गुप्तोत्तरकाल (दक्षिण भारत) : सांस्कृतिक विकास (2) - Post-Gupta Period (South India): Cultural Development (2)

गुप्तोत्तरकाल (दक्षिण भारत) : सांस्कृतिक विकास (2) - Post-Gupta Period (South India): Cultural Development (2)

मूर्तिकला


मूर्तिशिल्प की दृष्टि से चालुक्यों के संरक्षण में कुछ विशिष्ट प्रयोग किए गए। इस प्रयोग में गुप्त वेगी और पल्लव मूर्तिशैलियों से प्रेरणा ली गई और फिर विशिष्ट चालुक्य शैली का स्वरूप उभारा गया। मूर्तिशैली के विकास में पश्चिमी लयण शैली का भी पूरा अनुयोग रहा। इस युग में अन्य गुप्तोत्तर कला केंद्रों की तरह मूर्तिशिल्प का उपयोग वास्तु सज्जा के रूप में हुआ। इस प्रकार मूर्तिशिल्प अपनी स्वतंत्र सत्ता रखते हुए भी वास्तु का पूरक सिद्ध हुआ। फलतः चालुक्य मूर्तिशिल्प का विकास चालुक्य मंदिर वास्तु विकास का अनुवर्ती रहा। कालक्रम की दृष्टि से पाँचवीं शती के उत्तरार्द्ध से सातवीं शती ईसवी तक को मूर्तिकला अपने पुष्ट स्वरूप में उपस्थित हुई। आरंभिक मूर्ति कृतियोंमें गुप्तशिल्प का प्रभाव अधिक परिलक्षित है। बाद में पल्लव प्रभाव और वेन्गी प्रभाव अधिक सक्रिय द्रष्टव्य होता है।


कालक्रम से वादामी के लयण (गुफा-मंडप) की मूर्तिसज्जा की विवेचना अधिक उचित है। गुफा संख्या-3, जो कि मंगलेश के समय का है, पश्चिमी गुफा मूर्तिशैली का प्रभाव परिलक्षित करता है। स्तंभों और छतों पर भारी संख्या में मूर्तिकरण किया गया है। मूर्ति रचना की दृष्टि से आकृतियाँ बलिष्ठ और अतिकाय प्रमाण की हैं, फिर भी आंगिक विन्यास में संतुलन बनाए रखने की पूरी कोशिश की गई है। कुछ मूर्तियों को छोड़ जो कि रूक्ष बनी हैं, शेष अधिकांश में शिल्पी शारीरिक विन्यास की दृष्टि से पूर्णता और उसके आंगिक भराव में निहित शक्ति और ऊर्जा को अभिव्यक्त करने में पूर्णतया सफल सिद्ध हुआ। है। प्रायः आकृतियाँ अपने शारीरिक स्थिति के लिए उपयुक्त अवकाश पाती गई हैं, किंतु कहीं कहीं स्थान के अभाव में स्थापत्यगत स्थिति अथवा घटनाक्रम में पात्रों की बोझिल स्थिति के कारण आकृतियाँ वास्तुगत स्थिति में समाहित अथवा एक सीमित ढाँचे में निबद्ध-सी भी लगती हैं। इस प्रकार की स्थिति यत्र तत्र पश्चिमी लवणों की मूर्ति अभिकल्पना में भी है।


इन गुफा मंदिरों में प्रायः पौराणिक कथाओं को अंकित किया गया है, जिनमें शिल्प और स्थान की आवश्यकता को दृष्टि में रखकर दृश्य विधान इस रूप में किया गया है कि मूलकथा के प्रवाह और स्पष्टता पर किसी भी प्रकार की क्षति न पहुँचे। कथा के अनुरूप पात्रों का आंगिक विन्यास भी है जिसमें चेष्टा और सक्रियता की अभिव्यक्ति पूरी क्षमता से की गई है। गणपंक्तियों का विन्यास तो बड़ा ही मनोहर है। विभिन्न मुद्राओं में क्रीड़ा करते गण-युग्म बड़े ही ललित ढंग से रूपायित किए गए हैं। गणों को गतिमय बनाने और उनका समूह संयोजन विधिवतापूर्ण भाव भंगिमा विन्यास लयण शैली की मूर्तन कौशल को एक पराकाष्ठा तक पहुँचाते हैं। छत की सज्जा बारीक और रेखामय है, जिसमें आकृतियाँ होते हुए भी अपनी सत्ता विराट् अलंकरण के जाल में आवृत है।

