चंद्रगुप्त द्वितीय/चंद्रगुप्त विक्रमादित्य (380 ई.-412 ई.) - Chandragupta II/Chandragupta Vikramaditya (380 AD-412 AD)
चंद्रगुप्त द्वितीय/चंद्रगुप्त विक्रमादित्य (380 ई.-412 ई.) - Chandragupta II/Chandragupta Vikramaditya (380 AD-412 AD)
चंद्रगुप्त द्वितीय गुप्त वंश के महानतम् सम्राटों में से एक है। चंद्रगुप्त रामगुप्त का छोटा भाई था तथा उसके अल्पकालीन शासन के पश्चात् सिंहासनारूढ़ हुआ।
साधन
चंद्रगुप्त पर प्रकाश डालने वाली सामग्री में प्रमुख उसके अभिलेख, मुद्राएँ व अनेक साहित्यिक स्रोत हैं। चंद्रगुप्तके अब तक कुल 6 अभिलेख प्राप्त हुए हैं जिनसे उसके विषय में व्यापक जानकारी प्राप्त होती है। उसके अभिलेख निम्नलिखित हैं- मथुरा का स्तंभ लेख, मथुरा का शिलालेख, उदयगिरी से प्राप्त दो लेख, गढ़वा (इलाहबाद के समीप) लेख व साँची का लेखा चंद्रगुप्तकी अनेक मुद्राएँ भी प्राप्त हुई हैं। साहित्यिक स्रोतों में फा-हियान का वर्णन प्रमुख है क्योंकि फाहियान ने चंद्रगुप्तके शासनकाल में ही भारत की यात्रा की थी।
नाम व उपाधियाँ
चंद्रगुप्त के अभिलेखों व मुद्राओं से उसके अनेक नामों व विरुदों के विषय में पता चलता है। उसकी मुद्राओं में उसे देवश्री, विक्रम, विक्रमादित्यः सिंहविक्रम, सिंहचंद्र परमभागवत, अजितविक्रम, विक्रमांक अप्रतिरथ आदि विरूदों से अलंकृत कहा गया है। साँची अभिलेख में उसे देवराज व वाकाटक अभिलेखों से देवगुप्त कहा गया है। चंद्रगुप्तके उपरोक्त विरुद उसकी महानता के परिचायक हैं।
विवाह संबंध
प्रो. राय चौधरी ने लिखा है कि गुप्तों के वैवाहिक संबंध उनकी वैदेशिक नीति में विशिष्ट स्थान रखते हैं। चंद्रगुप्त प्रथम द्वारा लिच्छवियों से विवाह संबंध स्थापित करने के कारण ही गुप्त साम्राज्य को शक्ति व दृढ़ता मिली थी।
प्रयाग प्रशस्ति से ज्ञात होता है कि समुद्रगुप्त ने गणराज्यों व विदेशी राज्यों से कन्याओं को उपहार स्वरूप प्राप्त किया था। अपने पूर्वजों के समान ही चंद्रगुप्त ने वैवाहिक संबंधों के महत्व को समझते हुए समकालीन राजवंशों के साथ वैवाहिक संबंध स्थापित कर गुप्त साम्राज्य को और अधिक शक्तिशाली बनाया। चंद्रगुप्त द्वितीय ने निम्नलिखित राजवंशों के साथ विवाह संबंध स्थापित किए नागवंश
गुप्तकाल में नाग वंश एक शक्तिशाली वंश था जिसकी अनेक शाखाएँ भारत के विभिन्न भागों में शासन कर रहीं थीं। पूना एवं रिठपुर ताम्रपत्रों से ज्ञात होता है कि चंद्रगुप्तद्वितीय ने नागवंशीय राजकुमारी कुबेरनागा से विवाह किया था और इस प्रकार नागों से मैत्रीपूर्ण संबंध स्थापित किए।
डॉ. आर. सी. मजूमदार ने इस विवाह के महत्व के विषय में लिखा है, “नाग, एक शक्तिशाली शासक जाति थी और उनसे विवाह मैत्री चंद्रगुप्तको अभिनव स्थापित गुप्तों की अधीश्वरी सत्ता को शक्तिशाली बनाए रखने में बहुत उपयोगी सिद्ध हुई होगी।"
वाकाटक वंश
वाकाटक वंश दक्षिणापथ का एक अत्यंत शक्तिशाली राजवंश था। समुद्रगुप्त ने भी अपने दक्षिणापथ के अभियान के समय उनसे युद्ध नहीं लड़ा था, इसी से वाकाटक वंश की शक्ति का अनुमान लगाया जा सकता है। चंद्रगुप्त द्वितीय ने वाकाटक वंश के राजकुमार रुद्रसेन द्वितीय से अपनी पुत्री प्रभावती गुप्त का विवाह कर दिया।
