कुमारगुप्त प्रथम (413 ई. 455 ई.) - Kumaragupta I (413 AD 455 AD)
कुमारगुप्त प्रथम (413 ई. 455 ई.) - Kumaragupta I (413 AD 455 AD)
चंद्रगुप्त द्वितीय के पश्चात् उसका पुत्र कुमारगुप्त सिंहासनारूढ़ हुआ। चंद्रगुप्त द्वितीय के साँची अभिलेख से प्राप्त अंतिम तिथि 412 ई. है तथा कुमारगुप्त की प्रथम ज्ञात तिथि 415 ई. है जो कि भिलसद अभिलेख से ज्ञात होती है। इस प्रकार कुमारगुप्त 412 व 415 ई. के मध्य किसी समय शासक बना होगा। इसी आधार पर अधिकांश विद्वानों का विचार है कि वह 413 ई. में सिंहासनारूढ़ हुआ। कुमारगुप्त प्रथम की चाँदी की मुद्राओं से ज्ञात अंतिम तिथि 455 ई. है, अतः स्पष्ट है कि कुमारगुप्त ने 413 ई. से 455 ई. तक शासन किया था।
स्रोत
कुमारगुप्त के विषय में उसके अभिलेखों व मुद्राओं से जानकारी प्राप्त होती है।
कुमारगुप्त के तेरह अभिलेख प्राप्त हुए हैं। इनके अतिरिक्त दामोदरपुर, धनैदह व वैग्राम के ताम्रपत्रों से भी कुमारगुप्त के विषय में विस्तृत जानकारी मिलती है। कुमारगुप्त की मुद्राओं से भी महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है। स्कंदगुप्त के भीतरी अभिलेख से भी कुमारगुप्त के शासनकाल पर प्रकाश पड़ता है।
विरुद
कुमारगुप्त ने अनेक उपाधियाँ धारण कीं, जिनके विषय में उसके अभिलेखों व मुद्राओं से पता चलता है। उसने महेंद्रकुमार, श्रीमहेंद्र, श्रीमहेंद्रसिंह, अजित महेंद्र, गुप्तकुल- व्योम शशि' आदि उपाधियाँ धारण की थीं। उसकी सबसे प्रमुख उपाधि महेन्द्रादित्य' थी।
शासनकाल की प्रमुख घटनाएँ
कुमारगुप्त के अभिलेखों से ज्ञात होता है कि उसके शासन के प्रारंभिक वर्ष शांतिपूर्वक व्यतीत हुए। कुमारगुप्त को पैतृक रूप में अपने पिता का विस्तृत साम्राज्य प्राप्त हुआ था, अतः साम्राज्य विस्तार की ओर ध्यान न देकर उसने अपने शासनकाल के प्रारंभ में साम्राज्य के साधनों का प्रयोग सार्वजनिक एवं धार्मिक कृत्यों में किया। भिलसद अभिलेख से ज्ञात होता है कि कुमारगुप्त के साम्राज्य में चतुर्दिक सुख एवं शांति का वातावरण विद्यमान था।
पुष्यमित्रों से युद्ध
स्कंदगुप्त के भीतरी अभिलेख से ज्ञात होता है कि कुमारगुप्त के शासनकाल का अंतिम चरण शांतिपूर्ण न था। इस काल में पुष्यमित्रों ने गुप्त साम्राज्य पर आक्रमण किया।
इस अभिलेख के अनुसार इस आक्रमण के परिणामस्वरूप इस कुल की राजलक्ष्मी विचलित हो उठी। इसे स्थिर करने में स्कंदगुप्त को कठोर प्रयास करना पड़ा। पुष्यमित्रों की बाढ़ को रोकने में उसे पूरी रात्रि युद्धभूमि में ही व्यतीत करनी पड़ी। भीतरी लेख से ज्ञात होता है कि पुष्यमित्रों की सैन्य शक्ति और साधन विकसित थे तथा उनसे टक्कर लेना एक दुकर कार्य था। इसी कारण इस लेख में तीन बार गुप्तों की लक्ष्मी विचलित होने का उल्लेख है, जिससे इस आक्रमण की तीव्रता का अनुमान किया जा सकता है। कुमारगुप्त इस समय तक वृद्ध हो चुका था, अतः इस युद्ध का संचालन उसके पुत्र स्कंदगुप्त ने किया तथा पुष्यमित्र जैसे शक्तिशाली एवं भयंकर आक्रमणकारियों को परास्त कर उसने अपनी योग्यता एवं शक्ति को प्रदर्शित किया।