लयण में नटराज की विभिन्न सोलह मुद्राएँ स्वयं अपने में एक उपलब्धि है शिल्पांकन की दृष्टि से भी और वास्तु प्रस्तावना की भी दृष्टि से। नटराज के नृत्यरत लय में आसपास की आकृतियों का रेखांकन भी लयात्मक है। गणेश आदि इसी लयसूत्र में बँधे ललित भगिमाओं का दर्शन कराते हैं। इसी गुफा में महिषमर्दिनी का अंकन है। महिषमर्दिनी देवी द्वारा महिष-वध की चेष्टा और मुख भाग पर सौम्य भाव की आभा का दुर्लभ समन्वय इस अंकन की विशेषता है। इसी प्रकार की भव्यता हमें अर्द्धनारीश्वर, हरिहर आदि की मूर्तियों में भी देखने को मिलती है। इन भव्य मूर्तियों के साथ गणों का आगिक गतिमय विलास अत्यंत लालित्यपूर्ण है। शिव विवाह के दृश्यों में सूक्ष्म प्रदर्शन की स्थिति है, जो कथातथ्य पर अधिक केंद्रित है, शिल्पात्मक लालित्य पर कम इस गुफा में कुछ रतिप्रधान अंकन भी हैं, जो रतिप्रधान अंकनों में अपना ऐतिहासिक स्थान रखते हैं। अन्य अंकनों में गजलक्ष्मी, पार्वती, मनुष्य, पशु काल्पनिक पशु आदि भी बने हैं।


वैष्णव गुफा-2 के जगतों पर बनी गणपक्ति अपनी भाव भंगिमा के कारण दर्शनीय है। बौनी आकृति, शारीरिक स्थूलता, अलंकृत शिरोभूषण इन गणों के विशिष्ट शिल्पात्मक तत्व हैं। । गुफा के भीतर की आकृतियाँ अपनी भव्यता और विशालता के कारण बड़ी ही रमणीक हैं। स्थान-स्थान पर बने देवप्रकोष्ठों और गवाक्षों में नटराज, त्रिविक्रम, बराह मूर्तियाँ विशिष्ट हैं। इन देवमूर्तियों पर बनी लंबी किरीट चालुक्य शिल्प की निहित विशेषताओं में माना जाता है। पौराणिक ख्यातों का विवरणात्मक प्रदर्शन रोचकतापूर्वक किया गया है। अन्य महत्वपूर्ण अंकनोंमें गजलक्ष्मी, रति और काम, समुद्र मंथन का दृश्य, देवासुर संग्राम का विवरण कृष्णलीला के अंतर्गत आने वाले पूतना वध, कालियदमन, धेनुकासुर वधु गोवर्धन धारण, कंसवध के दृश्य कथात्मक विवरणों के विशिष्ट उदाहरण हैं। अलंकरण तत्व के रूप में स्वस्तिक, मत्स्य, चक्र आदि बड़े ही मनोहर हैं।


