गुप्त काल में कला एवं स्थापत्य - Art and Architecture

गुप्त काल में कला एवं स्थापत्य - Art and Architecture


गुप्त एवं गुप्तोत्तर काल में सर्वाधिक उन्नति कला एवं स्थापत्य के क्षेत्र में दृष्टिगोचर होती है। विभिन्न विद्वानों ने गुप्तकाल को कला एवं स्थापत्य के चरमोत्कर्ष का काल कहा है। कुमारस्वामी के अनुसार, गुप्तकालीन कला एक पूर्ण स्वाभाविक क्रमिक कलात्मक विकास की पराकाष्ठा का प्रतीक । कुषाणकालीन कला में जो विदेशी प्रभाव देखा गया था, गुप्तकाल तक आते-आते अब कला पर से वह प्रभाव क्रमशः समाप्त हो गया। गुप्तकालीन कला की सर्वप्रमुख विशेषता मूर्ति-कला थी।


मूर्तिकला


गुप्तकालीन मूर्तिकारों ने कुषाणकालीन नग्नता एवं पूर्व मध्यकालीन प्रतीकात्मक सूक्ष्मता के बीच समन्वय स्थापित करने का प्रयास किया है।

इसीलिए गुप्तकालीन मूर्तियों में गंभीरता शांति, भद्रता, शालीनता एवं आध्यात्मिकता स्पष्टतः दृष्टिगोचर होती है। गुप्तकाल में मूर्तिकला की तीन प्रमुख शैलियों का आविर्भाव हुआ-


(1) मथुरा मूर्तिकला शैली |


(2) वाराणसी मूर्ति कला शैली या सारनाथ शैली ।


(3) पाटलिपुत्र कला शैली।


(1) मथुरा शैली - मथुरा शैली में करीं के बुंदकीदार लाल पत्थरों का उपयोग हुआ है।

यहाँ विविध रूपों में बुद्ध और बोधिसत्वों की प्रतिमाओं में यूनानी बौद्ध कला के विदेशी तत्व मिलते हैं। कहा जाता है कि यहाँ वेदिका स्तंभों पर बनी युवतियाँ स्वर्ग की अप्सराओं का भूतल पर प्रतिनिधित्व करती हैं। वात्स्यायन के नागरिक की दैनिक क्रियाओं का क्रियात्मक रूप वेदिका स्तंभ के चित्रों से प्राप्त होता है। मथुरा शैली को विद्वानों ने वात्स्यायन के 'कामसूत्र' का व्यावहारिक रूप भी कहा है। कुषाण काल से गुप्तकाल तक की प्रतिमाएँ यहाँ मिलती हैं।


मथुरा की गुप्त कालीन बुद्ध मूर्तियों में दो विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। दोनों खड़ी मुद्रा में है जिनकी ऊँचाई 7 फुट 2 इंच के लगभग हैं। ये निम्नलिखित हैं-


(i) प्रथम मूर्ति जो मथुरा के जमालपुर से मिली थी, जिसमें बुद्ध के कंधों पर संघाटी है, उनके बाल घुँघराले हैं, कान लंबे हैं तथा दृष्टि नासिका के अग्र भाग पर टिकी हुई है। उनके सिर के पीछे गोल एवं अलंकृत प्रभामंडल है।


(ii) दूसरी बुद्ध की पाषाण मूर्ति भी मथुरा से मिली है। इसमें महात्मा बुद्ध ध्यानमग्न खड़ी मुद्रा में हैं। तथा उनके हाथ अभयमुद्रा में हैं।


(2) वाराणसी या सारनाथ शैली- वाराणसी की मूर्ति-कला शैली अधिक विशुद्ध है। यहाँ भी फलकों पर अंकित बुद्ध के जीवन की घटनाओं के विषय में गांधार शैली का प्रयोग दिखाई पड़ता है।

