संगम साहित्य (2) - Sangam Literature (2)
संगम साहित्य (2) - Sangam Literature (2)
महाकाव्य
संगम युग के पाँच प्रमुख महाकाव्य हैं। यद्यपि ये महाकाव्य संगम साहित्य के अंतर्गत नहीं आते तथापि इनसे तत्कालीन जन-जीवन के विषय में यथेष्ट जानकारी मिलती है। ये पाँच महाकाव्य निम्न हैं-
1. सिलप्पदिकारम् (नुपुर की कहानी) रचनाकार- इलांगो आदिगल ।
2. मणिमेकलै (कोवलन, माधवी की पुत्री) रचनाकार- सीतलै शत्तनार।
3. जीवक चिंतामणि- रचनाकार तिरुत्तक्कदेवर (जैन भिक्षु)।
4. वलय पलि
रचनाकार अज्ञात
5. कुंडलकेशि
इन पाँच महाकाव्यों में से अंतिम दो के बारे में कोई जानकारी नहीं मिलती। प्रथम तीन ही उपलब्ध भी हैं एवं महत्वपूर्ण भी। इनका विवरण निम्नवत है-
सिलप्पदिकारम् (Silappadikaram)
पाँच महाकाव्यों में सर्वाधिक प्रसिद्ध रचना सिलप्पदिकारम्' तमिल साहित्य का उत्कृष्ट ग्रंथ माना जाता है।
इसके रचनाकार इलांगो आदिल थे। इस महाकाव्य की विषय-वस्तु एक लोकप्रिय कथा पर आधारित है, जिसके अनुसार पुहार (कावेरीपट्टन) नगर के एक समृद्ध व्यापारी का पुत्र कोवलन एक अन्य व्यापारी की लड़की कण्णगि से विवाह करता है, परंतु कालांतर में राजदरबार की नर्तकी माधवी के प्रेमपाश में पड़कर वह अपनी पत्नी को भुला बैठता है तथा अपना सारा धन यहाँ तक कि पत्नी के समस्त आभूषण भी उस पर लुटा बैठता है। बाद में नर्तकी माधवी द्वारा ठुकराए जाने पर वह पश्चाताप करता हुआ अपनी पत्नी (कण्णगि) के पास लौटता है। उस समय कण्णगि के पास मात्र एक पायल का जोड़ा शेष बचा हुआ था, वह उसे सहर्ष कोवलन को सौंप देती है।
कोवलन उनमें से एक पायल बेच कर जीविकोपार्जन हेतु सपत्नीक मदुरा आ जाता है। मदुरा पहुँचकर कोवलन पायल बेचने बाजार जाता है, उसी समय सुनार के षड्यंत्र से वहाँ की रानी की एक पायल चोरी चली जाती है। राजा के नौकर कोवलन के पास पायल देखकर उसे पकड़कर राजा के पास ले जाते हैं। राजा बिना किसी अभियोग के उसे फाँसी पर चढ़ा देता है। कण्णगि अपने पति को निर्दोष साबित करने के लिए दूसरी पायल राजा को दिखाती है। राजा को तब अपने किए पर पश्चाताप होता है और आत्मग्लानि से राजा की मृत्यु हो जाती है। तत्पश्चात् अपनी क्रोधाग्नि से कण्णगि ने मदुरा को भस्म कर दिया तथा चेर राज्य में चली गई। वहीं एक पहाड़ी पर उसकी मृत्यु ( हो गई।
स्वर्ग में पुनः पति-पत्नी का मिलन हुआ और मृत्यु के पश्चात् कण्णगि की प्रतिष्ठा तमिल समाज में 'सतीत्व' की देवी के रूप में हुई, उसके सम्मान में मंदिर बनवाए गए तथा कण्णगि' की पूजा की जाने लगी। संभवतः चेर शासक सेंगुड्डुवनने यह कण्णगि पूजा आरंभ की थी।
सिल्प्पदिकारम् तमिल जनता में एक राष्ट्रीय काव्य के रूप में जाना जाता है। इस महाकाव्य को प्रो. मेहण्डाले ने तमिल काव्य का इलियड कहा है। नीलकंठ शास्त्री के शब्दों में, यह रचना अनेक अर्थों में संपूर्ण तमिल साहित्य में अनुपमेय (जिसकी उपमा नहीं दी जा सकती है
और इसमें दृश्यों का जैसा सुस्पष्ट चित्रण है तथा छदों का जैसा दक्षतापूर्ण प्रभाव है, वैसा अन्य किसी रचना में नही मिलता। "
मणिमेकले (Manimekalai)
यह एक बौद्ध काव्य है, जिसमें कोवलन एवं नर्तकी माधवी की पुत्री मणिमे कलै की जीवन गाथा है। इसका रचनाकार सीतले सत्तनार मदुरा का एक व्यापारी था, जो बौद्ध था। इस महाकाव्य पर सिलप्पदिकारम् का प्रभाव देख जा सकता है, क्योंकि उसके नायक कोवलन की ही पुत्री मणिमेकले की ये जीवन गाथा है। इसके अनुसार, 'माधवी (नर्तकी) अपने पूर्व प्रेमी कोवलन की मृत्यु का समाचार सुनकर बौद्ध भिक्षुणी बन जाती है।
