गुप्तकाल : आर्थिक जीवन (3) - Gupta Period: Economic Life(3)

गुप्तकाल : आर्थिक जीवन (3) - Gupta Period: Economic Life(3)

ग्रामीण जीवन


गुप्तयुग में भी अन्य युगों के समान भारत की अधिकांश जनता गाँवों में निवास करती थी। उनकी प्रधान वृत्ति कृषि और पशुपालन था। कृषि की अमित संपदा उनकी थी। जनपदों और नगरों का कृषि से पेट पलता था। कृषि के साथ-साथ लोकप्रिय व्यवसाय पशु-पालन था। कृषि के लिए उपयुक्त पशु भार ढोने वाले पशु, देश को घी, दूध, दही, मक्खन आदि से तृप्त रखने वाले पशु और उनको पालने वाले लोग गाँवों में निवास करते थे। पशु-पालन का कार्य प्रधान तथा गोपालों या घोषों (घोषियों द्वारा होता था। ग्रामों में पशुओं की संख्या बहुत अधिक थी और ग्रामों में चारागाहों की संख्या भी बहुत थी । कृषि से संबंधित अन्य व्यवसाय करने वाले जैसे सुतार (बढ़ई),

लुहार आदि भी गाँवों में रहते थे, उनका अपना धंधा था, अपनी कला थी। ग्रामीण जीवन सुखी और सफल था। गाँवों के निवासी नगर के छल-छंद से दूर श्रमशील, संयमी और कठिन कर्तव्य का जीवन व्यतीत करते थे। उनकी श्रम शिला पर अन्य वर्णों और


वर्गों का भार टिका हुआ था। कृषि और पशुपालन का महत्व होने से भूमि का विशेष महत्व था। संभवतः भूमि प्राप्त करने और भूमि की संपत्ति में वृद्धि करने की प्रवृत्ति लोगों में बलवती हो रही थी। इससे भूमि संबंधी विवादों में भी वृद्धि हो गई थी। तत्कालीन स्मृति ग्रंथों में भूमि के विवादों की चर्चा विस्तार से की गई है।

राज्य की ओर से भी भूमि के वितरण और भूमि के क्रय-विक्रय की समुचित कठोर व्यवस्था थी। तत्कालीन दानपत्रों के अभिलेखों से और अन्य अभिलेखों के विश्लेषण से विदित होता है कि भूमि का वितरण, भूमि का क्रय- विक्रय और हस्तांतरण ग्राम परिषद् की स्वीकृति और उसके माध्यम से होता था। ग्राम महात्तारों की उपस्थिति में भूमि का हस्तांतरण किया जाता था और उनके निरीक्षण में ही कृषि भूमि के खंडों और उपखंडो का सीमा रेखांकन भी कर दिया जाता था। ब्राह्मणों को अग्रहार आदि के रूप में प्रचुर मात्रा में भूमि दी जाती थी। स्मृतियों से विदित होता है कि जब भूमि के स्वामी स्वयं भूमि को न जोत कर अपनी भूमि बटाई पर देते थे और जो व्यक्ति कृषि भूमि को जोतते और बोते थे,

तब उनके श्रम के बदले में उन्हें 35 से 50 प्रतिशत उत्पादन प्राप्त होता था। कृषकों में बेगार (विष्टि) प्रथा भी उस समय प्रचलित थी। इस प्रकार यद्यपि नगरों में उच्चस्तरीय समृद्धि, वैभव और विलास का जीवन था, फिर भी सामान्य ग्रामीण जीवन में अर्थ का अभाव नहीं था। जीवन-यापन सुलभ और सरल था।


सामान्य जीवन


गुप्तकालीन साहित्य में नागरिक जीवन का जो चित्रण हुआ है, उससे तत्कालीन उच्चस्तरीय वैभवपूर्ण जीवन का ही चित्र उभरता है। सामान्य नागरिक के आर्थिक जीवन की स्पष्ट झलक नहीं मिलती।