सारनाथ में प्राप्त बुद्ध की मूर्ति अत्यंत आकर्षक है। इसमें महात्मा बुद्ध पद्मासन लगाए बैठे हैं। इस मूर्ति में भी बुद्ध के चेहरे के चारों ओर प्रभा मंडल दिखाया गया है। बाल घुंघराले तथा कान लंबे हैं। दृष्टि नासिका के अग्रभाग पर टिकी है। दोनों हाथ धर्मचक्र प्रवर्तन की मुद्रा में हैं। इसकी आध्यात्मिक अभिव्यक्ति, गंभीर मुस्कान एवं शांत ध्यानमग्न मुद्रा भारतीय कला की सर्वोच्च सफलता का प्रदर्शन करती है। यह मूर्ति लगभग 2 फुट 2 इंच ऊँची है। सारनाथ शैली में चुनार के सफेद पत्थर का प्रयोग हुआ है।


(3) पाटलिपुत्र शैली- पाटलिपुत्र की शैली ने धातुओं की प्रतिमाओं के निर्माण में विशेषता प्राप्त की। नालंदा और कुकिहार इसके प्रधान केंद्र थे। इसमें पत्थर के अतिरिक्त धातु का भी प्रयोग हुआ है।


इस शैली में निर्मित बिहार के भागलपुर जिले में स्थित सुल्तानगंज की बुद्ध प्रतिमा विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। यह ताँबे की 7 फुट (23 मीटर) ऊँची मूर्ति खड़ी मुद्रा में है। बुद्ध के बायें हाथ में संघाटी है तथा उनका दायाँ हाथ अभय मुद्रा में है। संघाटी का घेरा पैरों तक लटक रहा है। इसमें सिर के पीछे प्रभामंडल नहीं है, जो इस शैली के विदेशी प्रभाव से मुक्त होने का संकेत है। चेहरे पर असीम करुणा और आध्यात्मिक शांति है। वर्तमान में यह मूर्ति बरमिंघम के अजायबघर में सुरक्षित है। इस प्रकार पाटलिपुत्र तक पहुँचते-पहुँचते मूर्ति-कला का शुद्ध भारतीयकरण हो गया। गुप्तकालीन मूर्ति-कला अपनी कला, भाव-व्यंजना और शारीरिक गठन में शुद्ध भारतीय हो गई। गुप्तकालीन मूर्तिकला की हमें निम्न प्रमुख विशेषताएँ परिलक्षित होती हैं-


(1) अलंकृत प्रभामंडल


(2) सिर के घुँघराले बाल,


(3) झीने अथवा पारदर्शक वख,


(4) चेहरे पर शांति, दया, करुणा, भव्यता और मुख्यता आध्यात्मवाद की स्पष्ट झलक, (5) नग्न मूर्तियों का स्पष्ट अभाव।


गुप्त शासक वैष्णव मत के अनुयायी थे, अतः इस काल में विष्णु की मूर्तियाँ भी अत्यधिक बनीं। इस काल की विष्णु की मूर्तियाँ चतुर्भुजी हैं।

उनके सिर पर मुकुट गले में हार तथा केयूर एवं कानों में कुंडल दिखाया गया है। देवगढ़ (झाँसी उ. प्र.) के दशावतार मंदिर में प्राप्त मूर्ति में विष्णु को शेषशैय्या पर विश्राम करते दिखाया गया है। इसे अनंतशायी कहा गया है। एरण (सागर म.प्र.) में विष्णु की खड़ी विशाल प्रतिमा है। विष्णु के शरीर पर विविध अलंकरण हैं। उदयगिरि में एक विशाल वाराह प्रतिमा प्राप्त हुई है। इसमें वाराह पृथ्वी को दोनों हाथों में उठाए दिखाया गया है। यह प्रतिमा विष्णु के कल्याणकारी स्वरूप को दर्शाती है, जिसमें उन्होंने पृथ्वी की रक्षा हेतु वराह का रूप धारण किया था।