गुफा-3 में इन्हीं विषयों में से कुछ की पुनरावृत्ति प्रदर्शित करते हैं। गुफा की विशाल भित्तिका भाग में उत्कीर्ण त्रिविक्रम, वामन, बाराह, नरसिंह हरिहर, भोगासन विष्णु यहाँ शिल्प के महत्वपूर्ण उदाहरण हैं। देवताओं की आंगिक रचाव और उनकी संक्रियता का यहाँ उदात्त प्रदर्शन हुआ है। इनमें अनंतविष्णु या भोगासन विष्णु की प्रतिमा, जिसमें वे सर्पफण के नीचे प्रदर्शित हैं, बड़ा ही भव्य है। मुखमंडल का भराव हाथ-पैर आदि की ओजपूर्ण मांसलता गरिमामय मुखमंडल संपूर्ण रूप से चालुक्य शिल्प सूत्र की अभिव्यक्ति करता है और इसे छठी शती चालुक्य कला का प्रतिनिधि उदाहरण के रूप में माना जाना चाहिए। इस भव्य गुफा के स्तंभ भी बड़े कलात्मक हैं, तथा इन पर बनी आकृतियाँ भी शिल्पगत सौंदर्य से भरपूर हैं। मिथुन अत्यंत स्वाभाविक भंगिमाओं के साथ बने हैं, तथा कथात्मक प्रसंग, यथा सुभद्राहरण, पारिजातहरण, कृष्णलीला प्रसंग के कुछ दुर्लभ उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। देव शरीर के निर्माण में वर्तुलता,

आध्यात्मिक गरिमामय गंभीरता, प्रवाहमय रेखांकन, वादामी के लयण मूर्तिशिल्प की विशिष्टताएँ हैं इनका रचाव पश्चिमी लवण शिल्प से विशिष्ट है और इनकी तुलना में अयहोलि के मंदिरों का शिल्प भी साधारण है।


पट्टदिकल की मूर्तिकला आठवीं शती की चालुक्य मूर्तिकला का समग्र प्रतिनिधित्व करता है। इस कला पर पल्लव मामल्ल शैली का प्रभाव अत्यंत मुखर है। वस्तुतः पट्टदिकल के शिल्पियों ने दो विरोधी शिल्प परंपरा- मामल्ल और वेन्गी का आश्चर्यजनक समन्वय किया है। मामल्लशैली की स्थूलता, बेन्गीशैली की तन्वंगिता दो विरोधी रचनाधारा है। फिर भी, चालुक्य शिल्पियों ने इसमें सामन्जस्य स्थापित किया है। कटि से ऊपर, विशेषकर मुखमंडल के विन्यास में मामल्लशैली का परिचालन हैं

और हाथ पैर आदि की रचाव में वेन्गीशैली का प्रभाव है। इससे मूर्तियाँ न तो स्थूल और बोझिल हैं और न तो उनमें स्थिरता का भाव स्थापित कर पाती हैं। शारीरिक स्वरूप का रेखांकन, प्रवाहपूर्ण और चेष्टागत तन्मयता इन मूर्तियों की दुर्लभ विशेषताएँ हैं। इन विशेषताओं से समन्वित पट्टदिकल के अतिरिक्त आलमगीरपुर की भी मूर्तियाँ हैं। संगमेश्वर मंदिर में मूर्तिशिल्प के कम उदाहरण हैं। शास्त्रीय मान का ध्यान करके वराह, विष्णु, शिव आदि सामान्य रूप से बनाए गए हैं, किंतु विरूपाक्ष मंदिर की मूर्तिसज्जा विशिष्ट है। अलंकरण तत्व के रूप में ज्यामितिक परिकल्पनाएँ अधिक देखने को मिलती हैं। शिव मंदिर होते हुए भी इस पर रामकथा (बालि-सुग्रीव-युद्ध, सीताहरण आदि) के कथात्मक दृश्य ललित ढंग से बने हैं। इनमें कथात्मक प्रवाह के साथ ही साथ कथातत्व के आवश्यक तथ्यों का अपूर्व संयोजन है।

शिवलिंग के पार्श्व में ब्रह्मा और विष्णु का अंकन उसी प्रकार का है जैसा कि बाद में एलोरा में बना। शिव संबंधी मूर्तिकरण में तांडवरत शिव भित्तिकाओं पर अर्द्धनारीश्वर, हरिहर आदि विशिष्ट रचनाएँ हैं। त्रिभंग में प्रदर्शित द्वारपाल की प्रतिमा बड़ी ही सौम्य, सुघर और आगिक विन्यास की दृष्टि से आनुपातिक है। कटिहस्त हाथों की मुद्रा, दाएँ पैर की स्थिरता, बाएँ पैर का नर्तनशील मोड़, कटिभाग का खम, वक्ष की पृथुता, मुख मंडल की सुडौलता और गंभीर अभिव्यक्ति पल्लव द्वारपालों की बाह्य भंगिमा, वेंगीकला की छंदात्मकता, चालुक्य कला की निहित शक्ति और गरिमा का एक साथ प्रदर्शन करते हैं। 