संभावित अनुमान इस बात से किया जा सकता है कि 12 दीनार के दान के सूद से एक भिक्षुको नियमित रूप से नित्य भोजन दिया जा सकता था। इस रकम पर कितना सूद प्राप्त होता था, इसका तो अभिलेख में उल्लेख नहीं है, पर यदि स्मृतियों में उल्लिखित सवा प्रतिशत प्रतिमास के सामान्य सूद को इसका आधार मान लें तो इसका अर्थ यह होगा कि प्रतिमास उसका सूद 3/20 दीनार अर्थात् सवा दो रूपक होगा। एक रूपक सिक्के में 32 से 36 ग्रेन चाँदी पाई जाती है। इस प्रकार 80 ग्रेन चाँदी के मूल्य से एक भिक्षु को एक मास तक भोजन कराया जा सकता था। आज के भाव से इस चाँदी का दाम लगभग दो रूपया हुआ, जो उस समय किसी एक व्यक्ति के एक दिन के भोजन के लिए पर्याप्त है। स्पष्ट है कि गुप्तकाल में सामान्य जीवन-यापन अत्यंत सुलभ था।


मूल्यांकन


एस. के. मैती का विचार है कि गुप्तकाल में भारत तथा पाश्चात्य विश्व के बीच व्यापारिक संबंधों में गिरावट आ गई थी। इसका प्रमाण हमें कुमारगुप्त कालीन मंदसौर लेख से मिलता है जिससे ज्ञात होता है कि पट्टवायश्रेणी लाट प्रदेश को छोड़कर दशपुर में जाकर बस गई थी। इस प्रवजन का मुख्य कारण यही प्रतीत होता है कि इस समय पश्चिमी देशों के साथ व्यापार लाभकारी नहीं रह गया था। आर. एस. शर्मा भी आर्थिक दृष्टि से गुप्तकाल को पतन का काल मानते हैं। किंतु यह विचार सही नहीं है। मंदसौर लेख से यह ज्ञात नहीं होता है कि बुनकरों की श्रेणी ने अपना परंपरागत पेशा छोड़कर अन्य पेशों को अपना लिया था। इसी लेख में एक स्थान पर कहा गया है

कि उन्होंने शिल्प द्वारा अर्जित धन से सूर्य के भव्य मंदिर का निर्माण करवाया तथा बाद में क्षतिग्रस्त होने पर उसका जीर्णोद्धार भी करवाया था। यदि बुनकर अभावग्रस्त होते तो अपनी गाढ़ी कमाई का उपयोग मंदिर निर्माण में कदापि नहीं करते। बुनकरों का प्रवजन सुरक्षा संबंधी कारणों से भी हो सकता है। इस संबंध में एक अन्य विचारणीय बात यह है कि रोम के साथ स्थल मार्ग से व्यापार भी होता था तथा यह चौथी सदी में इतना अधिक विकसित हुआ कि "सिल्क जो आर्लियन के काल में सोने से तौल कर बिकता था तथा धनी एवं कुलीन वर्ग की विलासिता की वस्तु था, वह जूलियन के काल में इतना सस्ता हो गया कि सामान्य मनुष्य भी उसे खरीद सकता था। ' अतः यह नहीं कहा जा सकता कि गुप्तयुग में भारत का रोम के साथ व्यापारिक संबंध पतनोन्मुख रहा। रोम के इतिहास पर दृष्टि डालने से ज्ञात होता है

कि 408 ई. में हूण आक्रांता एलरिक ने रोम का घेरा डाला तथा फिरौती के रूप में तीन हजार पौंड गोलमिर्च तथा चार हजार थान रेशमी वस्त्र प्राप्त करने के बाद ही अपना घेरा उठाया था। यह इस बात का सूचक है कि पाँचवी शती में भी रोम में भारतीय माल प्रचुर मात्रा में था। रोम के पतन के बाद उसका स्थान कुस्तुनतुनिया ने ग्रहण किया तथा कांन्स्टेंटाइन महान ने 330 ई. में उसे अपने शासन का केंद्र बनाया। इस समय से भारत तथा रोम का व्यापारिक संबंध और घनिष्ठ हो गया। कुस्तुंतुनिया के अभिजात लोग अत्यंत धनी एवं विलासप्रिय थे जिनकी आवश्यकताएँ केवल पूर्वी देश ही पूरी कर सकते थे। कुस्तुंतुनिया के चिकित्सा प्रबंधों से पता चलता है कि वहाँ के बाजारों में सभी प्रकार के भारतीय मसाले बहुतायत में विक्रय होते थे।

