मौर्योत्तर काल : शिल्प, व्यापार, नगर (200 ई.पू. 300 ई.)(3) - Post-Mauryan Period: Crafts, Trade, Cities (200 BC – 300 AD)
मौर्योत्तर काल : शिल्प, व्यापार, नगर (200 ई.पू. 300 ई.)(3) - Post-Mauryan Period: Crafts, Trade, Cities (200 BC – 300 AD)
व्यापार
व्यापार में व्यापारियों के दो वर्ग थे.
वणिक
उद्योग-धंधों की उन्नति के कारण इस समय देश के आंतरिक एवं विदेशी व्यापार को भी बड़ा प्रोत्साहन मिला। तत्कालीन साहित्य में अनेक प्रकार के व्यवसायियों और व्यापारियों के वर्णन मिलते हैं। उस समय के व्यापारियों के दो बड़े वर्ग उल्लेखनीय हैं। पहले वर्ग के व्यापारी वणिक कहलाते थे। ये एक स्थान या दुकान पर बैठकर अपना माल बेचा करते थे। महाभाष्यकार ने लिखा है, “वणिक् का तराजू के साथ गहरा संबंध था। उन दिनों ब्राह्मण लोग वणिक् व्यवसाय में बहुत कम प्रवृत्त होते थे।
" पतंजलि ने लिखा है, "उड़द के समान काले रंग वाले आदमी को दुकान में बैठा देखकर कोई यह नहीं समझेगा कि वह ब्राह्मण है।” वणिक् लोग नाना प्रकार की वस्तुओं के क्रय-विक्रय से अपनी जीविका का निर्वाह करते थे। उस समय विशेषीकरण की प्रवृत्ति प्रबल थी। विशिष्ट वस्तुओं का व्यापार करने के आधार पर इन व्यापारियों के नाम पड़ जाते थे, जैसे घोड़ों का व्यापारी अश्ववाणिज, गौओं का व्यापारी गोवाणिज, बाँस का व्यापारी वंशकठिनिका ये व्यापारी मद्र कश्मीर वाणिज कहलाते थे। खनिज द्रव्यों और पत्थरों का व्यापार करने वाला व्यवसायी प्रास्तरिक कहलाता था। कपड़ा बेचने वाले उन दिनों वर्तमान समय की भाँति बनारस का बढ़िया माल रखा करते थे। 1.2.7.2. #ref
व्यापारियों का दूसरा प्रधान वर्ग सार्थ कहलाता था। उन दिनों एक स्थान से दूसरे स्थान तक व्यापारिक माल ले जाने में चोर डाकुओं तथा जंगली जानवरों के कई प्रकार के खतरे होते थे,
अतः व्यापारी अकेले यात्रा करना निरापद नहीं समझते थे। वे अपनी सुरक्षा के लिए बड़े-बड़े समूहों या काफिलों में यात्रा किया करते थे। इन समूहों को उस समय सार्थ कहा जाता था। सार्थ बनाकर चलने वाले व्यापारी सार्थिक या सार्थवाह कहलाते थे। अमरकोश के टीकाकार क्षीरस्वामी ने इस शब्द की सुंदर व्याख्या करते हुए लिखा है, "जो पूंजी द्वारा व्यापार करने वाले यात्रियों / पांथों का अगुआ हो वह सार्थवाह है। (सार्थान् सधनान् पान्थान् वहित इति सार्थवाहः )।” वस्तुतः सार्थ का अभिप्राय है समान अर्थ (पूँजी) लगाकर चलने वाले व्यापारी। जो व्यक्ति बाहर मंडियों के साथ व्यापार करने के लिए अपनी पूँजी लगाकर एक साथ टांडा लादकर चलते थे, वे सार्थ कहलाते थे। हिंदी का साथ शब्द संस्कृत के इसी सार्थ से • निकला है।