चित्रकला


बादामी की गुफामंडपों में, कुछ चित्रकर्म के भी उदाहरण मिलते हैं, जो कि मुख्यतया मंगलेश के समय में अंकित किए गए। उनमें राजमहल के दृश्य,

नृत्यमंडली, विद्याधर आदि के अंकन अत्यंत ललित हैं। शैली की दृष्टि से बादामी के चित्र सामान्य रूप से अजंता की समकालीन चित्रशैली का निर्वाह करते हैं, यद्यपि इनमें इतनी मौलिकता और संभावनाएँ हैं, जो परवर्तीकाल के चित्रों (पल्लव) को भी अनुप्राणित कर सकें।


शासन प्रबंध


वातापी के चालुक्य निरंकुश राजतंत्र के अधीन अपने साम्राज्य का संरक्षण करते थे। राजा को असीमित अधिकार होते हुए भी उसका उपयोग प्रजा के हित ही में किया जाता था। यद्यपि किसी 'मंत्रिमंडल जैसे संगठन की सूचना चालुक्य अभिलेखों से नहीं मिलती,

न किसी मंत्री के संबंध में ही कुछ उल्लेख मिलता है किंतु राजाओं के द्वारा मंत्रोत्साह शक्ति' नीति के प्रयोग का उल्लेख मिलता है। मंत्र के अंतर्गत यह भाव है कि राजा समय-समय पर अधिकारियों आदि से विचार विमर्श करके ही कार्य करता था। शासन में प्रत्यक्ष निगरानी का बड़ा महत्व होता है। चालुक्य नरेशों के संबंध में पर्याप्त सूचना मिलती है कि वे अपने राज्य में घूम-घूमकर शासन की स्थिति में प्रत्यक्ष परिचय रखते थे। युद्धकाल में वे युद्ध का नेतृत्व करते थे। इस अवसर पर केंद्र से दूर रहते हुए भी वहाँ शासन पर नजर रखते थे। सुविधा के लिए अपने युवराज आदि को अपने स्थान पर स्थानापन्न करते थे जिससे कि केंद्रीय शासन उपेक्षित न रह सके। जब उत्तराधिकारी अल्पवयस्क होता था, तो राजा अपने भाई को या अन्य किसी संबंधी को शासन सत्ता सौंप दिया करता था।

कीर्तिवर्मन प्रथम ने ऐसा ही किया था। किंतु वयस्क होने पर यदि इस प्रकार का नियुक्त राजा किसी प्रकार का विपर्यय ( अवरूद्ध चरित) उत्पन्न करता था तो जनाक्रोश की भी संभावना रहती थी। मंगलेश के विरूद्ध पुलकेशिन द्वितीय ने इसी जनाक्रोश का लाभ उठाकर विद्रोह किया था। ज्यों-ज्यों चालुक्य साम्राज्य का विस्तार होता गया, इसकी आवश्यकता समझी गई कि स्थ क्षेत्रों में उपराजा, विश्वसनीय सामंत और कहीं-कहीं तो नाममात्र का संरक्षण रखकर स्वतंत्र शाखा राज्य की भी स्थापना कर दी जाती थी। पुलकेशिन द्वितीय ने विजयवर्धन के अधीन वेन्गी में पूर्वी चालुक्यों की शाखा राज्य की स्थापना की थी। इसी प्रकार विक्रमादित्य प्रथम ने लाट में भी धराश्रय जयसिंहवर्मन के अधीन एक शाखा राज्य की स्थापना की थी । चालुक्य साम्राज्य के सैनिक और प्रशासनिक ढाँचे में सामंतों का बहुत बड़ा योगदान था।