विष्णु के अतिरिक्त इस काल में शिव की भी मूर्तियाँ निर्मित हुई थीं। करमदंडा, भूमरा तथा खोह के मंदिरों में एकमुखी शिवलिंग स्थापित हैं।

इन मूर्तियों को मुखलिंग भी कहा गया है। इनकी विशेषता शिव के सिर पर जटाजूट, गले में रुद्राक्ष की माला तथा कानों में कुंडल हैं। शिव ध्यान की अवस्था में हैं, नेत्र आधे खुले हैं तथा होठों पर मंद मुस्कान है। ऊपर जटाजूट में अर्द्धचंद्र विराजमान हैं।


इस प्रकार गुप्तकाल में बुद्ध विष्णु एवं शिव सभी की कलात्मक मूर्तियाँ निर्मित की गई थीं जो कि कला की दृष्टि से बेजोड़ हैं।


चित्रकला- चित्रकला का सही मायनों में विकसित रूप गुप्तकाल में ही दृष्टिगोचर होता है। महाराष्ट्र प्रांत के औरंगाबाद जिले में स्थित अजंता तथा मध्यप्रदेश के ग्वालियर के पस बाघ की गुफाओं में गुप्तकालीन चित्रकला का विकसित रूप देखा जा सकता है।


अजंता में फ्रेस्को तथा टेंपरा दोनों ही विधियों से चित्र बनाए जाते हैं। फ्रेस्को के तहत गीले प्लास्टर पर चित्र बनाए जाते थे तथा चित्रकारी विशुद्ध रंगों द्वारा ही की जाती थी। टेंपरा विधि में सूखे प्लास्टर पर चित्र बनाए जाते थे तथा रंग के साथ अडे की सफेदी तथा चूना मिलाया जाता था। शंख चूर्ण सिता मिश्री, शिला चूर्ण, सफेद मिट्टी, गोबर, चोकर आदि को फेंटकर गाढ़ा लेप तैयार किया जाता था। चित्र बनाने के पूर्व दीवार को रगड़कर उस पर यह लेप लगाया जाता था। लाल, नीला, पीला, काला तथा सफेद रंगों का ही प्रयोग देखने को मिलता है।


बुद्ध के जीवन की विविध घटनाओं तथा जातक कथाओं के चित्र मुख्यतः अजंता की चित्रकारी में मिलते हैं।

अजंता गुफाओं में सर्वाधिक सुंदर एवं आकर्षक चित्र मरणासन्न राजकुमारी का चित्र है जो गुफा संख्या 16 में निर्मित है। कई विदेशी विद्वानों, यथा- फर्गुसन आदि ने उसकी प्रशंसा की है। यह पति वियोग में मरणासन्न राजकुमारी का चित्र है, जिसके चारों ओर शोकाकुल परिवार के लोग खड़े हैं। इसी गुफा में बुद्ध के महाभिनिष्क्रमण का भी चित्रांकन है।। 7वीं गुफा में माता एवं शिशु का चित्र काफी आकर्षक है। इस गुफा के अन्य चित्र जातक कथाओं से संबंधित हैं।


प्रथम एवं दूसरी गुफाओं के चित्रों में सर्वाधिक आकर्षक चित्र पुलकेशिन द्वितीय के दरबार में आए फारसी राजदूत का है। बोधिसत्व पद्मपाणि अवलोकितेश्वर का चित्र प्रथम गुफा में निर्मित है।

इस प्रकार अजंता की चित्रकारी लगभग प्रत्येक चित्र में अपनी उत्कृष्टता स्वतः प्रमाणित कर रही है।


ग्वालियर के निकट बाघ की गुफाएँ विंध्याचल पर्वत को काटकर बनाई गई हैं। कुल 9 गुफाओं में चौथी पाँचवीं गुफाओं के ही चित्र सुरक्षित हैं। धर्म विशेष से संबंधित न होकर तत्युगीन जनजीवन की झाँकी को इन गुफाओं में चित्रित किया गया है। एक चित्र में स्त्रियाँ एवं पुरुष अलंकृत वेशभूषा और बाजों के साथ स्वछंदतापूर्वक नृत्यरत दिखाए गए हैं। मार्शल महोदय ने इन चित्रों को जनजीवन की सजीव झाँकी कहा है। ये गुफाएँ पाँचवी - छठी शताब्दी की हैं।