इस विवाह संबंध का अत्यधिक राजनीतिक महत्व था। एक शक्तिशाली साम्राज्य होने के अतिरिक्त वाकाटक राज्य अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण शकों पर विजय प्राप्त करने की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण था। इस विषय में स्मिथ ने लिखा है, "वाकाटक नरेश के राज्य की भौगोलिक स्थिति ऐसी थी कि वह गुजरात व सौराष्ट्र के शक क्षत्रपों के विरुद्ध किसी भी उत्तरी भारत की शक्ति के लिए उपयोगी अथवा अनुपयोगी सिद्ध हो सकता था। अतः शकों के विरुद्ध अभियान में चंद्रगुप्त को अपने दामाद रुद्रसेन से अत्यधिक सहायता प्राप्त हुई होगी, इसका सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। 390 ई. में रुद्रसेन द्वितीय की मृत्यु के पश्चात् प्रभावती गुप्त ने ही वाकाटक राज्य का संचालन किया जिससे वाकाटक साम्राज्य पर गुप्त-वंश का भारी प्रभाव स्थापित हो गया। इस प्रकार राजनीतिक दृष्टि से यह विवाह संबंध अत्यधिक महत्वपूर्ण प्रमाणित हुआ।
कदंब-वंश
कदव वंश कुंतल में राज्य कर रहा था। चंद्रगुप्त ने दक्षिण के इस राजवंश के साथ भी वैवाहिक संबंध स्थापित किए जिसके विषय में तालगुंड के स्तंभ लेख से पता चलता है। इस लेख के अनुसार ककुत्स्थवर्मन नामक कुंतल शासक की राजकन्या का गुप्त वंश में विवाह हुआ था। कालिदास व क्षेमेंद्र की रचनाओं से भी चंद्रगुप्त द्वितीय व कदंब - वंशीय शासक के मैत्रीपूर्ण संबंधों पर प्रकाश पड़ता है।
शक- विजय
चंद्रगुप्त द्वितीय के शासनकाल की सर्व प्रमुख घटना उसके द्वारा शकों को परास्त किया जाना था। समुद्रगुप्त ने यद्यपि भारत के विस्तृत भू-भाग पर विजय प्राप्त की थी किंतु उसकी विजय का गुजरात व काठियावाड़ में शासन कर रहे शकों पर कोई प्रभाव नहीं हुआ था।
चंद्रगुप्तद्वितीय भारत से विदेशी राज्य को पूर्णतः समाप्त करना चाहता था तथा वाकाटकों के गुप्तों के सहयोगी (विवाह संबंधद्वारा बन जाने के कारण चंद्रगुप्त के लिए शकों को परास्त करने का कार्य सुगम हो गया था। डॉ. बसाक ने लिखा है कि मालवा व सौराष्ट्र पर विजय प्राप्त करने में चंद्रगुप्त को अपने दामाद (वाकाटक राजा) से यथेष्ट सहायता प्राप्त हुई थी।
चंद्रगुप्त द्वितीय की शक- विजय के विषय में विभिन्न साधनों से प्रकाश पड़ता है। साहित्यिक स्रोतों में देवीचंद्रगुप्तम् (विशाखदत्त) व हर्षचरित आदि ग्रंथों में चंद्रगुप्तद्वारा शक राजा की हत्या किए जाने का वर्णन मिलता है।
अभिलेखीय साक्ष्यों में उदयगिरी पर्वत से प्राप्त लेख इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है। चंद्रगुप्त द्वितीय की अनेक मुद्राओं व शकों की मुद्राओं से भी इस तथ्य की पुष्टि होती है।
युद्ध की घटनाएँ
वाकाटकों से सहयोग प्राप्त करने के उपरांत चंद्रगुप्त द्वितीय ने सर्वप्रथम मालवा पर अधिकार किया तथा मालवा को आधार बनाकर चंद्रगुप्त ने शकों पर आक्रमण किया। इस युद्ध में चंद्रगुप्त द्वितीय शकों को परास्त किया तथा शकराज रुद्रसिंह तृतीय मारा गया। तत्पश्चात् चंद्रगुप्तद्वितीय ने शक- राज्य को गुप्त साम्राज्य में मिला लिया। इस प्रकार शक सत्ता का भारत से उन्मूलन करने में चंद्रगुप्त द्वितीय सफल हुआ।
चंद्रगुप्त द्वितीय ने शकारि की उपाधि इसी विजय के उपरांत धारण की थी। चंद्रगुप्त द्वितीय की 'विक्रमांक' व 'विक्रमादित्य' उपाधियाँ भी इसी विजय की ओर संकेत करती हैं क्योंकि भारतीय परंपरा के अनुसार 57 ई. पू. में राजा विक्रमादित्य ने भी इसी प्रकार शकों का उन्मूलन किया था, अतः संभवत: चंद्रगुप्त द्वितीय ने इसी कारण ये उपाधियाँ धारण की होगी। डॉ. मजूमदार ने इस विषय में लिखा है कि चंद्रगुप्त द्वितीय के द्वारा धारण किए गए विरुद, युद्ध-स्थल में प्राप्त उस यश के परिचायक हैं जो कि हिंदू पौराणिक गाथाओं में उच्चतम आदर्शों के प्रतीक स्वीकार किए जाते हैं।