उस समय जब कोई उत्साही और साहसी व्यापारी व्यापार के लिए संकल्प करता था तो उसके साथ अनेक व्यक्ति भी सम्मिलित हो जाते थे। ये सब मिलकर व्यापारियों के एक बड़े काफिले या सार्थ का निर्माण करते थे। ये साथ अपने एक बड़े नेता या अध्यक्ष (सार्थवाहजेठक या प्रमुख) के नेतृत्व में मरुभूमियों और जंगलों की लंबी दूरियों को पार किया करते थे। उन दिनों यदि कोई व्यापारी कभी अकेला भी चल पड़ता था तो घना जंगल या कान्तार आने पर रुक जाता था और किसी सार्थ की प्रतीक्षा करता था। किसी सार्थ के वहाँ आने पर उसमें सम्मिलित हो जाता था और उस कान्तार से निकल जाने पर वह फिर उस सार्थ को छोड़कर स्वतंत्र रूप से चलने लगता था। उन दिनों चोर-बदमाश / डाकू इन जंगलों के मार्गों के किनारे छिपकर बैठ जाते थे और अकेले-दुकेले निकलने वाले वणिजों को लूट लेते थे।
महाभाष्य के अनुसार इस प्रकार के चोर को पारिपथिक या बटमार कहा जाता था। घने जंगलों या कांतारों में होने वाली लूटपाट से बचने के लिए व्यापारी साथ में बड़े समूह बनाकर चला करते थे।
निरंतर एवं सतत् रूप से इस प्रकार के साथ-साथ चलने वाले वणिजों को अपरस्पर सार्थ कहते थे। सार्थ का नेता बड़ा उत्तम मार्ग प्रदर्शक होता था और उसके संबंध में यह माना जाता था कि उसे जंगलों के विभिन्न रास्तों का पूरा ज्ञाता, मेधावी और निपुण व्यक्ति होना चाहिए।
मिलिन्द प्रश्न में साथ के कुछ नियम दिए गए हैं। इनसे ज्ञात होता है कि इनमें व्यापारी अपनी ही जिम्मेदारी पर सम्मिलित हुआ करते थे और रास्ते में बाँसों के पुल आने पर अपना माल उतारने से पहले वे इन पुलों की मजबूती की परीक्षा कर लिया करते थे। इन साथ में यात्रियों का सामान लादकर चलने वाली बैलगाड़ियों की संख्या बहुत अधिक हुआ करती थी। पाटलिपुत्र जाने वाले एक व्यापारी के साथ पाँच सौ बैलगाड़ियों के काफिले का उल्लेख है।
इन दिनों व्यापारी लोग साथ में देश के एक छोर से दूसरे छोर तक लंबी यात्राएँ किया करते थे। इनके तक्षशिला से वाराणसी तक आने का वर्णन मिलता है। अवदानशतक में कहा गया है कि ये व्यापारी उत्तर से दक्षिण तक जाया करते थे। डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल ने इस समय के व्यापारियों और सार्थवाहों का वर्णन करते हुए लिखा है “भारतीय व्यापारिक जगत में जो सोने की खेती हुई उसके फूल, पुष्प चुनने वाले व्यक्ति सार्थवाह थे। बुद्धि के धनी, सत्य में निष्ठावान, साहस के भंडार, व्यावहारिक सूझबूझ में पगे हुए, उदार, दानी, धर्म और संस्कृति में रुचि रखने वाले, नई स्थिति का स्वागत करने वाले, देश-विदेश की जानकारी के कोष, यवन, शक, पहलव, रोमन, ऋषिक, हूण आदि विदेशियों के साथ कंधा रगड़ने वाले, उनकी भाषा, रीति नीति के पारखी भारतीय सार्थवाह महोदधि बंगाल की खाड़ी के तट पर स्थित ताम्रलिप्ति से लेकर सीरिया की अंताखी नगरी तक, यवद्वीप और कटाह द्वीप / जावा और केडा से चोल मंडल के सामुद्रिक पल्मों तक और पश्चिम में यवन एवं बर्बर देशों तक के विशाल जल-थल पर छा गए थे।
