिवालय निर्माण के पश्चात् उसे एक गाँव दान में दिया था। कामन अभिलेख का उल्लेख है कि गुर्जर प्रतीहार नरेश के भोज ने एक शिवालय की आर्थिक व्यवस्था के लिए धन दान दिया था। देवालयों का प्रबंध गोष्ठिकाओं द्वारा होता था। देश में बहुसंख्यक शैवाचार्य और पाशुपत संन्यासी थे। इनके अनेक मठ थे। परताबगढ़ अभिलेख में महेन्द्रपाल द्वारा दशपुर स्थित मठ में निवास करने वाले हरी नामक ऋषि को दान देने का उल्लेख किया गया है।

राजोर अभिलेख में स्वीकाष्ठ शिवाचार्य और ओंकार शिवाचार्य के नाम दिए गए हैं। अनेक प्रतीहार नरेश शैव धर्मोपासक थे। वत्सराज, महेन्द्रपाल द्वितीय और त्रिलोचन पाल को शैव कहा गया है। इनके द्वारा शिवालयों को दिए गए दान के उल्लेख मिलते हैं। चाहमान भतृवृद्ध जैसे अनेक प्रतीहार सामंत भी शैव मतावलंबी थे।


इसके अतिरिक्त सूर्य पूजा के भी प्रमाण मिलते हैं। तत्कालीन अभिलेखों में सूर्य के विभिन्न नाम यथा-इंद्रराजादित्यादेव, इंद्रादित्यादेव तरुणादित्यदेव,

तथा गंगादित्यदेव मिलते हैं। सियादोनी अभिलेख में इनका एक अन्य नाम भिल्लस्वामिन देव मिलता है। प्रतीहार नरेश रामभद्र और विनायकपालदेव आदित्यभक्त कहे गए हैं। अभिलेखों में विनायक, कार्तिकेय, इंद्रमाधव तथा लउडेश्वर नामक देवालयों के नाम भी मिलते हैं।


शक्ति की आराधना भगवती, चंडिका या चामुण्डा श्री अम्बालोही देवी, लक्ष्मी, वयाक्षिणीदेवी, वसुधारा, सर्वमंगलदेवी, कंचनदेवी, गंधदेवी, गौरी और वाम्मूर्तिदेवी रूप में होती थी। प्रतीहार युगीन शिल्प में इन देवियों का शिल्पांकन अत्यधिक संख्या में किया गया है। प्रतीहार नरेश नागभट्ट द्वितीय और भोज प्रथम भगवती के उपासक थे।


गुप्तोत्तर राजाओं का धर्म अलग-अलग होते हुए भी राज्य में पूर्ण धार्मिक सहिष्णुता थी। वैष्णवों और शैवों के संबंध परस्पर अच्छे थे। सामान्यतः शिवालय में ब्रह्मा, विष्णु और सूर्य की प्रतिमाएँ प्रतिष्ठित की जाती थीं। शैवाचार्यों द्वारा शिवालय के साथ वैष्णव देवालयों की व्यवस्था करने के अनेक उदाहरण मिलते हैं। नीलगुंड अभिलेख में विष्णु, ब्रह्मा, और शिव की स्तुति एक साथ की गई है। 


धार्मिक अनुष्ठान


देवी-देवताओं की पूजा के निमित्त पुजारी होते थे। अलबरूनी के वर्णन के अनुसार विष्णु की आराधना करने वाले भागवत, सूर्य की आराधना करने वाले मग, तथा महादेव की आराधना करने वाले सिद्ध कहलाते थे।

ये मस्तक पर जटा तथा गले में अस्थियों की माला धारण करते थे। संपूर्ण शरीर में भस्म लपेटते थे और तालाब में स्नान करते थे।


वैदिक धर्म का पालन करने वाले प्रातः तथा संध्याकाल में नियम से यज्ञ करते थे। इनके धर्म में अग्नि का महत्व था। अत्रिसंहिता में वर्णन है कि जो ब्राह्मण अग्निहोत्र नहीं करता उसे भोजन नहीं करना चाहिए। अलबरूनी का कथन है कि दुर्गा, महादेव, क्षेत्रपाल आदि देवी-देवताओं के नैवेद्य हेतु भेड़, मुर्गे या भैंसे की बलि दी जाती थी। हिंदू प्रतिदिन शरीर का शुद्धीकरण करके भगवद् भोजन करते थे। ब्राह्मण प्रतिदिन तीन समय नहाते थे। व्यास ने गायित्री, सावित्री तथा सरस्वती तीन अनिवार्य संध्याओं का वर्णन किया है।