महत्व
चंद्रगुप्त द्वितीय की शकों पर विजय का अत्यधिक राजनीतिक एवं सांस्कृतिक महत्व है। इसी कारण वी. ए. स्मिथ ने चंद्रगुप्त की इस विजय को उसकी महानतम् विजय कहा है।
इसी विजय के परिणामस्वरूप तीन शताब्दियों से भी पुराने विदेशी राज्य का पश्चिमी भारत से लोप हो गया। इसके अतिरिक्त इस विजय के परिणामस्वरूप ही गुप्त साम्राज्य की सीमाएँ गुजरात, काठियावाड़ तथा पश्चिमी मालवा तक विस्तृत हो गई। उपरोक्त राजनीतिक महत्व के अतिरिक्त शक- विजय का अत्यधिक आर्थिक व सांस्कृतिक महत्व भी है। इस विजय के परिणामस्वरूप गुप्त साम्राज्य के अधीन भृगुकच्छ (भड़ींच) का बंदरगाह भी आ गया। इस बंदरगाह से ही भारत का पश्चिमी देशों के लिए व्यापार होता था। इस प्रकार इस व्यापार पर गुप्तों का नियंत्रण हो गया जिससे आर्थिक लाभ के साथ-साथ उनकी ख्याति पश्चिमी देश में भी पहुँचने लगी।
गणराज्यों पर विजय
समुद्रगुप्त ने अपने विजय अभियान के द्वारा अनेकानेक गणराज्यों को अपनी अधीनता स्वीकार करने के लिए विवश किया था किंतु उन्हें गुप्त साम्राज्य में विलीन नहीं किया था।
चंद्रगुप्त द्वितीय ने इन गणराज्यों पर विजय प्राप्त करके गुप्त साम्राज्य में मिला लिया।
बाह्रीक विजय
महरौली स्तंभ-लेख में कहा गया है कि चंद्रगुप्तने सिंधु के पाँच मुखों को पार कर बाह्रीकों पर विजय प्राप्त की। डॉ. मजूमदार आदि कुछ विद्वानों ने बाह्लीक का समीकरण बैक्ट्रिया से किया है और इस प्रकार चंद्रगुप्तको बैक्ट्रिया पर विजय प्राप्त करने का श्रेय दिया है किंतु अनेक विद्वान इस मत से सहमत नहीं है। प्रो. यू. एन. राय ने लिखा है कि बाह्रीक (बल्ख) विजय से तात्पर्य बाह्रीक जाति से है जो कि उस समय भारत वर्ष में महत्वपूर्ण सत्ता के रूप में शासन कर रही थी। प्रो. राय के विचार में बाह्रीक उत्तरी- कुषाणों को कहते थे क्योंकि वे किसी समय बैक्ट्रिया के शासक रह चुके थे।
अतः चंद्रगुप्तने इसी प्रदेश में उत्तरी-कुषाणों को परास्त किया होगा। इस विजय की स्मृति में विष्णुपद (व्यास नदी के समीप) पर चंद्रगुप्तने विष्णुध्वज (लौह स्तंभ) की स्थापना की। कालांतर में यह लौह स्तंभ फिरोजशाह तुगलक द्वारा अपने मूल स्थान से दिल्ली में स्थानांतरित किया गया।
पूर्वी प्रदेशों पर विजय
मेहरौली स्तंभ लेख से ही चंद्रगुप्त द्वितीय की पूर्वी प्रदेशों पर विजय के विषय में पता चलता है। ऐसा प्रतीत होता है कि रामगुप्त के शासनकाल में उसकी दुर्बलता से लाभ उठाकर समुद्रगुप्त द्वारा पराजित बंगाल व अन्य पूर्वी प्रदेशों के शासकों ने एक संघ बना लिया।
चंद्रगुप्तद्वितीय ने इस संघ को परास्त किया। इस प्रकार इस विजय से संपूर्ण वंग- प्रदेश पर गुप्तों का अधिपत्य हो गया तथा ताम्रलिप्ति का महत्वपूर्ण बंदरगाह भी गुप्तों के अधीन हो गया।
दक्षिणापथ से संबंध
महरौली स्तंभ लेख में कहा गया है कि चंद्र के प्रताप से दक्षिणी सागर सुगंधित हो उठा था। इस आधार पर कुछ इतिहासकारों का विचार है कि चंद्रगुप्त ने दक्षिण के राजाओं को भी परास्त किया था किंतु यह मत उचित प्रतीत नहीं होता क्योंकि किसी अन्य स्रोत से इसकी पुष्टि नहीं होती।
साम्राज्य-विस्तार
अपनी विजय के परिणामस्वरूप चंद्रगुप्त द्वितीय ने एक विशाल गुप्त साम्राज्य की स्थापना की। उसका राज्य पश्चिम में गुजरात से लेकर पूर्व में बंगाल तक, उत्तर में हिमालय की तलहटी से दक्षिण में नर्मदा नदी तक विस्तृत था।
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