मौर्योत्तर काल : शिल्प, व्यापार, नगर (200 ई.पू. 300 ई.)(4) - Post-Mauryan Period: Crafts, Trade, Cities (200 BC – 300 AD)(4)

मौर्योत्तर काल : शिल्प, व्यापार, नगर (200 ई.पू. 300 ई.)(4) - Post-Mauryan Period: Crafts, Trade, Cities (200 BC – 300 AD)(4)

 बेरीगाजा


दूसरा बड़ा बंदरगाह बेरीगाजा था। यह नर्मदा नदी के सागर में मिलने वाले स्थान पर वर्तमान भड़ौच है। उन दिनों यहाँ नम्वेनस नामक राजा का शासन था। इस राजा के लिए विदेशों से चाँदी, बहुमूल्य पात्र, गाने वाले लड़के, अंतःपुर के लिए सुंदर स्त्रियाँ, बारीक कपड़े और बढ़िया शराबें भेंट के लिए लाई जाती थीं। विदेशी शराबों में इटली की, अरब की और सीरिया के लाओडिसिया नामक स्थान की शराब बहुत पसंद की जाती थी। इसके अतिरिक्त यहाँ सोने और चाँदी की मुद्राएँ ताँबा, रांगा, सीसा, मूंगा, कमरबंद या रंगीन पेटियाँ मन्सल, संखिया, स्वीट क्लोवर, चकमक के चूर्ण से बनाया जाने वाला विशुद्ध चमकीला शीशा थे। यहाँ से निर्यात की प्रधान वस्तुएँ बालछड़ या जटामांसी, गुग्गुल, कुठ, हाथीदाँत, गोमेद,

कार्नेलियन और दारुहरिद्रा, सब प्रकार का सूती कपड़ा, मलमल, रेशम, सूत और बड़ी पिप्पली थीं। इस बंदरगाह में जहाजों को उथले पानी के कारण बड़ी दिक्कत रहा करती थी। बेरीगाजा तक पहुँचने वाली जलप्रणाली बहुत पतली थी, नर्मदा के मुहाने पर पानी में छिपा लंबा, पतला और पथरीला कगार था। पानी उथला होने से समुद्री धाराओं के प्रवाह में सहसा परिवर्तन आ जाने से यहाँ नौचालन बड़ा कठिन कार्य था। इन सब कठिनाइयों से जलपोतों की रक्षा के लिए त्राप्यग और कोटिंबा नामक बड़ी-बड़ी नावों में नाविक राज्य की ओर से नदी के मुहाने पर तैनात रहा करते थे। ये नाविक समुद्र में उत्तर की ओर चलकर काठियावाड़ तक पहुँच जाते थे। यहाँ से ये बेरीगाजा आने वाले जहाजों का पथ-प्रदर्शक बनते थे, इन्हें खाड़ी के मुहाने में पानी में छिपे कगार से बचाकर बंदरगाह की गोदियों में सुरक्षित रूप से पहुँचा दिया करते थे।

उन दिनों राजाओं को इस बंदरगाह के समुद्री व्यापार से बड़ी आमदनी होती थी। अतः वे यहाँ तक जहाजों के पथ-प्रदर्शन के लिए विशेष नाविक भेजा करते थे। बेरीगाजा के बाद अगले बड़े बंदरगाह सोपारा, कल्याण और सेमिल्ला चोल थे। ये सब दक्षिणापथ के बंदरगाह कहलाते थे। यहाँ पेरिप्लस ने अन्य अनेक छोटे बंदरगाहों और टापुओं का वर्णन किया है। ये सब उस समय के सातवाहन साम्राज्य में सम्मिलित थे।


मुजिरिस


उपरोक्त के पश्चात् तमिल देश शुरू हो जाता था, इसका सबसे बड़ा बंदरगाह मुजिरिस था। इसकी पहचान आधुनिक कांगनोर से की जाती है। महाभारत में इसे मुचिरिपट्टन कहा गया है।

यह कालीमिर्च के व्यापार का एक प्रधान केंद्र था। प्राचीन तमिल कवियों ने इसका वर्णन करते हुए कहा है कि यहाँ यवनों के सुंदर और बड़े जहाज केरल की सीमा के भीतर फेनिल पेरियार नदी का पानी काटते हुए सोना लाते हैं। और यहाँ से अपने जहाजों पर मिर्च लादकर ले जाते हैं। एक दूसरे कवि के शब्दों में मुचिरी में धान और मछली की अदला-बदली होती है। यहाँ घरों से बाजारों में मिर्च के बोरे लाए जाते हैं। इसके बदले में सोना जहाजों से डोंगियों पर लादकर लाया जाता है, यहाँ लहरों का संगीत कभी बंद नहीं होता। मुजिरिस केरल राज्य का सबसे बड़ा बंदरगाह था। यहाँ रोमन सम्राट ऑगस्टस की स्मृति में एक मंदिर विद्यमान था। 