अलुप, सिंधु सेंद्रक, वाण, गंग, तेलगुचोड आदि सामंतों के सहयोग पर ही चालुक्य प्रशासन और सैनिक शक्ति टिका हुआ था। इन सामंत राज्यों के अतिरिक्त मुख्य चालुक्य भूमि के अनेक विषय थे जिनके प्रशासक को विषयपति भी कहते थे। राजा के आदेश को 'राष्ट्रापितम्' कहते थे, जो मौखिक भी होते थे। युवराजों को शिक्षा बड़े विधान से दी जाती थी। युवराज राजा के संरक्षण में अथवा उसके निर्देश पर युद्ध संचालन करते थे। रानियों का प्रशासन में कोई प्रत्यक्ष हाथ तो न नहीं प्रमाणित होता, किंतु दान अथवा इष्टापूर्ति के निमित्त मंदिर निर्माण आदि के कार्य के लिए वे पूरी स्वतंत्रता का उपभोग करती थीं। ग्राम प्रशासन की सबसे छोटी इकाई थी।

उसका प्रमुख 'गामुंड कहलाता था, जो राजा की ओर से नियुक्त होता था। उसके सहयोगी अधिकारी 'कर्ण' कहलाते थे जो कि ग्राम संबंधी आयव्यय आदि का लेखा जोखा रखते थे। ग्राम में जो बड़े बूढ़े और प्रभावी व्यक्ति होते थे। उन्हें महाजन' कहते थे। अवैतनिक रूप से इनका ग्राम प्रशासन में बड़ा योगदान होता था। भूमिदान और भूमिस्थांतरण जैसे अवसरों पर उसकी स्वीकृति और उपस्थिति आवश्यक समझी जाती थी। कर व्यवस्था में समानता लाने की पूरी कोशिश की गई थी। प्रायः सामंत अथवा अधिकारी ही कर वसूलते थे। राजा को प्रत्यक्ष रूप से भेंट आदि प्रजा से मिलता था। विभिन्न प्रकार के विशेष कर भी लगाए जाते थे, यथा चाट, भाट, कुषीद, निधि, उपनिधि, क्लिप्त, उपक्लिप्त, उपरिकर, उपुंग, परिकर, आदि। व्यापार पर लगे करों में प्रमुख कर भारंच आदित्युंच, आदि। इनमें से कुछ स्थानीय कर भी थे, करों से मुक्ति भी दी जाती थी। ऐसी स्थिति को 'सर्व आदान' विशुद्ध कहते थे, जिनमें किसी भूमि-विक्रय या दान आदि पर कोई कर नहीं लगाया जाता था। पराजित शत्रु पर कुछ कर भी लगता था।

तुलामान को भी नियमित करने का प्रयत्न चालुक्य नरेशों ने किया था। गदवाल और कर्नूल दानपत्रों में 'राजमान' का उल्लेख आया है। 


पल्लव काल


पल्लवों का विशाल साम्राज्य उनके सुशासन से रक्षित था। उनका सांस्कृतिक संरक्षण दक्षिण भारत के सांस्कृतिक व्यक्तित्व के निर्माण में बड़ा महत्वपूर्ण माना जाता है। पल्लवकालीन समाज के संबंध में सूचनाएँ पर्याप्त नहीं मिलतीं । यत्र-तत्र से प्राप्त सूचना के आधार पर समाज की केवल सामान्य रूपरेखा ही प्रस्तुत की जा सकती है। संगम युग की तरह कांची इस समय भी राजनीति और संस्कृति का प्रधान केंद्र था। यह एक व्यापारिक केंद्र भी था अतएव यहाँ की आबादी में प्रवासी या विदेशी जनसंख्या का अनुमान किया जा सकता है, जिसका परिणाम यहाँ की सामाजिक और सांस्कृतिक संरचना प आवश्य ही पड़ा होगा, किंतु सबसे अधिक प्रभावी परिवर्तन ब्राह्मणधर्म की व्यापकता के कारण हुआ। 


