मौर्योत्तर काल : शिल्प, व्यापार, नगर (200 ई.पू. 300 ई.) - Post-Mauryan Period: Crafts, Trade, Cities (200 BC – 300 AD)
मौर्योत्तर काल : शिल्प, व्यापार, नगर (200 ई.पू. 300 ई.) - Post-Mauryan Period: Crafts, Trade, Cities (200 BC – 300 AD)
स्रोत
इस युग के शिल्प व्यापार नगर पर प्रकाश डालने वाले दो मूल स्रोत हैं-
साहित्यिक स्रोत धार्मिक साहित्य
इस समय अपना वर्तमान स्वरूप धारण करने वाले सुप्रसिद्ध महाकाव्य वाल्मीकि रामायण, महाभारत, बौद्ध पालिग्रंथ मिलिन्दपञ्हो (मिलिन्द प्रश्न), महानिद्देस तथा संस्कृत भाषा में लिखे बौद्ध ग्रंथ दिव्यावदान, महावस्तु, जातकमाला, अवदानशतक एवं ललित विस्तार हैं। जैन साहित्य के सूत्रों, भाष्यों और चूर्णियों का निश्चित समय निर्धारित करना बहुत कठिन है। फिर भी इनका बड़ा भाग छठी शती ई. के बाद का नहीं हो सकता।
इसमें कुछ साहित्य कुषाण युग का है। बुधस्वामी का वृहत्कथालोकसंग्रह यद्यपि ईसा की पाँचवीं, छठी शताब्दी का ग्रंथ है, किंतु उसकी बहुत-सी सामग्री का आधार ईसा की पहली शताब्दी में लिखी गई गुणाढ्य की वृहत्कथा से है। संघदासकृत वसुदेव हिण्डिकी भी यही स्थिति है। जैन ग्रंथों में आर्थिक दशा पर प्रकाश डालने वाले कुछ निर्देश वृहत्कल्प सूत्र, आचारांग सूत्र, आवश्यक चूर्णि ज्ञाताधर्म कथा, अंतगडदसाओ में मिलते हैं।
धर्म निरपेक्ष साहित्य
इस समय का एक अन्य महत्वपूर्ण स्रोत तमिल साहित्य है। संगम युग की सुप्रसिद्ध रचनाएँ सिलप्पदिकारम् और मणिमेकलै तत्कालीन आर्थिक दशा पर सुंदर प्रकाश डालती हैं।
विदेशी विवरण
इस समय रोम के साथ भारत का व्यापार अधिक होने के कारण अनेक लेखकों ने भारत के साथ होने वाले व्यापार पर प्रकाश डाला है और व्यापारिक वस्तुओं के विवरण लिखे हैं। इनमें सब से अधिक महत्वपूर्ण ग्रंथ 'पेरिप्लस ऑफ द एरिथ्रियन सी है। इसका शाब्दिक अर्थ है 'हिंद महासागर की पथप्रदर्शक पुस्तक । लैटिन में यद्यपि एरिया (Erythra) का अर्थ लाल होता है, किंतु प्राचीन काल में रक्त सागर का प्रयोग व्यापक अर्थ में होता था, इसमें इसके अतिरिक्त अन्य समुद्र सम्मिलित थे। ईरान की खाड़ी सहित समूचे हिंद महासागर के लिए यूनानी और रोमन भूगोलवेत्ता एरिथ्रियन सी' शब्द का प्रयोग करते थे।
उन दिनों में रोमन और यूनानी समुद्रयात्री नाविकों के मार्ग प्रदर्शन के लिए जो पुस्तकें लिखी जाती थीं उनका सामान्य नाम 'पेरिप्लस' हुआ करता था। ऐसे अनेक पेरिप्लस विभिन्न लेखकों द्वारा लिखे गए। इस समय हमें जो पेरिप्लस मिलता है, उसके लेखक का नाम हमें ज्ञात नहीं है और इसकी तिथि के संबंध में तीन प्रकार के मत प्रचलित हैं किंतु अधिकांश विद्वान इसे पहली शताब्दी ई. के उत्तरार्द्ध में 80 ई. की रचना मानते हैं। दूसरा लेखक प्लिनी है। इसने अपनी पुस्तक 'नेचुरल हिस्ट्री' (नेचुरलिस हिस्टोरिका) में भारत से रोम आने वाली व्यापारिक वस्तुओं का विस्तृत वर्णन किया है। तीसरे लेखक टोलेमी ने 140 ई. में लिखे अपने भूगोल विषयक ग्रंथ 'ज्योग्राफी' में भारत का परिचय देते हुए इसके विभिन्न बंदरगाहों का वर्णन किया है। इस युग का एक अन्य लेखक स्ट्रैबी (54-24 ई. पू.) भी है।
पुरातात्विक स्रोत
मौर्योत्तर काल के प्रमुख अभिलेखों, मुद्राओं तथा पुरातत्वीय उत्खनन से प्राप्त सामग्री भी तत्कालीन शिल्प, व्यापार एवं नगरों पर प्रकाश डालती है। मौर्योत्तर काल के प्रमुख अभिलेख निम्नलिखित हैं :-
1. अयोध्या का लेख
2. बेसनगर का लेख
3. भरहुत का लेख