उधर राजकुमार उदयकुमारन् मणिमेकले पर आसक्त हो उसे पाने का प्रयत्न करता है, परंतु मणिमेकलै चमत्कारिक ढंग से अपने सतीत्व की रक्षा करती है। अंततः वह भी अपनी माता माधवी के समान बौद्ध धर्म ग्रहण कर बौद्ध भिक्षुणी बन जाती है। यह मूलतः एक धार्मिक ग्रंथ है। इस ग्रंथ की कहानी दार्शनिक एवं शास्त्रार्थं संबंधी बातों के लिए बनाई गई है। इसमें तर्कशास्त्र की भ्रांतियों की लंबी व्याख्या है। इसमें मणिमेकले भली-भाँति अनुभव करती है कि मानव प्रेम का क्षेत्र सीमित है, अतः वह स्वयं को बुद्ध धम्म और संघ को अर्पण कर भिक्षुणी बन जाती है। इसीलिए प्रो मेहण्डाले ने इस महाकाव्य को तमिल काव्य का ओडिसी' माना है।
यह एकमात्र ऐसा ग्रंथ है जिसमें संगमयुगीन ललित कला के विकास का भी वर्णन किया गया है। नीलकंठ शास्त्री महोदय इस ग्रंथ को स्पष्टतः पाँचवी शताब्दी की एक कृति दिड़नाग के न्याय प्रवेश पर आधारित मानते हैं।
जीवक चिंतामणि (Jivak Chantamani)
यह संगम काल के काफी बाद की रचना है। इसकी रचना जैन भिक्षु तिरुत्तक्केदेवर ने की थी। यह एक आदर्श नायक की जीवन गाथा है, जो युद्ध और शांति दोनों ही कलाओं में पारंगत है। यह एक संत भी है और कुशल प्रेमी भी अपने तूफानी यौवन में काव्य के नायक 'जीवक' ने अनेक साहसिक कार्य किए और अंततोगत्वा एक बड़े साम्राज्य का सम्राट बना।
इस काव्य का दूसरा नाम 'मण-नूल' (विवाह) की पुस्तक) भी है, क्योंकि इसमें जीवक के प्रत्येक साहसिक कार्य का, जिसका अंत एक सुखद विवाह में होता है, वर्णन है। प्रत्येक सैनिक अभियान में 'जीवक' अपने लिए एक रानी लाता है तथा इस प्रकार आठ पत्नियों के साथ आनंद का जीवन व्यतीत करता है। 'जीवक' के इस आनंदात्मक जीवन में एक छोटी-सी घटना ज्वार के समान आती है और उसे एक क्षण में मानव जीवन का खोखलापन उजागर हो जाता है। अंततोगत्वा समस्त सांसारिक माया-मोह त्याग अपने पुत्र को सिंहासन पर बैठाकर वह वन चला जाता है। वहाँ से मुक्ति प्राप्त होती है।
कहा जाता है कि इस महाकाव्य का लेखक पहले एक चोल राजकुमार था, बाद में जैन भिक्षु बन गया था। उसने यह महाकाव्य लिखकर अपने गुरु को संतुष्ट किया।
वस्तुतः यह महाकाव्य लिखने का प्रयोजन यह था कि तिरुत्तक्कदेवर इस काव्य द्वारा इस चुनौती का जवाब देना चाहता था कि "जैन कवि यद्यपि धार्मिक साहित्य के क्षेत्र में विशिष्टता प्राप्त कर सके हैं पर प्रेम साहित्य में उनका कोई योगदान नहीं है।"
अपने वर्तमान रूप में जीवक चिंतामणि में 3,154 छंद हैं, जिनमें से केवल 2,700 ही मूल कवि द्वारा रचित बताए जाते हैं। दो छंद उसके गुरू द्वारा रचित हैं। जिनकी अनुमति से यह महाकाव्य लिखा गया, शेष छंद कालांतर में किसी अन्य कवि द्वारा लिखे गए। वस्तुतः इस महाकाव्य में जन्म से लेकर मोक्ष तक आत्मा की यात्रा का अति सुंदर वर्णन प्रस्तुत किया गया है। नीलकंठ शास्त्री महोदय इस काव्य का काल दसवीं शताब्दी ई. निर्धारित करते हुए लिखते हैं
कि तिरुत्तक्कदेवर की कला में महान कविता के सभी गुण हैं और जैसा कि भली-भाँति विदित है, उसने कंबन जैसे प्रतिभावान लेखक को अपनी शैली निर्धारित करने की प्रेरणा दी।"
इस प्रकार हम देखते हैं कि उपर्युक्त संगमकालीन साहित्य तत्युगीन इतिहास एवं संस्कृति का सजीव चित्रण प्रस्तुत करता है। उस समय धार्मिक, राजनीतिक, दार्शनिक एवं व्याकरण इत्यादि सभी प्रकार के साहित्य का सृजन हुआ। ऐसा प्रतीत होता है कि इस समय तक उत्तर एवं दक्षिण की संस्कृतियों का समन्वय हो चुका था। श्री निवास आयंगर महोदय इन तीनों संगमों की अवधि ईपू, 500 से 500 ई. तक लगभग 1000 वर्ष निर्धारित करते हैं, परंतु तिथि को लेकर विद्वानों में बहुत मतभेद हैं। संभवतः इनकी रचना प्रथम शताब्दी ई. से लेकर तीसरी शताब्दी ई. के मध्य में की गई थी।
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