स्वंदगुप्त की यह विजय अत्यंत महत्वपूर्ण थी क्योंकि इस विजय से पुष्यमित्रों ने उत्पात, भय और आतंक की जो स्थिति उत्पन्न कर दी थी वह समाप्त हो गई और उनके विचलित कर देने वाले प्रहारों से गुप्तवंश विलुप्त होने से बच गया।
कुमारगुप्त के साम्राज्य पर आक्रमण करने वाले ये पुष्यमित्र कौन थे? इस विषय में विद्वानों में मतभेद है। ऐसा प्रतीत होता है कि कुमारगुप्त के शासनकाल में किसी विदेशी शक्ति ने ही गुप्त साम्राज्य पर आक्रमण किया था जिन्हें पुष्यमित्र कहा गया है।
दक्षिणी अभियान
कुछ इतिहासकारों का विचार है कि कुमारगुप्त ने भी समुद्रगुप्त के समान दक्षिण भारत का अभियान किया था।
अपने मत के समर्थन में ये विद्वान सतारा जिले से प्राप्त 1395 मुद्राओं व एलिचपुर से प्राप्त 13 मुद्राओं का सहारा लेते हैं। इसके अतिरिक्त उसकी कुछ मुद्राओं पर व्याघ्र-बल-पराक्रम' लिखा है जिससे उपरोक्त विद्वान यह अनुमान करते हैं कि कुमारगुप्त ने नर्मदा नदी को पार कर व्याघ्र-युक्त अरण्य- क्षेत्र पर अधिकार करने का प्रयास किया था, किंतु इन स्रोतों के आधार पर किसी निश्चित निष्कर्ष पर पहुँचना कठिन है क्योकि संभव है कि सतारा व एलिचपुर से प्राप्त मुद्राएँ व्यापारिक संबंधों के कारण वहाँ पहुँची हों। इसके अतिरिक्त यदि कुमारगुप्त ने दक्षिण अभियान किया भी था तो उसको विजय प्राप्त हुई अथवा नहीं, इस विषय में कोई प्रमाण नहीं मिलता।
अश्वमेघ यज्ञ
ormal; vertical-align: baseline; white-space: pre-wrap;">कुमारगुप्त ने अश्वमेघ यज्ञ का आयोजन किया था। उसके इस यज्ञ के विषय में उसके किसी अभिलेख में वर्णन नहीं मिलता, किंतु उसकी मुद्राओं से इसकी पुष्टि होती है। उसकी 'अश्वमेध प्रकार की मुद्राओं के मुख भाग पर सुसज्जित यज्ञ का अश्व व सम्राट का नाम उत्कीर्ण किया गया है। दूसरी ओर कुमारगुप्त की उपाधि 'अश्वमेधमहेंद्र' लिखी हुई है। यह अश्वमेध यज्ञ किस विजय के उपलक्ष्य में किया गया था, यह स्पष्ट नहीं है।
साम्राज्य विस्तार
कुमारगुप्त को पैतृक संपत्ति के रूप में अपने पिता का विस्तृत साम्राज्य मिला था। कुमारगुप्त एक प्रतापी शासक व महान योद्धा नहीं था, अतः वह पैतृक रूप में प्राप्त साम्राज्य का विस्तार न कर सका,
किंतु फिर भी वह अपने विशाल साम्राज्य को अक्षुण रखने में सफल रहा। कुमारगुप्त के शासनकाल के अंतिम चरण में यद्यपि गुप्त-साम्राज्य पर पुष्यमित्रों ने आक्रमण किया किंतु कुमारगुप्त ने अपने साम्राज्य को विघटित न होने दिया। करमदण्डा अभिलेख में कुमारगुप्त के राज्य विस्तार का वर्णन करते हुए कहा गया है, “कुमारगुप्त एक विशाल साम्राज्य पर शासन करता था जो उत्तर में सुमेरू व कैलाश पर्वतों से दक्षिण में विंध्य वनों तक तथा पूर्व व पश्चिम में सागरों के बीच में फैला हुआ था। इनके बीच में उसका राज्य मेखला की भाँति झूम रहा था।'' मन्दसौर अभिलेख के अनुसार कुमारगुप्त संपूर्ण पृथ्वी का शासक था जो चारों ओर समुद्र से घिरी हुई थी। कुमारगुप्त की मुद्राओं का भी भारत के विभिन्न भागों से प्राप्त होना उसके विशाल साम्राज्य का द्योतक है। इस प्रकार कुमारगुप्त का साम्राज्य उत्तर में हिमालय से दक्षिण में नर्मदा नदी तक, व पूर्व में बंगाल से पश्चिम में सौराष्ट्र तक विस्तृत था।
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