कुषाण युग (3) - Kushan Age(3)

कुषाण युग (3) - Kushan Age(3)

 शासन प्रबंध


महाराज कनिष्क के शासन प्रबंध पर उसके अभिलेखों से प्रकाश पड़ता है। यह क्षत्रप प्रणाली थी. जिसमें साम्राज्य के प्रदेश और प्रांत महाक्षत्रपों तथा क्षत्रपों द्वारा शासित होते थे। कनिष्क के सारनाथ अभिलेख में वनस्फर को क्षत्रप तथा खरपल्लन को महाक्षत्रप कहा गया है। वे दोनों सारनाथ- वाराणसी में ही नियुक्त थे। उनके कार्यों और पदों में विभेदन करना कठिन है, क्योंकि अन्यंत्र महाक्षत्रप का उल्लेख नहीं किया गया है। डॉ. पुरी की ऐसी धारणा है कि खर- पल्लान कनिष्क राज्य के पूर्वी भाग का शासक था।


कनिष्क और बौद्ध धर्म


महाराज कनिष्क की बौद्ध धर्म में श्रद्धा थी और वह महायान संप्रदाय का था। उसने अत्यंत उत्साह से बौद्ध धर्म का प्रचार किया।

उसके राजकीय वैभव से बौद्ध धर्म का अत्यधिक प्रसार हुआ। महाराज कनिष्क बौद्ध आचार्य पार्श्व से बौद्ध ग्रंथ पढ़ते थे। विभिन्न बौद्ध संतों ने मध्य एशिया और चीन में बौद्ध धर्म का प्रचार किया। इन बौद्ध सतों में काश्यप मातंग का नाम विशेष उल्लेखनीय है, जिन्होंने कई बौद्ध सूत्रों का चीनी में अनुवाद किया।


कनिष्क के प्रोत्साहन से ही कश्मीर के निकट कुंडलवन में महती बौद्ध सभा हुई। इसके सभापति वसुमित्र तथा उपसभापति अश्वघोष हुए। इसमें त्रिरत्न पर टीकाएँ रची गई तथा महाविभाष ग्रंथ भी बना।

यह बौद्ध दर्शनों का विश्वकोश है। महायान त्रिपिटक भी इसी सभा में निश्चित हुआ। इस सभा का पूर्ण कार्य संस्कृत में हुआ। अंत में सभी टीकाएँ ताम्रपत्रों पर लिखी गई, जो कनिष्क द्वारा बनवाए गए स्तूपों में वहीं रखी गई।



कनिष्क के सिक्कों और अभिलेखों से सिद्ध होता है कि वह बौद्ध था, परंतु बौद्ध होते हुए भी सभी संप्रदायों के प्रति उदार और सहिष्णु था। उसके सिक्कों पर विभिन्न देवी-देवताओं की मूर्तियों और नामों से भी यही ज्ञात होता है।

यद्यपि सम्राट कनिष्क विदेशी तुरुष्क था, किंतु बिना किसी संकोच के उसने भारतीय संस्कृति धर्म, भाषा और विचारों का उन्नयन किया। वह विदेशी होते हुए भी भारतीय बन गया,


जिसकी उदारता


सराहनीय है। उसके ही राजाश्रय में गांधारकला और मथुरा कला की उन्नति हुई। कनिष्क की मृत्यु 23 वर्ष तक शासन करने के बाद 101 ई. में हो गई। उसके बाद उनके पुत्र वासिष्क ही सम्राट हुए, जो मालवा में उपराज थे। वह 4 वर्ष के अल्पकाल तक शासक रहे और उनकी मृत्यु हो गई। तत्पश्चात् हुविष्क गद्दी पर बैठा।


कनिष्क की मृत्यु के बाद ही उसके साम्राज्य के दुर्दिन प्रारंभ हो गए। कुछ विद्वान मानते हैं कि वासिष्क की मृत्यु (105 ई.) के बाद ही कुषाण साम्राज्य क्षीण होने लगा और उसका विभाजन भी हो गया। परंतु इसका कोई साक्ष्य नहीं है कि उसके साम्राज्य का बँटवारा हुआ।