शासन प्रबंध


पल्लवों के अभिलेखों से पल्लव शासन प्रणाली पर अच्छा प्रकाश पड़ता है। आरंभिक पल्लवों के प्राकृत अभिलेखों से पल्लव शासन प्रणाली का जो ज्ञान होता है उससे लगता है कि इस युग की पल्लव शासन-प्रणाली पर मौर्य - सातवाहन शासन परंपरा का पर्याप्त प्रभाव था। कालांतर में अर्थात् सिंहविष्णु के बाद के पल्लव शासकों ने पल्लव शासन प्रणाली को और दृढ़ तथा सुसंगठित किया। विशेषकर ग्राम-शासन--व्यवस्था और अग्रहार ग्रामों की शासन प्रणाली में कुछ ऐसे परिवर्तन किए गए कि जिससे ग्राम शासन व्यवस्था, सर्वथा सरकारी नियंत्रण से मुक्त हो गई। इस शासन प्रणाली का परवर्ती चोलग्राम व्यवस्था पर व्यापक प्रभाव पड़ा।


शासन का केंद्र राजा था और वही शांति और सुव्यवस्था के अतिरिक्त युद्ध का संचालनकरता था। पल्लव अभिलेखों में उसे प्रायः महाराज या धर्ममहाराज कहा गया है।

पल्लवों का विशेष साम्राज्य राजा के प्रत्यक्ष नियंत्रण में रहते हुए भी शासन प्रबंध की सुविधा के लिए पूरा राष्ट्रपल्लव शासित भूमि) अनेक प्रशासनिक इकाइयों, यथा-मंडलों, कोड्डुओं, नाडुओं में बँटा हुआ था। प्रशासन की सबसे छोटी इकाई ग्राम थी। मंडलों और विषयों में प्रायः राजकुल के लोग ही प्रधान नियुक्त होते थे। विश्वसनीय सामंत भी मंडलाधीश बनाए जाते थे। केंद्रीय शासन, जिसका अधिष्ठान कांची में था, जो राजा के नियंत्रण में था, जिसके अधीन वरीयता क्रम से अनेक अधिकारी नियुक्त होते थे जो अपने विभागीय दायित्वों को संभालते थे। राजकार्य के संपादन में मंत्रिवर्ग का विशेष योगदान होता था। वे ही राजा के प्रधान मंत्रदाता थे, और शासन के गूढ़तम प्रसंगों में राजा के सहभागी थे। ऐसे मंत्रियों को रहस्यादिकद' कहते थे। राजा की मौखिक आज्ञाओं को लिखित रूप भी राजा के निजी मंत्री ही दिया करते थे।

शासन की सहायता तथा युद्ध संचालन में राजा के प्रधान सहयोगी युवराज तथा अन्य राजकुमार भी हुआ करते थे। राजा के आदेश सीधे राष्ट्रिक या मांडलिक जैसे प्रांतीय शासकों को पहुँचाए जाते थे। पूरा पल्लव साम्राज्य अनेक विषयों और कोट्टमों में विभक्त था। विषयों के प्रधान विषयिक कहलाते थे। कोट्टम के शासन 'देशातिकदा कहलाते थे। ग्रामों का शासन प्रबंध ग्राम भोजका की देखरेख में चलता था। विभिन्न विभागीय अधिकारी भी होते थे जो 'अमत्य या अमात्य' कहलाते थे। सीमा की सुरक्षा तथा सामान्य शांति की व्यवस्था रक्षकों के अधीन थी जो पुलिस जैसा कर्तव्य का निर्वाह करते थे। भूमिक वनक्षेत्रों की सुरक्षा करते थे। नायक सेना के अधिकारी थे जो सेनापति के अधीन होते थे। केंद्र तथा शासन की विभिन्न इकाइयों में संवाद संचार की व्यवस्था 'दूतिकों' 'चरों' के माध्यम से होती थी।

सामान्य सैनिक को योद्धा या 'भड' या भट्ट कहते थे। भूमि की सुरक्षा तथा खेतों का सीमा निर्धारण बड़ी सतर्कता से किया जाता था। तथा राजकीय अभिलेखों में उसका उल्लेख होता था। बाग-बगीचों, स्नान-स्थलों, तीर्थों (घाटों) की देखरेख के लिए उपयुक्त अधिकारी होते थे।


