भक्त कवियित्रियाँ - Bhakta Poetesses
भक्त कवियित्रियाँ - Bhakta Poetesses
मध्यकाल में महिलाओं की स्थितियों के मूल्यांकन के लिए भक्ति आंदोलन और भक्त कवियित्रियों का जीवन हमारे समक्ष कई स्थितियों को रखता है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल हिंदी साहित्य के इतिहास में भक्ति काल को मुगलों के भारत में आगमन और उनके जुल्मों से उपजी निराशा के कारण एक आसरे की तलाश के रूप में देखते हैं, वहीं रामविलास शर्मा ने इस काल को समाज में फैली कूप मंडूकता, जाति व्यवस्था, सामंती मूल्यों के माध्यम से लोगों के शोषण करने वाली मान्यताओं के विरुद्ध प्रतिकार के आंदोलन के रूप में देखा। भक्ति आंदोलन को पित्रसत्तात्मक व्यवस्था के विरोध के काल के रूप में भी स्त्रीवादियों द्वारा देखा गया। भक्त कवियित्रियों ने अपनी रचनाओं में कई स्तरों पर पितृसत्तात्मक का मुखर विरोध किया। तमिलनाडु की आंडाल, कर्नाटक की अक्कमहादेवी, कश्मीर की ललद्यद, राजस्थान की मीरा और महाराष्ट्र की मुक्ता बाई, जना बाई, बहिना बाई का नाम इस संदर्भ में काफी महत्वपूर्ण है। इन सभी के जीवन की कथा काफी संघर्षपूर्ण रही है। ईश्वर के साथ प्रेम प्रकट करने के माध्यम से जहाँ इन्होंने अपने सार्वजनिक जीवन का विस्तार किया, वहीं स्त्री पुरुष प्रेम संबंधों को भी पुनर्व्याख्यायित किया, जो समतामूलक संबंधों पर आधारित थे। पर इनके लिए इन संबंधों की व्याख्या करना इतना आसान भी नहीं रहा। परिवार से लेकर समाज तक लगातार ये विभिन्न प्रकार की हिंसाओं का सामना करती रहीं। रामविलास शर्मा अपने आलेख भक्ति का अखिल भारतीय प्रसार में आंडाल, अक्कामहादेवी, मीरा और ललद्यद के जीवन और रचनाओं पर विस्तार से प्रकाश डालते हैं।
कश्मीर की ललद्यद लगातार अपनी सास की प्रताड़ना सहती रहीं। ललद्यद के बारे में कहा जाता है कि वे अपनी जान बचाने के लिए एक धधकते तंबू में छुप गई पर उनका बाल भी बांका नहीं हुआ। उनके परिवार ने उन पर कई प्रकार के बंधन लगाने का प्रयास किया। बंधनों के विरोध में उन्होंने अपने वस्त्र त्याग दिए लोगों को लगा कि वे पागल हो चुकी हैं। लेकिन वे अपने विचारों को कविताओं में पिरोती रहीं, जिन्हें "वाख' भी कहा जाता है। अक्का महादेवी एक बहुत ही सुंदर महिला थीं। कौशिक नरेश उन्हें बहुत चाहते थे और उनसे विवाह करना चाहते थे। पर वे अपने इष्ट चेन्निमल्लिकार्जुन के प्रति समर्पित थीं और विवाह की इच्छुक नहीं थीं । काफी दबाव में उन्होंने विवाह के लिए हामी तो भर दी, पर राजा से शारीरिक संपर्क की मनाही कर दी। एक बार राजा ने उनके साथ जबरदस्ती करने का प्रयास किया तो उन्होंने अपने वस्त्र त्याग दिए । उनका मानना था कि अगर वे अपने घर में ही सुरक्षित नहीं हैं, तो वस्त्रों की भी क्या आवश्यकता। वे जंगलों में भटकती रहीं और लगातार अपने रचनाओं को भी लिखती रहीं। दोनों ने ही वस्त्र त्याग को एक प्रतिरोध का जरिया बनाया। मीरा का जीवन भी पितृसत्ता के विरोध का बड़ा प्रतीक रहा है। उनका विवाह राजा भोज से एक राजनैतिक संधि के रूप में किया गया, लेकिन वे कृष्ण को बचपन से ही अपना पति मान चुकी थीं और किसी भी रूप में वे किसी और के साथ अपना जीवन यापन नहीं करना चाहतीं थीं। विवाह के पश्चात् उन्होंने अपनी भावनाओं से ससुरालीजनों