हुविष्क


हुविष्क अभिलेख कनिष्क संवत् 28-62 वर्षों के प्राप्त हैं। उसके सिक्के कपिश से बिहार तक पाए गए हैं, जिससे सिद्ध होता है कि उसके समय में कुषाण साम्राज्य अक्षुण्ण बना रहा। उसके सोने और तांबे के सिक्कों से राज्य की समृद्धि भी सिद्ध होती है।


कल्हण भी राजतरंगिणी में हुष्कपुर का उल्लेख करते हैं जिसकी स्थापना हुविष्क ने की थी।


अपने पिता (कनिष्क ) की भाँति वह उदार और सहिष्णु था। उसके सिक्कों पर यूनानी, पारसी


और भारतीय देवताओं को मूर्त रूप दिया गया है। ब्राह्मण धर्म के प्रति उसका विशेष झुकाव था। वह


(जगदंबा देवी का उपासक था।


वासुदेव


हुविष्क के दीर्घकालीन (लगभग 35 वर्ष) शासन के बाद वासुदेव राजा हुआ यह कुषाण वंश का अंतिम सम्राट था। उसका नाम भारतीयता का परिचायक है। वह शैव था।

उसके सिक्कों पर पार्वती और उमेश शिव का चित्रण है। संभवतः दूरस्थ प्रांतों में कुषाण सत्ता में शैथिल्य आने लगा। उसके अभिलेख कनिष्क संवत् 67 तक प्राप्त हुए हैं।


वासुदेव की मृत्यु के बाद कुषाण साम्राज्य टूट गया और शक्ति क्षीण हो गई। इस क्षीण युग में भी कुषाण शासक जिनके भी नाम कनिष्क आदि थे, राज्य करते रहे। इनके कमजोर होते ही स्वतंत्रता प्रिय जातियों ने अपना सिर उठाया और अपने राज्यों को जो कुषाण साम्राज्य में विलीन हो गए थे,

स्वतंत्र करने का प्रयत्न किया। इनमें यौधेय, आर्जुनायन, कुणिंद और मालव विशेष रूप में उल्लेखनीय गण जातियाँ हैं। नृपसत्ताओं ने भी अपना प्रभुत्व स्थापित करने का प्रयत्न किया।


इस प्रकार कुषाण साम्राज्य के पतन और गुप्त साम्राज्य के उदय होने के बीच मध्य देश में स्वतंत्रता प्राप्ति का राष्ट्रीय आंदोलन चल पड़ा, जिसका अंत गुप्त साम्राज्य की स्थापना में हुआ और मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद पहली बार गुप्त युग में राष्ट्रीय शक्ति और एकता तथा शांति और समृद्धि की स्थापना हुई। फलतः : संस्कृति की सर्वांगीण उन्नति हुई। परंतु यह मानना पड़ेगा कि समन्वय का युग कुषाण युग ही था। कुषाणों की इस सहिष्णु आधारशिला पर ही गुप्त वंश की स्थापना हुई।



कुषाण साम्राज्य के पतन के बाद उत्तरी भारत


कुषाण साम्राज्य के पतन के उपरांत और गुप्त चंद्रोदय के पूर्व उत्ती भारत के इतिहास को अंधकार युग कहा जाता है। ऐसा स्मिथ का कथन है, किंतु जिस समय स्मिथ ने लिखा था उसके बाद शोधों से नए तथ्य प्रकाश में आए और डॉ. जायसवाल ने इस युग के इतिहास पर महत्वपूर्ण कार्य किया। उनके अनुसार इस युग में नाग भारशिव साम्राज्यवाद का उदय हुआ जिसका आधार अश्वमेध यज्ञ का संपादन और दिग्विजय था। परंतु आधुनिक विद्वान इसे नहीं मानते हैं। डॉ अल्टेकर के मतानुसार यौधेयों, कुणिदों, मालवों, नागों और मघों ने कुषाण सत्ता को उखाड़ फेंका। परंतु इस स्वतंत्रता संघर्ष में भारशिवों और वाकाटकों का कम योगदान नहीं रहा।