मौर्योत्तर काल : शिल्प, व्यापार, नगर (200 ई.पू. 300 ई.)(2) - Post-Mauryan Period: Crafts, Trade, Cities (200 BC – 300 AD)(2)

मौर्योत्तर काल : शिल्प, व्यापार, नगर (200 ई.पू. 300 ई.)(2) - Post-Mauryan Period: Crafts, Trade, Cities (200 BC – 300 AD)(2)

पशुपालन


कृषि की भाँति यह कार्य उस समय वैश्य समाज का परंपरागत धंधा समझा जाता था। पेरिप्लस के वर्णन से यह प्रतीत होता है कि पहली शताब्दी ई. पूर्व के उत्तरार्द्ध में काठियावाड़ के आसपास के प्रदेशों में पशुपालन बहुत बड़े पैमाने पर किया जाता था, इससे प्राप्त होने वाले पदार्थों का निर्यात प्रचुर मात्रा में पूर्वी अफ्रीका के प्रदेशों में किया जाता था। इस समय युद्धों में घोड़े अत्यंत उपयोगी थे। उत्तम नस्ल के घोड़ों को यद्यपि विदेशों से मंगाया जाता था, किंतु पूर्वी भारत में घोड़ों की कुछ अच्छी नस्लें होती थीं। महाभारत में यह बताया गया है कि प्राग् ज्योतिष के राजा ने तथा पूर्वी भारत के अन्य राजाओं ने राजसूय यज्ञ में युधिष्ठिर को विभिन्न प्रकार के बढ़िया नस्ल के घोड़े उपहार में प्रदान किए थे।


शिल्प तथा उद्योग 


श्रेणियाँ


इस युग में मौर्यकाल की भाँति विभिन्न प्रकार के धंधे और व्यवसाय करने वाले शिल्पियों की श्रेणियाँ विद्यमान थीं और उनका संगठन पहले की अपेक्षा अधिक पुष्ट एवं परिपक्व था। व्यापार की आवश्यकताओं के कारण इस समय कुछ उद्योगों में बड़ी उन्नति हुई। जातक-साहित्य में हमें 19 शिल्पों और श्रेणियों का उल्लेख मिलता है। यह संख्या इस युग में भी इस प्रकार बनी रही, यद्यपि महावस्तु खंड- 3 में इनका स्वरूप जातकों में वर्णित श्रेणियों से कुछ भिन्न है। कुछ श्रेणियों का उल्लेख इसके अभिलेखों में भी पाया जाता है। महावस्तु में कपिलवस्तु की निम्नलिखित श्रेणियों का उल्लेख है- सौवर्णिक या हैरण्यिक (सुनार), प्रावारिक (चादर बेचने वाले),

शांखिक (शंख का काम करने वाले), दंतकार (हाथी- दांत के शिल्पी), मणिकार (मनियारे), प्रास्तरिक (पत्थर का काम करने वाले), गंधी, कोशाविक (रेशमी तथा ऊनी कपड़े वाले), घृतकुंडिक (घी बेचने वाले), गौड़िक (गुड़ विक्रेता), वारिक (पानी बेचने वाले), कार्पासिक (कपास बेचने वाले), दध्यिक (दही विक्रेता), पूपिक (पुए बेचने वाले), खंडकार (खाड बेचने वाले), मोदकारक (लड्डू बेचने वाले), कंडुक (हलवाई), समित कारक (आटा बनाने वाले), सत्तूकारक ( सत्तू बनाने वाले), फलवणिज (फल विक्रेता), चूर्णकुट्टतैलिक (सुगंधित चूर्ण और तेल बेचने वाले), गुड़पाचक (गुड़ बनाने वाले), सोंठ बेचने वाले, शर्करवणिज (शक्कर बेचने वाले),

मूलवणिज (कंद-मूल बेचने वाले), सीधुकारक (शराब बेचने वाले)। इन श्रेणियों के अतिरिक्त विभिन्न उद्योग धंधे करने वाले कुछ वर्गों को उस समय शिल्पायतन कहा जाता था। इनमें लुहार, ताँबा पीटने वाले, ठठेरे, पीतल बनाने वाले, राँगे के कारीगर, शीशे का काम करने वाले तथा खराद चढ़ाने वाले मुख्य थे। अन्य शिल्पी कुम्हार, चर्मकार, मालाकार, गद्दियों को भरने वाले (पुरिमकार), रंगरेज, सुईकार, तांती, चित्रकार, सोने चाँदी के गहने बनाने वाले, समूरों के कारीगर, पुताई करने वाले, नाई, स्थपति, सूत्रधार, कुएँ खोदने वाले, लकड़ी बाँस आदि का व्यापार करने वाले, नाविक, सर्वपधोवक नदियों की बालू धोकर उसमें से सोना निकालने वाले या सोना साफ करने वाले थे।