नीलकंठ


पाण्ड्य राज्य का प्रसिद्ध बंदरगाह पश्चिमी तट पर नीलकंठ था।

प्लिनी के वर्णन से ऐसा प्रतीत होता है कि कालीमिर्च के व्यापार पर अधिकार पाने के लिए केरल एवं पाण्ड्य राज्यों में बड़ी प्रतिस्पर्धा थी। मुजिरिस में समुद्री डाकुओं का आतंक बढ़ने के कारण व्यापारी नेलकिडा संभवतः कोट्टायम के निकट नीलकंठ आना अधिक पसंद करते थे। पहली शताब्दी ई. के मध्य में 45 ई. के लगभग मानसून हवाओं की सहायता से अरब के समुद्र तट से जहाज 41 दिन में सीधा मुजिरिस और नेलकिण्डा के बंदरगाहों पर आने लगे थे। इससे यहाँ के व्यापार में बड़ी उन्नति हुई। इन बंदरगाहों से निर्यात होने वाले पदार्थ येथे कोटोनारा / उत्तरी मलाबार की मिर्च, अच्छी किस्म के मोती, हाथी दाँत, रेशमी कपड़े, गंगा के प्रदेश का जटामांसी तथा तमालपत्र अर्थात् दालचीनी के पत्ते या तेजपात, हीरे, नीलम तथा विभिन्न प्रकार के पारदर्शी रत्न, सुवर्णद्वीप से आने वाली तथा निकटवर्ती टापुओं से उपलब्ध होने वाली कछुए की खोपड़ियाँ ।

पूर्वी तट पर पांड्यों का एक प्रसिद्ध बंदरगाह ताम्रपर्णी नदी के मुहाने पर कोरकै या कोलकोई अथवा कोरके था। यह मोतियों के व्यापार के लिए प्रसिद्ध था, यहाँ मनार की खाड़ी से मोती निकाले जाते थे। 


कावेरीपट्टनम्


पूर्वी तट पर चोल राज्य की राजधानी अरगरु/ त्रिचनापल्ली के निकट उरैयूर अपने मोतियों और मलमल के लिए प्रसिद्ध थी। यहाँ का सबसे बड़ा बंदरगाह कावेरी नदी की उत्तरी शाखा के मुहाने पर कावेरीपट्टनम् या पुहार था। प्राचीन तमिल काव्य सिलप्पदिकारम् में इसकी समृद्धि के गीत गाते हुए कहा गया है कि यहाँ के व्यापारियों के पास इतना धन था कि उसके लिए बड़े प्रतापशाली राजा ललचाया करते थे। सार्थ जल और स्थल मार्गों से वहाँ इतने प्रकार के माल लाते थे कि ऐसा प्रतीत होता था कि मानों यहाँ सारी दुनिया का माल इकट्ठा हो गया हो।

जगह-जगह लोगों की आँखें अक्षय संपत्ति वाले यवनों विदेशी व्यापारियों के मकानों पर पड़ती थीं। यहाँ की गलियों में रेशमी, कपड़े, मूंगे, चंदन, बहुमूल्य गहनों, मोतियों और सोने की दुकानें थीं। 1.2.8.6. पोडुक


चोल राज्य के अन्य बंदरगाह पोडुके (पांडिचेरी) तथा सोपात्मा थे। पांडिचेरी के पास अरिकमेडु की खुदाई से यह पता लगा है कि प्रथम सदी ई. में यह एक समृद्धशाली बंदरगाह था और रोमन साम्राज्य के साथ व्यापार का एक प्रधान केंद्र था। सोपात्मा की पहचान तामिल साहित्य के सोपट्टिनम् से और वर्तमान समय में मद्रास और पांडिचरी के मध्यवर्ती मरवणम् नामक स्थान से की जाती है।

चोल राज्य के उत्तर में पेरिप्लस ने आंध्र प्रदेश के मसलिया और कलिंग के दोसरेने तथा गंगा के मुहाने पर विद्यमान गंगेज नामक बंदरगाहों का उल्लेख किया है। मसलिया के मलमल का, दोसरेने से हाथीदाँत का तथा गंगा के मुहाने से तमालपत्र, जटामांसी, मोतियों तथा बढ़िया प्रकार की मलमल का निर्यात होता था। टालमी ने कृष्णा गोदावरी के प्रदेश में कोट कस्सिला (घंटसल), पितिंद्र (पिथुठ) तथा कलिंग में पलौरा और गंगा के मुहाने में विद्यमान गंगे तथा तमलित (ताम्रलिप्ति) के बंदरगाहों का उल्लेख किया है।