उपरोक्त के अतिरिक्त तीसरे प्रकार के व्यापारी समुद्री व्यापार किया करते थे। इनका परिचय हमें बौद्ध एवं जैन साहित्य में वर्णित कोटिकर्ण, पूर्ण, ज्ञाताधर्म, सानुदास आदि व्यापारियों की कथाओं से होता है। समुद्र यात्रा पर प्रस्थान करने से पूर्व प्रायः एक व्यापारी नगर में घंटा बजाकर यह घोषणा करता था कि वह विदेश यात्रा के लिए रवाना होने वाला है, अन्य जो व्यापारी उसके साथ जाना चाहते हों, वे भी उसके साथ चल सकते हैं। इस प्रकार प्रयास करने वाले भारतीय व्यापारी स्वदेश और विदेश के बंदरगाहों में बहुत दूर-दूर तक के स्थानों की यात्रा किया करते थे। मिलिन्द प्रश्न में इस प्रकार के एक व्यापारी द्वारा समुद्रों में अपना जहाज चलाते हुए वंश, तक्कलो, चीन, सौवीर, सुरठ, अलसंद, कोलपट्टन, सुवर्ण भूमि तथा अन्य बंदरगाहों का भ्रमण करने का उल्लेख है। महानिद्देस में कहा गया है कि एक व्यापारी अनेक कष्टों को सहते हुए अनेक बंदरगाहों पर पहुँचा।
सानुदास की कथा भी सुवर्णद्वीप और मध्य एशिया के विभिन्न व्यापारिक स्थानों का वर्णन करती है। आर्यशूर की जातकमाला के सुपारंग जातक में सुपारग अर्थात् जहाजरानी की कला में और समुद्र पार करने की यात्राओं में कुशल व्यापारी की एक बड़ी साहसिक और चमत्कारपूर्ण कथा का वर्णन है। इसमें भीषण समुद्री तूफानों का सामना करते हुए यात्रियों द्वारा खुरमाल, दधिमाल, कुशमाल, नलमाल आदि समुद्रों को पार करने के बाद सोने, चाँदी और विभिन्न रत्नों को लाने का वर्णन है। इन समुद्रों की पहचान फारस की खाड़ी, लाल सागर और भूमध्यसागर के विभिन्न प्रदेशों से की गई है। दिव्यावदान में कोटिकर्ण नामक व्यापारी की कथा में समुद्र यात्रा में आने वाले संकटों का सुंदर वर्णन किया गया है। समुद्री यात्रा के लिए जब जहाज पर बहुत अधिक भीड़ एकत्र हो गई, तब पूर्ण ने लोगों से कहा कि "समुद्र में अनेक अनजाने भय हैं, वहाँ तिमि और तिमिंगल नाम के बड़े समुद्री जंतु रहते हैं बड़े-बड़े कछुए दिखलाई देते हैं,
ऊँची-ऊँची लहरें उठती हैं। जहाज कभी-कभी पानी के नीचे छिपी चट्टानों से टकराकर चूर-चूर हो जाते हैं। यहाँ तूफानों (कालिकावात) का भी भय रहता है। समुद्री डाकू नीले कपड़े पहन कर जहाजों को लूटते रहते हैं।" जैन साहित्य में भी बौद्ध साहित्य की भाँति भारत के समुद्री यात्रियों के अनेक सजीव वर्णन मिलते हैं। आवश्यक चूर्णि से यह ज्ञात होता है कि दक्षिण भारत के मदुरा नामक बंदरगाह से सौराष्ट्र तक जहाज चला करते थे। ज्ञाताधर्म की एक कथा में भारतीय व्यापारियों द्वारा सुवर्णद्वीप और कालियद्वीप संभवतः जंजीबार की यात्राओं का वर्णन मिलता है।