इस काल में नगरों में कुशल शिल्पियों का विशेष महत्त्व एवं स्थान था, जो सबसे अच्छे कारीगर होते थे, उन्हें महत्तर कहा जाता था। सुवर्णकार महत्तर सोने के गहने बनाता था। वह गहनों की गढ़ाई, बनवाई, पालिश आदि के कामों में बड़ा प्रवीण होता था। मणिकार महत्तर मोती, वैदूर्य, शंख, मूंगा, यशब इत्यादि का पारखी होता था। शंख-वलयकारमहत्तर हाथीदाँत की (खूंटियाँ), अंजनशलाका, पेटियाँ, सिंगारदान, कड़े चूड़ियाँ बनाता था। यंत्रकार महत्तर खराद पर चढ़कर तरह-तरह के खिलौने, पंखे, कुर्सियाँ, मूर्तियाँ बनाता था। वार्धकि महत्तर विभिन्न प्रकार की कुर्सियाँ, मंच, पीठ तथा अन्य फर्नीचर बनाने में चतुर होता था।


महावस्तु में वर्णित उपयुक्त श्रेणियों के अतिरिक्त अभिलेखों में वर्णित कुछ अन्य श्रेणियाँ ये हैं- जुलाहे (कौलिकनिकाय), कुम्हार (कुलैरिक), पानी उठाने के यंत्र बनाने वाले (औदयंत्रिक),

अनाज के व्यापारी (धञ्ञिक), बाँस का काम करने वाले (वसाकर), केसेरे (कंसकार)। इन श्रेणियों का मुखिया श्रेष्ठी कहलाता था, इसके अधिकारों के संबंध में हमें कोई जानकारी नहीं है, किंतु इसमें कोई संदेह नहीं कि राजदरबार में इनका स्थान बड़ा महत्वपूर्ण होता था। महाभारत में गंधर्वों से हारने पर दुर्योधन ने कहा था कि अब मैं श्रेणी-मुख्यों को कैसे मुँह दिखलाऊँगा। विनयपिटक से यह प्रतीत होता है कि एक ही पेशे (श्रेणी) के विभिन्न सदस्यों में होने वाले झगड़ों में पंच का कार्य श्रेष्ठी किया करता था ।


श्रेणियों के कार्य


श्रेणियों का प्रधान कार्य अपने सदस्यों के हितों की सुरक्षा तथा अनुचित प्रतिद्वंद्विता की होड़ को रोकना एवं अपने व्यवसाय की उन्नति के लिए आवश्यक कार्य करना था।

इसके अतिरिक्त ये श्रेणियाँ बैंकों का कार्य करती थीं। इनके पास अक्षयनीवी अर्थात् कभी व्यय न किए जाने वाले मूलधन के रूप में कुछ राशि जमा कर दी जाती थी, ताकि इसके सूद से कुछ कार्य किए जा सकें। इस समय के अनेक अभिलेखों में विभिन्न श्रेणियों के पास विशिष्ट प्रयोजनों की पूर्ति के लिए रुपये जमा करवाने का वर्णन मिलता है। नासिक की गुहा संख्या 10 में उत्कीर्ण एक लेख के अनुसार उषवदात ने यहाँ रहने वाले भिक्षुओं के वस्त्रादि के व्यय/चीवरक तथा भोजन व्यय / कुषाणमूल के लिए 3000 कार्षापण की स्थायी निधि/ अक्षयनीवी के रूप में गोवर्धन में रहने वाली श्रेणियों के पास जमा किए. 2000 कार्षापण की राशि जुलाहों (कौलिक निकाय) की एक श्रेणी के पास 12 प्रतिशत वार्षिक व्याज की दर पर तथा 1000 कार्षापण 9 प्रतिशत की ब्याज की दर पर जमा किए।

ये अप्रतिदातव्य वृद्धि योग्य थे अर्थात् इन्हें कभी वापिस नहीं लिया जाता था, इनका ब्याज ही लिया जाता था। दो हजार कार्षापण के वार्षिक ब्याज से 20 भिक्षुओं में से प्रत्येक को बारह वस्त्र (चीवर) दिए जाते थे और 1000 के ब्याज से खाने-पीने की छोटी- मोटी वस्तुओं का व्यय । उषवदात के इस दान को निगम सभा में सुनाया गया तथा लेखा रखने के दफ्तर में तत्कालीन परंपरा और नियम (चरित्र) के अनुसार रजिस्ट्री (निबद्ध) कराया गया। इस लेख से यह भी पता लगता है कि उस समय कार्षापण और सुवर्ण अर्थात् ताँबे और सोने के मूल्य का अनुपात 35: 1 था। यह लेख पहली शताब्दी ई.पू. का है। इस गुहा में तीसरी शताब्दी ई. के आभोर राजा ईश्वरसेन के राज्यकाल के एक अभिलेख में शक उपासिका विष्णु दत्ता द्वारा भिक्षु संघ को दवा-दारू (गिलानभेषज) के लिए कुम्हारों (कुलरिक) की श्रेणी के पास एक हजार कार्षापण की तथा पानी उठाने के लिए यंत्र बनाने वाली श्रेणी (औद्ययांत्रिक) के पास दो हजार कार्षापण जमा करवाने का वर्णन है।