उपयुक्त लेखों के अतिरिक्त साँची, बेसनगर, बोधगया आदि के प्राप्त स्तूप एवं स्मारक मौर्योत्तर
शिल्प, कला एवं व्यापार की उत्कृष्टता का ज्ञान कराते हैं। इस काल की कुछ मुद्राएँ कौशांबी अयोध्या,
अहिच्छत्र तथा मथुरा से प्राप्त हुई हैं। इनसे भी तत्कालीन इतिहास पर कुछ प्रकाश पड़ता है।
1. नागनिका का नानाघाट (महाराष्ट्र के पूना जिले में स्थित) का लेख
2. गौतमीपुत्र शातकर्णी के नासिक से प्राप्त दो गुहालेख |
3. गौतमी बलश्री का नासिक गुहालेख।
4. वासिष्ठीपुत्र पुलुमावी का नासिक गुहालेख
5. वासिष्ठीपुत्र पुलुमावी का कार्ले गुहालेख ।
6. यज्ञ श्री शातकर्णी का नासिक गुहालेख ।
उपयुक्त लेख ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। लेखों के साथ-साथ विभिन्न स्थानों से सातवाहन राजाओं के बहुसंख्यक सिक्के भी प्राप्त किए गए हैं। इनके अध्ययन से उसके राज्य विस्तार, शिल्प तथा व्यापार-वाणिज्य की प्रगति के संबंध में महत्वपूर्ण सूचनाएँ उपलब्ध होती हैं। नासिक के जोगलथंबी नामक स्थान से क्षहरात शासक नहपान के सिक्कों का ढेर मिलता है। यज्ञश्री शातकर्णी के एक सिक्के पर जलपोत के चिह्न उत्कीर्ण हैं। इससे समुद्र के ऊपर उनका अधिकार प्रमाणित होता है, जिससे विस्तृत व्यापार की पुष्टि होती है।
उपरोक्त के आधार पर मौर्योत्तर युग के शिल्प, व्यापार तथा नगरों का संक्षिप्त विवेचन निम्नलिखित है।
कृषि
प्राचीन काल से वर्तमानकाल तक भारत एक कृषि प्रधान देश रहा है।
मौर्योत्तर युग में भी ऐसी ही स्थिति थी। मिलिन्द प्रश्न में विभिन्न कृषि कार्यों का विस्तृत उल्लेख करते हुए लिखा गया है कि उस समय मुख्य रूप से भूमि से काँटों, पत्थरों और जंगली घास को हटाना, भूमि को जोतना, बोना, सींचना, खेतों के चारों ओर मेड़बंदी करना, पक्षियों तथा पशुओं से फसल की रक्षा करना तथा इसकी कटाई करना इत्यादि कृषि कार्य किए जाते थे। इस समय के ग्रंथों में खेतों में बोये जाने वाले अनेक प्रकार के अनाजों जैसे धान, जौ, सरसों, तिल, गेहूँ आदि का उल्लेख मिलता है। इस समय के आयुर्वेद के ग्रंथों, जैसे- चरक सूत्र में विभिन्न प्रकार के धान्यों फसलों तथा सब्जियों का विस्तृत विवरण मिलता है। विदेशी लेखकों में प्लिनी ने भारत की कृषि वस्तुओं में धान,
जौ, सरसों का उल्लेख किया है और ऊन पैदा करने वाले पेड़ों तथा क्षौम अर्थात् अलसी के पौधों का तथा गन्ने का भी वर्णन किया है। मिलिन्द प्रश्न के अनुसार इस काल में चावल कई प्रकार का होता था। इनमें बासमती चावल के कुछ उच्च गुणवत्ता वाले प्रकार राजाओं के ही उपभोग की वस्तु समझे जाते थे।
कृषि की वस्तुओं में सुगंधित द्रव्यों मसालों और ऐसे पौधों को उगाने की ओर अधिक ध्यान दिया जाता था जिनकी विदेशों में माँग थी और जिनकी खेती से बहुत लाभ होता था। मिलिन्द प्रश्न में इस प्रकार के पदार्थों में कपूर,
तगर, चंदन और केसर की गणना की गई है। मौर्य युग में कौटिल्य ने अपने ग्रंथ में चंदन के अनेक भेदों का उल्लेख किया है। मिलिन्द प्रश्न में बनारस के चंदन का भी उल्लेख किया गया है। महाभारत में चंदन का एक उत्पत्ति स्थान कामरूप को माना गया है और उत्तर-पूर्वी हिमालय में कालेयक नामक एक सुगंधित काष्ठ का वर्णन किया गया है। दिव्यावदान में दी गई पूर्ण की कथा में यह कहा गया है कि उन दिनों गोशीर्ष नामक चंदन पश्चिमी भारत में विदेशों से मँगाया जाता था और ज्वर की चिकित्सा में इसे अत्यंत उपयोगी माना जाता था। इसी कारण यह बहुत महंगे दामों पर बिकता था।