को अवगत कराया, जिससे वे सभी काफी नाराज हुए। परिवार ने उन्हें कुलनाशिनी कहा। राजा की मृत्यु के बाद उन्होंने सती होने से इनकार कर दिया.. उनका मानना था कि जब वे कृष्ण को अपने पति रूप में मान चुकी हैं, तो किसी और पुरुष की मृत्यु पर वे सती क्यों हों? मीरा ने रैदास को अपना गुरु माना और राजमहल से निकलकर अलग-अलग जगहों पर संतों की स्थली के साथ भ्रमण करने लगीं। वे अपने पदों को गाती थीं. नाचती थीं। वे अपने पदों में परिवार द्वारा होने वाले अत्याचारों और निरीह लोगों पर होने वाले सामंती अत्याचारों को अपने पदों में शामिल करतीं। मीरा को पूजने वालों में एक बड़ा वंचित तबका था, जिसे अपने कष्टों की अभिव्यक्ति मीरा के पदों में मिलती। यह राजपूत परिवारों को बहुत अपमानजनक लगता था। मीरा को रोकने के लिए जहरीला नाग उन्हें इसने भेजा। मीरा को विषपान करने के लिए विवश किया गया। पर मीरा का बाल भी बांका नहीं हुआ। मीरा ने घर त्याग दिया। बाद में मीरा को घर वापस बुलाने के लिए ब्राह्मण वृन्दावन भेजे गए उन्होंने मीरा को ले जाने के लिए अनशन प्रारंभ कर दिया। मीरा ब्रह्म हत्या का पाप नहीं लेना चाहती थीं। अतः वापस जाने के लिए हामी भर दी। आखिरी विदाई देने कृष्ण मंदिर गई ।
कहा जाता है कि वहीं वे कृष्ण की प्रतिमा में समा गईं। कुछ ऐसा ही अंत आंडाल का भी हुआ था । उनके लिए भी कहा जाता है कि वे भी विष्णु की प्रतिमा में लोप हो गई (शर्मा, 2006)। जना बाई, मुक्ताबाई के घर काम करती थीं। कृष्ण की भक्ति उन्होंने सखा भाव के साथ की। कृष्ण में एक ऐसे साथी को ढूँढा, जो उनके हर सुख-दुःख में साथ है और रोजमर्रा के कामों में उनका हाथ भी बंटा रहा है। कृष्ण उनके साथ बर्तन भी साफ करते हैं और जुएँ भी निकाल देते हैं (Tharu & Lalita, 1991) । इस तरह से हम भक्त कवियित्रिओं की इच्छाओं को भी देख सकते हैं, वे किस तरह के संबंध अपने आस-पास के लोगों से चाहती हैं और किसी भी तरह के दबाव और जबरदस्ती अपने ऊपर सहने के लिए तैयार नहीं हैं। भक्ति काल ऐसा काल रहा है, जिसमें हाशिए के लोगों ने सबसे मुखर आवाज सामाजिक बदलाव को लेकर उठायी है। सारी रचनाएँ उन्होंने अपनी मातृ भाषा में की तथा ईश्वर को किसी अलौकिक सत्ता के रूप में न देख कर अपने सखा, मित्र, प्रेमी के रूप में देखा। उन्हें आसमान से उताकर अपने पास बिठा लिया। सामंतवाद, जातिवाद और पितृसत्तात्मक प्रवृत्तियों के लिए यह बड़ा प्रतिरोध है। इस काल का यह भी एक सत्य रहा है कि यह प्रतिरोध पित्रसत्तात्मक मान्यताओं के भीतर ही किया गया है। भक्त कवियित्रियों की रचनाओं में कई प्रतीक जैसे सुहागन, सती, लज्जा, पतिव्रता आदि का भी प्रयोग किया गया है।
वे स्वयं को एक पतिव्रता स्त्री के ही खांचे में रखकर सारी पारंपरिक भूमिकाओं को अपने आराध्य देवता के लिए अपनाना चाहती हैं। इस तरह वे कई बार पितृसत्ता का विरोध करते हुए भी उसके मजबूत करने का भी काम करती हैं। यह हम उनकी सीमा मान सकते हैं। पर फिर भी अपने निर्णय लेना और तमाम दबावों के बाद भी उन पर अडिग रहना, अपने ऊपर होने वाले अत्याचारों का विरोध करना और स्त्री पुरुष के बीच प्रेम में एक बराबरी के संबंधों के निर्माण की वे बड़ी वकालत करती हैं।
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