जुन्नर के तीन छोटे अभिलेखों में बाँस का काम करने वालों (बसकर-वंशकार), कसेरों (कांसकार) तथा अनाज के व्यापारियों की श्रेणियों के पास धन जमा करने का वर्णन है।


उपर्युक्त अभिलेखों से यह स्पष्ट है कि श्रेणियों का कार्यक्षेत्र सातवाहन युग में पहले से बहुत अधिक बढ़ गया था। वे अपना धंधा करने के अतिरिक्त वर्तमान बैंकों की भाँति लोगों का रुपया जमा करती थीं और इस पर सूद देती थीं। श्रेणियों की स्थिरता इतनी अधिक समझी जाती थी कि स्थायी रूप से जमा की जाने वाली धनराशियाँ अक्षयनीवी के रूप में इनके पास जमा की जाती थी, यहाँ तक कि राजा लोग भी अपने दान की ऐसी निधियाँ इनके पास जमा करवाते थे। उस समय की निगम सभाएँ अर्थात् नगरों की संस्थाएँ उनकी साख मानती थीं, जिन धरोहरों का वे पंजीयन करती थी, वे श्रेणियों में जमा की जा सकती थीं। उस युग में श्रेणियों का प्रधान कार्य यद्यपि अपना व्यवसाय करना होता था,

किंतु इनकी साख और स्थिरता इतनी अधिक बढ़ गई थी कि वे बैंकों का काम भी करने लगी थीं। श्रेणियों ने यह कार्य इससे पहले किसी युग में नहीं किया था। इससे यह स्पष्ट है कि उनके इस कार्य का विकास सातवाहन युग में अभूतपूर्व समृद्धि और व्यापारिक उत्कर्ष का परिणाम था ।


तत्कालीन स्मृतियों से और महाभारत से यह ज्ञात होता है कि इन श्रेणियों के अपने नियम हुआ करते थे। ये नियम श्रेणी धर्म कहलाते थे। एक श्रेणी के सदस्यों में विवाद उत्पन्न होने पर न्याय एवं निर्णय का कार्य श्रेणियाँ ही करती थीं। मनुस्मृति में उन लोगों के लिए दण्ड विधान किया गया है, जो श्रेणी आदि सामूहिक संस्थाओं द्वारा किए गए समझौते का उल्लंघन समय-भेद या संविद् व्यतिक्रम करते थे।

याज्ञवल्क्य स्मृति में इस प्रकार संविद् का उल्लंघन करने वाले के लिए उसकी सारी जायदाद की जब्ती और देश निकाले के उग्र दंड का विधान किया गया है।


श्रेणियों द्वारा किए जाने वाले प्रमुख उद्योगों में से कुछ महत्वपूर्ण व्यवसायों का संक्षिप्त विवरण निम्नानुसार है:-


रत्नोद्योग


प्रथम शताब्दी ई. में रोमन साम्राज्य के वैभव-संपन्न नागरिकों में मोतियों और मणियों के आभूषण धारण करने का फैशन बहुत बढ़ गया था। इसके परिणामस्वरूप वहाँ भारत से आने वाले मोतियों और रत्नों की माँग निरंतर बढ़ रही थी, अतः भारत में इनके उत्पादन और निर्यात पर अधिक ध्यान दिया जाने लगा। पेरिप्लस के वर्णनानुसार प्रथम शताब्दी ई. में भारत में मोतियों के उत्पादन के चार बड़े प्रसिद्ध केंद्र थे।

पहला केंद्र पाण्ड्य राज्य में ताम्रपर्णी नदी के निकट कोरकै, दूसरा केंद्र मन्नार की खाड़ी और तीसरा पाक जलडमरूमध्य में था। इन क्षेत्रों पर राज्य का एकाधिपत्य था। मन्नार की खाड़ी के मोती अपराधियों द्वारा निकलवाए जाते थे और इन स्थानों की सारी उपज राजधानी में लाई जाती थी। चौथे केंद्र बंगाल में भी मोती निकाले जाते थे। मुक्ता उत्पादन का एक अन्य केंद्र प्लिनी ने पेरिमूल नामक स्थान बताया है। इसकी पहचान पश्चिमी समुद्र-तट पर बंबई के निकट आधुनिक चोलनामक स्थान से की गई है। इसका पुराना नाम सैमिल्ला था।