पेरिप्लस और प्लिनी ने भारत की ऐसी अनेक बहुमूल्य वस्तुओं का उल्लेख किया है, जिनकी रोम में अत्यधिक माँग थी। इस कारण भारत में इनकी खेती बड़े पैमाने पर की जाती थी।
ऐसी वस्तुओं में निम्न पदार्थ उल्लेखनीय थे कुठ, दारुहरिद्रा, जटमांसी या बालछड ये तीनों वस्तुएँ हिमालय पर्वत के ऊँचे भागों में पैदा होती थीं। उत्तर पश्चिमी भारत के मैदानों में गंधतृण तथा गुग्गुल पाए जाते थे। काली मिर्च कोट्टोनारा अर्थात् केरल के क्लिोन तथा कोट्टायम के समीपवर्ती प्रदेश में पैदा की जाती थी। दालचीनी की खेती मालाबार तट के बंदरगाहों के पृष्ठवर्ती प्रदेशों में होती थी। पेरिप्लस के मतानुसार काठियावाड़ और उसके समीपवर्ती प्रदेश में गेहूँ, चावल, ईख और सरसों की खेती की जाती थी । इलायची मालाबार के प्रदेश में बोई जाती थी। हिमालय पर्वत के निचले ढालों में और दक्षिणी भारत की पहाड़ियों पर संभवतः कुटज के पेड़ उगाए जाते थे। प्लिनी ने भी भारत के बहुमूल्य पौधों में काली मिर्च, कुठ इलायची, गुग्गुल, दारुहरिद्रा तथा कुटज का उल्लेख किया है।
कृषि में सिंचाई का बहुत महत्व था। मिलिन्द प्रश्न के अनुसार उन दिनों भारत में तीन बार नियमित रूप से वर्षा होती थी, किंतु यह वर्षा पर्याप्त नहीं थी । अतः सिंचाई की विशेष व्यवस्था आवश्यक समझी जाती थी। महाभारत में राजा का प्रधान कर्तव्य यह बताया गया है कि उसे अपने राज्य में थोड़ी- थोड़ी यू पर तालाबों और जलाशयों का निर्माण करना चाहिए, ताकि सिंचाई का कार्य सुगमतापूर्वक किया जा सके। सर्वविदित है कि रुद्रदामन ने मौर्य सम्राट चन्द्रगुप्त द्वारा गिरनार के निकट बनाए गए सुदर्शन नामक जलाशय का जीर्णोद्धार किया था। इस जलाशय के बाँध में प्रचंड वर्षा और तूफान के कारण दरारें पड़ गई, जिससे सारा पानी बह गया,
जब इससे सिंचाई की कोई आशा न रही तो प्रजा में हाहाकार मच गया। अतः लोक-कल्याण की दृष्टि से रुद्रदामन ने मंत्रियों के विरोध की परवाह न करते हुए अपनी और से भारी व्यय करके इस बाँध की मरम्मत करवाई। इस युग के अभिलेखों में कुएँ, तालाब आदि बनवाने का • उल्लेख पाया जाता है। राजा तथा प्रजा ऐसे कार्यों का करवाना बड़ा पुण्य प्रदान करने वाला समझते थे। राजा का यह कर्तव्य था कि वह प्रजा की रक्षा और सिंचाई की व्यवस्था समुचित रूप से करें। ऐसा करने पर ही उसे खेती की उपज का छठा भाग लेने का अधिकार था।
इस काल में भूमि को साफ करके कृषि योग्य बनाने वाले किसान का उस पर स्वामित्व समझा जाता था। यद्यपि मनुस्मृति में यह कहा गया है कि राजा भूमि का अधिपति है,
किंतु इसका अभिप्राय स्वामी न होकर उसका पालन करने वाला ही है, क्योंकि राजा, चोर, डाकू आदि आंतरिक उपद्रवों से और विदेशी शत्रुओं से भूमि की रक्षा करता था। इस पर स्वामित्व कृषक का ही होता था। इन दिनों जमींदारों जैसी कोई श्रेणी संभवतः नहीं थी। याज्ञवल्क्य ने ठेके पर खेती कराने का संकेत किया है। शायद यह जमींदारी प्रथा का श्रीगणेश था। गाँवों के चारों ओर पशुओं के चरने के लिए सामूहिक चारागाह छोड़ने की प्रथा थी । भूमि के विनिमय के लिए याज्ञवल्क्य के समय तक लेख की प्रथा आवश्यक हो गई थी। इस समय के अभिलेखों में दिए जाने वाले दानों का पंजीकरण किया जाता था। गौतमीपुत्र शातकर्णी ने वैजयंती से भेजी हुई 18वें वर्ष की अपनी एक आज्ञा में किसी खेत के लिए दान दिया है। इसके अंत में यह कहा गया है कि इसका नियमपूर्वक पंजीयन कराया जाना चाहिए।
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