जैन साहित्य में समुद्री यात्रा की विभिन्न परिभाषाओं और विभिन्न प्रकार के बंदरगाहों का भी उल्लेख किया गया है। उदाहरणार्थ बृहत्कल्पसूत्र भाष्य के अनुसार जलपट्टन ऐसे समुद्री बंदरगाह होते थे जहाँ विदेशी माल उतारा जाता था और देशी माल का चालान होता था।
स्थलपट्टन ऐसे स्थानों को कहते जहाँ बैलगाड़ियों से माल उतरता था। द्रोणमुख ऐसे स्थान थे जहाँ जल और स्थल दोनों से माल आता था, जैसे ताम्रलिप्ति और भरुकच्छा निगम व्यापारियों की ऐसी बस्ती को कहते थे जहाँ लेन-देन और ब्याज-बट्टे का काम होता था। सार्थों की बस्तियों और पड़ावों को निवेश कहा जाता था। जिन स्थानों में बड़ी मात्रा में थोक माल बड़ी-बड़ी गाँठों में आता था और उसे छोटे व्यापारियों को बेचने के लिए माल की गाँठे तोड़ी जाती थीं उन स्थानों को पुटभेदन कहा जाता था। शाकल का सुप्रसिद्ध नगर इसी प्रकार पुटभेदन था। महावस्तु के अनुसार जिस स्थान से सुवर्णन द्वीप आदि जाने वाले जहाज गहरे समुद्रों में प्रवष्टि होते थे, उसे समुद्रपट्टन कहते थे।
बंदरगाह / नगर
इस समय विदेशों के साथ व्यापार में वृद्धि होने पर भारत के पश्चिमी और पूर्वी समुद्र तटों पर अनेक बंदरगाहों का विकास हुआ था।
इनका परिचय हमें पेरिप्लस और टालमी के विवरणों से मिलता है। पेरिप्सल में पहली शताब्दी ई. में सिंधु नदी के मुहाने से गंगा के डेल्टे तक22 बंदरगाहों का उल्लेख किया गया है, टालमी ने दूसरी शताब्दी ईस्वी में 40 पत्तनों का वर्णन किया है। यह तथ्य एक ही शताब्दी में तत्कालीन व्यापार के उत्कर्ष पर सुंदर प्रकाश डालता है। पेरिप्लस के लेखक ने स्वयमेव भारत के पश्चिमी तट के बंदरगाहों की यात्रा की थी। उसके विवरण से तत्कालीन व्यापारिक दशा पर सुंदर प्रकाश पड़ता है। पश्चिमी तट से पूर्वी तट की ओर यात्रा करते हुए उस समय के प्रधान बंदरगाह निम्नलिखित थे-
बार्बरिकोन
पहला बंदरगाह सिंधु नदी के मुहाने के मध्य में बार्बरिकोन था।
इसका भारतीय नाम संभवतः बर्बरक था, क्योंकि यहाँ से बर्बर या अफ्रीका के विभिन्न प्रदेशों की यात्रा के लिए व्यापारी रवाना होते थे। बार्बरिकोन सिंधु देश का प्रधान बंदरगाह था। विदेशों से आने वाला माल यहाँ जहाजों से उतार कर कश्तियों में लादा जाता था और सिंध की राजधानी मीननगर (पातल) ले जाया जाता था। पेरिप्लस के समय यहाँ पह्नव राजाओं का शासन था। इस बंदरगाह से कश्मीर से आने वाला कुठ और चीन से आने वाले रेशम, नील, विभिन्न प्रकार के रत्नों, खालों का निर्यात होता था। यहाँ से बाहर जाने वाले अन्य पदार्थ गुग्गुल, दारुहरिद्रा, गंधतृण तथा फिरोजा और लाजवर्द थे। आयात की जाने वाली वस्तुओं में भूमध्यसागर का मूंगा, अरब का लोबान, एक प्रकार का सुगंधित निर्यास स्टोरेक्स, शीशे के बर्तन, शराब, सोने-चाँदी की प्लेटें तथा पुखराज थे।
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