जुस्तिनियन 'लॉ डाइजेस्ट' में आयातित वस्तुओं की जो सूची मिलती है, उनमें अधिकांश भारतीय हैं। भारत के विभिन्न भागों से प्राप्त कुस्तुंतुनिया सिक्कों से भी दोनों देशों के बीच घनिष्ठ व्यापारिक संबंधों की सूचना मिलती है। अतः यह सिद्ध करने के लिए कोई भी प्रमाण नहीं है कि गुप्तयुग में व्यापार वाणिज्य का ह्रास हुआ। रोमिला थापर के शब्दों में, 'गुप्तकाल की व्यापारिक समृद्धि उस आर्थिक प्रगति का अंतिम चरण थी जो पिछले काल में प्रारंभ हुई थी।"



सुनार करते थे। इसी प्रकार जुलाहों के हाथ में कपड़े बुनने का उद्योग था। निष्कर्ष यह है कि वर्गगत व्यवसाय के रूप में लोग अपने-अपने घरों में अपना-अपना परंपरागत व्यवसाय करते थे।


व्यापार- • कृषि और उद्योग पर अवलंबित आर्थिक जीवन की व्यवस्था का माध्यम व्यापार था। गुप्तकाल में इस व्यापार के दो स्पष्ट रूप थे। एक का नियंत्रण श्रेष्ठि करते थे और दूसरे का सार्थवाह। श्रेष्ठि जनता की आवश्यकताओं की पूर्ति किया करते थे। उनकी दुकानें नगरों और ग्रामों में प्रायः सभी जगह होती थी। सार्थवाह एक स्थान से दूसरे स्थान तक आते-जाते थे और इस प्रकार वे देश-विदेश का माल एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचाने का काम करते थे। इस प्रकार वे यातायात के व्यवस्थापक और थोक व्यापारी दोनों का काम करते थे।


मुद्रा - आर्थिक जीवन की समृद्धि की द्योतक मुद्राएँ हुआ करती हैं। अतः आर्थिक दृष्टि से गुप्त काल का महत्व इस बात में है कि गुप्त सम्राटों ने अत्यधिक मात्रा में सोने के सिक्के प्रचलित किए थे। इस दृष्टि से इस युग को स्वर्ण युग कहा जा सकता है। भूमि के क्रय-विक्रय में मूल्य का निर्धारण इन्हीं सोने के सिक्कों में होता था। भू-कर के रूप में हिरण्य का उल्लेख मिलता है, इससे भी यह अनुमान होता है कि कर का कुछ अंश सिक्कों में वसूल किया जाता था।


ग्रामीण जीवन गुप्तयुग में भी अन्य युगों के समान भारत की अधिकांश जनता गाँवों में निवास करती


थी। उनकी प्रधान वृत्ति कृषि और पशुपालन था। कृषि की अमित संपदा उनकी थी। जनपदों और नगरों का कृषि से पेट पलता था। कृषि के साथ-साथ लोकप्रिय व्यवसाय पशु-पालन था। सामान्य जीवन- गुप्तकालीन साहित्य में नागरिक जीवन का जो चित्रण हुआ है, उससे तत्कालीन उच्चस्तरीय वैभवपूर्ण जीवन का ही चित्र उभरता है। संभावित अनुमान इस बात से किया जा सकता है। कि 12 दीनार के दान के सूद से एक भिक्षुको नियमित रूप से नित्य भोजन दिया जा सकता था।