मौर्योत्तर युग में भारत अपने बहुमूल्य रत्नों और मणियों के लिए प्रसिद्ध था। प्लिनी ने ऐसे रत्नों की लंबी सूची देते हुए यह लिखा है कि भारत अतीव मूल्यवान रत्नों की महान जन्मभूमि है।

उसका यह कथन हमें भारत के संबंध में खलीफा उमर को कही गई एक अरब व्यापारी की इस उक्ति का स्मरण कराता है कि भारत की नदियाँ मोती हैं, पर्वत लाल हैं और वृक्ष इत्र हैं। प्लिनी ने भारतभूमि को रत्नधात्री मानते हुए यहाँ के अनेक रत्नों का वर्णन किया है, इनमें ये उल्लेखनीय हैं :- पन्ना, उत्पल, गोमेद, ओनिक्स, सार्डोनिक्स, कार्बकल, इंद्रगोप (कार्नेलियन), एमिथिस्ट, हिआसिंध। इनमें से कुछ के स्वरूप के संबंध में बड़ा मतभेद है। कुछ महत्वपूर्ण एवं प्रधान रत्नों का ही विवरण इस प्रकार है-


टालमी के कथनानुसार उन दिनों हीरों का प्रधान उत्पत्ति स्थान कोस नामक नगर, सबराई का प्रदेश और एडमास नदी का मुहाना था। इनकी पहचान क्रमशः वर्धा नदी वाले बरार के प्रदेश,

संबलपुर के प्रदेश और वैतरणी नदी की सांक नामक शाखा से की गई है। मध्य युग में हीरों की उत्पत्ति का प्रधान स्थान मध्य भारत की खानें थीं, किंतु रोमन साहित्य में इसका कोई उल्लेख नहीं मिलता। उस समय रोम में भारतीय पन्नों की माँग अधिक थी। टालमी ने पोन्नाटा नामक स्थान को इसका प्रधान उत्पत्ति केंद्र माना है। इसकी पहचान कोयंबटूर जिले के एक स्थान से की जाती है। वस्तुतः उन दिनों इस जिले के पन्नों की माँग रोम में बहुत अधिक थी और मलाबार के बंदरगाहों से इसका निर्यात हुआ करता था । प्लिनी ने लिखा है, ‘‘पन्ना भारत के अतिरिक्त अन्य स्थानों में बहुत कम मिलता है। मणिकार इसे षट्कोण के रूप मैं इस प्रकार काटते हैं कि विभिन्न कोणों में इसकी चमक बहुत बढ़ जाती है। यदि इन्हें किसी अन्य ढंग से काटा जाय तो इनमें कोई भी चमक नहीं रह जाती है।" सबसे अधिक मूल्यवान वे पन्नें समझे जाते हैं, जिनका रंग समुद्र के विशुद्ध हरे रंग से मिलता है।

भारत में लोगों को लंबाकार पन्ने धारण करने का शौक है और उनके मतानुसार केवल यही ऐसे रत्न हैं जिन्हें सोने के बिना भी धारण किया जा सकता है। पेरिप्लस ने गोमेद और कार्नेलियन के बारे में यह लिखा है कि ये दक्षिण में पाए जाते हैं और वहाँ से पश्चिमी देशों को भेजे जाते हैं। टालमी के मतानुसार भारत में साइनिक्स नामक पर्वत में इसी नाम के रत्न पाए जाते हैं।


भारत में पाए जाने वाले रत्नों के वैविध्य और विदेशों में इनकी भारी माँग होने के कारण यहाँ रत्नोद्योग का अच्छा विकास हुआ था। उन दिनों भारत में सुशिक्षित एवं सुसंस्कृत व्यक्ति के लिए यह आवश्यक समझा जाता था कि वह विभिन्न प्रकार के रत्नों की परीक्षा करने में कुशल हो। दिव्यावदान से यह ज्ञात होता है

कि उन दिनों व्यापारियों के पुत्रों को इस कला की नियमित रूप से शिक्षा दी जाती थी। वात्स्यायन ने अपनी चौंसठ कलाओं (अंगविद्या) में रूप्य रत्नपरीक्षा को भी सम्मिलित किया है। इस समय के जौहरियों की कुशलता का प्रमाण हमें कुषाण काल के प्राचीन स्थानों की खुदाई से मिले विभिन्न प्रकार की मणियों के नमूनों से मिलता है। तक्षशिला की खुदाई से निम्न प्रकार के रत्नों के नमूने मिले हैं-


स्फटिक, धारीदार गोमेद, याकूत, एमिथिस्ट, एक्वामेरीन, पीला स्फटिक। ये सब तक्षशिला के धर्मराजिक स्तूप की खुदाई से मिले हैं। संगम युग के तामिल साहित्य से भी यह सूचित होता है कि उस समय रत्नों एवं मणियों का उद्योग बड़े उत्कर्ष पर था।