आरंभिक पल्लवों की ग्राम व्यवस्था के विषय में कोई स्पष्ट जानकारी नहीं होती। ग्रामभोजक के अधीन ही ग्राम की सुरक्षा और सामान्य प्रबंध होता था। संभवत ग्रामों का स्वायत्त संस्थानिक रूप में कम था, किंतु परवर्ती काल में क्रमागत रूप में ग्रामशासन स्वावलंबी शासन संस्थान के रूप में सुगठित हो गए। ग्रामों में पंचायती व्यवस्था लागू थी। विभिन्न ग्राम पंचायतें, जिन्हें 'सभा कहते थे,

अनेक उपसमितियों के माध्यम से ग्राम का सामान्य प्रशासन, आर्थिक, कराधान संबंधी तथा आर्थिक व्यवस्था में योगदान करती थीं। इनमें से कुछ समितियाँ मंदिरों की व्यवस्था नहरों और तालाबों की व्यवस्था तथा भूमि सर्वेक्षण और सीमा निर्धारण जैसे कार्यों में भी लगी हुई थी । उरूव पल्ली दानपत्र में ग्रामों की भूमि सर्वेक्षण संबंधी कार्यों का विशद विवरण मिलता है। अग्रहार और ब्रह्मदेय ग्रामों की समूची प्रबंध व्यवस्था ब्राह्मणों के ही अधीन होती थी। उत्तर मल्लूर अभिलेख (नवीं शती) में इन सभाओं के चुनाव प्रणाली और संगठनात्मक पक्ष का अच्छा परिचय मिलता है। 


धर्म और साहित्य


सभी पल्लवनरेश धार्मिक और दानी थे। उनके संरक्षण में विभिन्न धर्म और तत्संबंधी क्रिया कलाप संपन्न होते रहे। कांची विद्या और शिक्षा का एक महान केंद्र के रूप में विख्यात था।

बौद्धाचार्य धर्मपाल ने कांची में रहकर विद्यार्जन किया था। हुआन सांग के विवरण में है कि कांचीपुरम् के संघाराम में 10000 भिक्षु रहते थे। महायान धर्म का यहाँ बड़ा प्रभाव था। आरंभ में जैन धर्म का भी प्रभाव कांची में प्रमाणित होता है। महेंद्रवर्मन प्रथम आरंभ में जैन धर्मावलंबी था, किंतु कालांतर में वह संत अप्पर से दीक्षित होकर शैव हो गया। तब से लेकर शेष पल्लवनरेशों ने शैव धर्म में निरंतर अपनी आस्था व्यक्त की। वैष्णव धर्म के प्रति भी उनका उदारभाव था। वैष्णव संतों का एक संप्रदाय जिन्हें अल्वर' कहते हैं, पल्लवों के संरक्षण में अपने क्रिया कलाप के लिए स्वतंत्र था। इनके अतिरिक्त अनेक तांत्रिक संप्रदाय भी प्रचलित थे। इनके प्रति पल्लव नरेशों की आस्था नहीं थी और जनरुचि को इनके विरूद्ध जगाने में पल्लव नरेशों ने सक्रिय सहयोग किया था। मत्तविलास प्रहसन' नामक नाटिका में महेंद्रवर्मन् ने ऐसे पाखंडी संप्रदायों की बड़ी खिल्ली उड़ायी है।