इत्यादि कृषि कार्य किए जाते थे। इस समय ग्रंथों में खेतों में बोए जाने वाले अनेक प्रकार के अनाजों जैसे धान, जौ, सरसों, तिल, गेहूँ आदि का उल्लेख मिलता है। पशुपालन


कृषि की भाँति यह कार्य उस समय वैश्य समाज का परंपरागत धंधा समझा जाता था। पेरिप्लस के वर्णन से यह प्रतीत होता है कि पहली शताब्दी ई. पूर्व के उत्तरार्द्ध में काठियावाड़ के आसपास के प्रदेशों में पशुपालन बहुत बड़े पैमाने पर किया जाता था, इससे प्राप्त होने वाले पदार्थों का निर्यात प्रचुर मात्रा में पूर्वी अफ्रीका के प्रदेशों में किया जाता था।


शिल्प


इस युग में मौर्यकाल की भाँति विभिन्न प्रकार के धंधे और व्यवसाय करने वाले शिल्पियों की श्रेणियाँ विद्यमान थीं और उनका संगठन पहले की अपेक्षा अधिक पुष्ट एवं परिपक्व था।

व्यापार की आवश्यकताओं के कारण इस समय कुछ उद्योगों में बड़ी उन्नति हुई। जातक साहित्य में हमें 19 शिल्पों और श्रेणियों का उल्लेख मिलता है। यह संख्या इस युग में भी इस प्रकार बनी रही, यद्यपि महावस्तु खंड- 3 में इनका स्वरूप जातकों में वर्णित श्रेणियों से कुछ भिन्न है। कुछ श्रेणियों का उल्लेख इसके अभिलेखों में भी पाया जाता है। महावस्तु में कपिलवस्तु की निम्नलिखित श्रेणियों का उल्लेख है- सौवर्णिक या हैरण्यक (सुनार), प्रावारिक (चादर बेचने वाले), शांखिक (शंख का काम करने वाले), दंतकार (हाथी- दांत के शिल्पी), मणिकार (मनियारे), प्रास्तरिक (पत्थर का काम करने वाले), गंधी, कोशाविक (रेशमी तथा ऊनी कपड़े वाले), घृतकुंडिक (घी बेचने वाले), गुड़ विक्रेता (गौड़िक), वारिक (पानी बेचने वाले), कार्पासिक (कपास बेचने वाले), दध्यिक (दही विक्रेता),

पूपिक (पुए बेचने वाले), खंडकार (खाड़ बेचने वाले), मोदकारक (लड्डू बेचने वाले), कंडुक (हलवाई), समित कारक (आटा बनाने वाले), सत्तूकारक (सत्तू बनाने वाले), फलवणिज (फल विक्रेता), चूर्णकुट्टतैलिक (सुगंधित चूर्ण और तेल बेचने वाले), गुड़पाचक (गुड़ बनाने वाले), सोंठ बेचने वाले शर्करवणिज (शक्कर बेचने वाले), मूलवणिज (कंद-मूल बेचने वाले), सीधुकारक (शराब बेचने वाले)। इन श्रेणियों के अतिरिक्त विभिन्न उद्योग धंधे करने वाले कुछ वर्गों को उस समय शिल्पायतन कहा जाता था। इनमें लुहार, ताँबा पीटने वाले, ठठेरे, पीतल बनाने वाले, राँगे के कारीगर, शीशे का काम करने वाले तथा खराद चढ़ाने वाले मुख्य थे। अन्य शिल्पी कुम्हार, चर्मकार, मालाकार, गद्दियों को भरने वाले (पुरिमकार), रंगरेज, सुईकार, तांती, चित्रकार, सोने चाँदी के गहने बनाने वाले,

समूरों के कारीगर, पुताई करने वाले, नाई, स्थपति, सूत्रधार, कुएँ खोदने वाले, लकड़ी बाँस आदि का व्यापार करने वाले, नाविक, सर्वपधोवक/नदियों की बालू धोकर उसमें से सोना निकालने वाले या सोना साफ करने वाले थे।


व्यापार


वणिक्


उद्योग-धंधों की उन्नति के कारण इस समय देश के आंतरिक एवं विदेशी व्यापार को भी बड़ा प्रोत्साहन मिला। तत्कालीन साहित्य में अनेक प्रकार के व्यवसायियों और व्यापारियों के वर्णन मिलते हैं। उस समय के व्यापारियों के दो बड़े वर्ग उल्लेखनीय हैं। पहले वर्ग के व्यापारी वणिक् कहलाते थे। ये एक स्थान या दुकान पर बैठकर अपना माल बेचा करते थे। महाभाष्यकार ने लिखा है कि वणिक् का तराजू के साथ गहरा संबंध था। उन दिनों ब्राह्मण लोग वणिक् व्यवसाय में बहुत कम प्रवृत्तहोते थे।