इनका पालन प्रत्येक ब्राह्मण को आवश्यक था। समाज में धार्मिक अनुष्ठान और उपवासों का महत्व था। पंचगव्य का भक्षण कर उपवास का समापन किया जाता था।


प्रतिमा पूजन के साथ-साथ मंदिर, ब्राह्मण व सन्यासियों आदि को दान-दक्षिणा देना पुण्य कार्य समझा जाता था। ग्रहण, श्राद्ध, जातकर्म, नामकरण, वर्षगाँठ उत्सव, उत्तरायण, दक्षिणायन, संक्रांति अक्षयतृतीया, तथा वृद्धि मास के अवसरों पर दान दिए जाते थे। दान सामग्रियों में ग्राम, भूमि, सोना, गाय, वस्त्र, अनाज, आदि का दान दिया जाता था। बंगाल एशियाटिक सोसायटी अभिलेख में प्रतिष्ठान भुक्ति में वाराणसी विषय के अंतर्गत टिक्करिका ग्राम दान में दिए जाने का उल्लेख है।

यह दान चंद्रग्रहण के अवसर पर दिया गया था। परताबगढ़ अभिलेख में व्यापारी माधव द्वारा मीन संक्रांति के पुण्य पर्व के अवसर पर धाराभद्रक नामक ग्राम दान देने का उल्लेख है। झूसी अभिलेख में त्रिलोचनपाल द्वारा गंगा स्नान तथा शिवपूजन के पश्चात् लधुंदक नामक ग्राम प्रतिष्ठान के छह हजार ब्राह्मणों को दान देने का उल्लेख है। यह दान दक्षिणायन संक्रांति के अवसर पर दिया गया था।


तीर्थ यात्रा करना समाज में लोकप्रिय था। वाराणसी, पुष्कर, कुरूक्षेत्र, मथुरा और मुल्तान प्रमुख तीर्थ स्थल थे। तीर्थ यात्रा विभिन्न हेतुओं की पूर्ति के लिए की जाती थी।

तीर्थ स्थलों पर तीर्थ यात्री केश मुंडवाते थे। कर्म तथा पुनर्जन्म का विश्वास हिंदूसमाज में गहराई से व्याप्त था। अरब यात्री का कथन है कि पुनर्जन्म में हिंदुओं का दृढ़ विश्वास है। उनका विश्वास है कि आत्मा अमर है तथा वह शरीर परिवर्तन करती है।


दार्शनिक परंपराएँ


तत्कालीन भारतीय दर्शन अनेक शाखाओं में विभाजित था। जिनमें शंकर दर्शन, वैशेषिक, पाशुपति, कुलाचार्य, सांख्य और ब्राहस्पत्य दर्शन प्रमुख हैं। इस समय तक जैन तथा शैव दर्शन में संघर्ष प्रारंभ हो गया था। जैन धर्म दक्षिण भारत में अधिक पल्लवित हो रहा था। उत्तर भारत में इसका प्रभाव क्रमशः कम होता जा रहा था। गुप्तोत्तर युग में देवगढ़ राजस्थान और गुजरात जैन धर्म के प्रमुख केंद्र थे।

व्यावसायिक वर्ग में इस धर्म का अधिक प्रभाव था। जैन भिक्षु अरहंत कहे जाते थे, ये तीर्थंकरों की उपासना करते थे। सोमदेवकृत यशष्टिशलाका में वर्णन है कि त्याग के कारण जैन जिन कहलाते थे। इस धर्म को राज्य की ओर से पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त थी। देवगढ़ का शांतिनाथ मंदिर तथा ग्यारसपुर का मालादेवी देवालय इसका ज्वलंत उदाहरण है परंतु किसी प्रतीहार राजा ने जैन धर्म ग्रहण किया हो इसके उदाहरण हमें नहीं मिलते हैं। ओसियाँ अभिलेख में भी महावीर स्वामी के देवालय का उल्लेख है।


बौद्ध धर्म का ह्रास हो गया था। इसके अनुयायी भी अल्पसंख्यक थे परंतु इन्हें पूर्ण धार्मिक स्वतंत्रता तथा राजकीय संरक्षण प्रप्त था। गुनेरिया अभिलेख तथा अन्य बौद्ध प्रमिताओं की पादपीठ पर प्रतीहार राजाओं के अभिलेखों के अंकन से इसकी पुष्टि होती है। ब्रिटिश संग्रहालय अभिलेख में एक बौद्ध भिक्षु को दान दिए जाने का उल्लेख है। सारनाथ, उत्तर प्रदेश से भी बौद्धदेवी तारा की दो प्रतिमाएँ प्राप्त हुई हैं।