पल्लवों का राजधर्म शैव धर्म था। उनकी राजभाषा आरंभ में प्राकृत (सिंह वर्मन् के पूर्व) नवीं शती तक संस्कृत रही। तमिल भाषा और ग्रंथलिपि का भी उनके द्वारा समादर हुआ। कांची का विकास एक महत्वपूर्ण विद्यास्थान के रूप में मान्य था और यहाँ विभिन्न संप्रदायों और मान्यताओं के विद्वान अध्ययन और शास्त्रार्थ के लिए आते थे। दिग्नाग भी कुछ समय तक कांची में रहा। मयूरशर्मन् जिसका उल्लेख काकुस्थवर्मन् के अभिलेख में है- एक स्वाभिमानी ब्राह्मण के रूप में विख्यात है। इसने यहाँ वैदिक शास्त्रों का अध्ययन किया था। सिंहविष्णु के दरबार में महाकवि भारवि आमंत्रित थे। प्रसिद्ध अलंकारशास्त्री दंडिन और उसके समकालीन मातृदत्त नरसिंहवर्मन् द्वितीय के संरक्षण में थे। महेंद्रवर्मन् प्रथम ने मत्तविलास प्रहसन' लिखा जिसमें कापालिकों, तांत्रिकों और जैनियों की सामाजिक कुरीतियों को उजागर किया।

संभवत: प्रसिद्ध नाटिका 'भगवद्जुणीयाम् भी इसी समय लिखा गया भागवत पुराण की रचना भी पल्लवों के शासनकाल के अंतिम चरण की रचना प्रतीत होती है। आठवीं शती के बाद तमिल भाषा जन भाषा के रूप में विकसित हुई। इस समय के पल्लव अभिलेखों में तमिल भाषा का प्रयोग बढ़ा। यद्यपि तमिल काव्य की रचना में पांडव संरक्षण विशेष महत्व का रहा किंतु पल्लवोंने भी तमिल काव्य को प्रश्रय दिया। प्रसिद्ध काव्य 'नंदिकलंबकम्' उसका उदाहरण है। तेलारू विजेता नंदिवर्मन् के काल में तमिल 'भारतम्' की भी रचना हुई, जिसे पेरनदेवनार ने प्रस्तुत किया। 


कला एवं वास्तुकला


प्रारम्भिक पल्लवों के वास्तुकाल संरक्षण के रूप सेउडवल्ली के शैलमंडप की भी मान्यता है। यद्यपि उसकी रचना का श्रेय विष्णुकुंडिन राजवंश के संरक्षण को देना अधिक तर्कसम्मत है।

किंतु इसमें कोई संदेह नहीं कि उडवल्ली के मंडप विन्यास का पल्लव शैलमंडपों की रचना पर प्रेरणात्मक प्रभाव अधिक है। स्तंभविन्यास, गवाक्ष-रचना तथा द्वारपालकों की स्थिति और रचाव उंडवल्ली मंडपशैली के ऐसे निहित तत्व हैं, जिन्होंने परवर्ती पल्लव मंडप रचना शैली को प्रभावित किया है। पल्लव कला का वास्तविक शुभारंभ महेंद्रवर्मन् प्रथम के ही काल से मानना उचित है। इस दृष्टि से मंडपपट्टु अभिलेख में महेंद्रवर्मन् 'विचित्रचित्त' का यह कथन यथार्थ है कि उसके द्वारा ब्रह्मा, ईश्वर और विष्णु के लिए यह आयतन निर्मित हुआ जिसमें न तो इष्टिका का प्रयोग है, न द्रुम (लकड़ी), न लोहा और न सुधार (चूना) का। चूँकि इसने ही नए सिरे से तमिल क्षेत्र में मंडपशैली के शैल आयतनों के निर्माण की परंपरा आरंभ की अतएव उसकी यह उक्ति सार्थक सिद्ध होती है।


पल्लव वास्तुशैली का क्रमोत्तर रूप से विकास होता रहा। इस विकास में पल्लव नृपों का विशेष योगदान था अतएव विद्वानों ने इस क्रम को राजाओं के शासनक्रम से चार वर्गों में विभक्त किया है- (1) महेंद्र शैली (610-640 ई.) (यह शैली लगभग आठवीं सदी तक दृष्टिगोचर होती है।) (2) मामल्य शैली (640-674 ई.)


उक्त शैलियों के अंतर्गत गुफा मंदिरों (मंडपों) और रथों को उत्कीर्ण किया गया। (3) राजसिंह शैली (674-800ई.) (4) नंदिवर्मन् शैली (800-900 ई.)


उक्त शैलियों के अंतर्गत संरचनात्मक मंदिरों का निर्माण हुआ।