वास्तुकला स्थापत्य गुप्तकालीन स्थापत्य का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण तत्युगीन मंदिर हैं। इस युग में मंदिर मुख्यतः ऊँचे चबूतरे पर बनते थे जिसके चारों ओर सीढ़ियाँ होती थीं।

शिखर बनाए जाते थे। गर्भगृह, जिसमें मूर्ति रखी जाती थी, चौकोर, वर्गाकार होते थे। इसमें एक ओर प्रवेश द्वार व तीन तरफ दीवारें होती थी। प्रदक्षिणा मार्ग होता था। दीवारों पर मूर्तियाँ तथा अलंकरण होते थे। प्रवेश द्वार की चौखट पर मकरवाहिनी गंगा एवं कुर्मवाहिनी यमुना की आकृतियाँ उत्कीर्ण मिलती थीं जो गुप्तकाल की एक अपनी विशेषता थी। इसके अतिरिक्त स्वस्तिक, हंस-मिथुन, मंगल कलश, श्रीवृक्ष, शंख, पद्म आदि प्रतीकों का अंकन भी देखने को मिलता है। पहले गर्भगृह के सामने एक स्तंभयुक्त मंडप बनाया जाता था, कालांतर में उसे चारों ओर बनाया जाने लगा। गुप्तकाल के कुछ प्रमुख मंदिर निम्नलिखित हैं-


1. एरण का विष्णु मंदिर यह मध्य प्रदेश के सागर जिले में स्थित है। यहाँ विष्णु की खड़ी प्रतिमा स्थित है।

गर्भगृह का द्वार तथा उसके सामने खड़े दो स्तंभों को छोड़कर बाकी सब ध्वस्त हो चुका है।


2. साँची का मंदिर मध्य प्रदेश के विदिशा जिले में स्थित है।


3. तिगवा का विष्णु मंदिर जबलपुर मध्य प्रदेश में स्थित है।


4. नचना कुठार का पार्वती मंदिर- मध्य प्रदेश के पन्ना जिले में अजयगढ़ के पास स्थित है।


15. भूमरा का शिव मंदिर मध्य प्रदेश के सतना जिले में स्थित है। 16. देवगढ़ का दशावतार मंदिर- उत्तर प्रदेश के ललितपुर जिले में स्थित है।


7. भीतर गाँव का मंदिर- उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले में स्थित है। 8. सिरपुर का लक्ष्मण मंदिर छत्तीसगढ़ के रायपुर जिले में स्थित है।


9. मरखान का मंदिर- बीजापुर के एहोल स्थान पर स्थित है। ये सभी गुप्तकालीन मंदिर तत्युगीन स्थापत्य कला के विकास को इंगित करते हैं।


स्तूप तथा गुहा स्थापत्य सारनाथ का धमेख स्तूप एवं राजगृह स्थित जरासंध की बैठक गुप्तकालीन स्थापत्य के उत्कृष्ट उदाहरण हैं। सारनाथ का धमेख स्तूप जो 128 फुट ऊँचा है, प्रस्तर के टुकड़ों को तोड़कर बनाया गया है। यह स्तूप अपनी कल्पना, आकार और अलंकार में बेजोड़ है। गुप्तकाल में अनेक गुफाएँ पर्वतों को काटकर निर्मित हुई। भिलसा के निकट उदयगिरि की


गुफाएँ औरंगाबाद स्थित अजंता की गुफाएँ एवं ग्वालियर के निकट बाघ की गुफाएँ तत्युगीन स्थापत्य कला के विकास को दर्शाती हैं।