भक्ति आंदोलन में खियाँ - Bhakti Movement
भक्ति आंदोलन में खियाँ - Bhakti Movement
भक्ति आंदोलन में दो वर्गों को सबसे महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। इनमें एक है दलित तथा कामगार वर्ग तथा दूसरा है - स्त्री इस्लाम / मुसलमानों के भारत में आने का एक बड़ा परिणाम यह था कि यहाँ शिल्पकारों की माँग बढ़ी। ऐसी स्थिति में कामगारों शिल्कारों/श्रम-शक्ति के रूप में खियों की माँग भी बढ़ी। इस संबंध में डॉ सुनीता गुप्ता ने इरफान हबीब के हवाले से लिखा है, “मुसलमानों के आगमन के साथ आर्थिक स्थितियाँ भी बदलती हैं और शिल्पकारों की माँग बढती है। इन शिल्पकारों के जीवन में आर्थिक समृद्धि भी आई थी। गैर-सवर्ण समाज में स्त्री सदैव एक उपयोगी श्रम-शक्ति के रूप में रही है।
नवीन परिस्थितियों में इस स्त्री-श्रम की माँग बढ़ी और इनकी आर्थिक दशा में सुधार भी हुआ। निश्चय ही इन नवीन परिस्थितियों ने उन्हें आत्मविश्वास से दीप्त किया।" जीवन में व्यावहारिक तौर पर भौतिक आधार उपलब्ध होने पर इन स्त्रियों की प्रतिभा का विस्फोट सामने आया। स्त्रियों के साथ दलितों में भी यहीं स्थिति देखी गई। डॉ. सुनीता गुप्ता लिखती हैं, “इन परिस्थितियों के आलोक में देखा जा सकता है। कि मध्यकालीन भक्ति आंदोलन में फूट पड़ने वाला दलित स्त्री का स्वर अनायास नहीं है। स्त्रियाँ जब इस प्रकार सक्रिय होती हैं तो अपने मानवीय अधिकारों तथा समानता की माँग स्वतः उभरकर सामने आती है। पितृसत्ता को चुनौती लगभग ऐसी ही स्थितियों में दी जाती है। इस संबंध में सुसी थारु का यह अभिमत ध्यान दिए जाने योग्य है,
“भक्ति आंदोलन में स्त्रियों की भागीदारी देखकर यह अनुमान करने को जी चाहता है कि इसके द्वारा पितृसत्ता पर सवाल उठाए गए और सामान्य स्त्रियों की ज़िंदगी बदल गई। ऐसा संभव है कि इन वर्गों की नवीन आर्थिक समृद्धि ने इनमें गरिमा और आत्मविश्वास की ताकत दी। "
भक्ति आंदोलन में अखिल भारतीय स्तर पर काव्य-सृजन में स्त्रियों की भागीदारी रही। उत्तर से लेकर दक्षिण तक सर्वत्र स्त्री कवयित्रियों की उपस्थिति ध्यान आकृष्ट करती है।
यहाँ प्रायः हर वर्ग की स्त्रियाँ देखी जा सकती हैं। यह एक उल्लेखनीय तथ्य है कि आधुनिक भारतीय भाषाओं की प्रारंभिक रचनाकार स्त्रियाँ ही रही हैं, जैसे- मराठी में महदंबा, तेलुगु में मोल्ल, कश्मीर में लल्लद्यद, कन्नड़ में अक्क महादेवी, बांग्ला में माधवीदास आदि। इनके अतिरिक्त तमिल की आंडाल, कन्नड़ की कटेक्काल अम्मैयार, मराठी की मुक्ताबाई, महदायिसा और जनाबाई, तेलुगु की आतूकूरी मोल्ला, कन्नड़ की हेलवनकट्टे गिरियम्मा, बांगला की चन्द्रावती रामी आदि स्त्री-रचनाकारों ने भारतीय भाषाओं की इस काव्य-परंपरा को आगे बढ़ाया।
इन स्त्रियों के विषय में कुछ रोचक तथ्य ध्यान देने योग्य हैं। जैसे यह कि ये स्त्रियाँ अधिकांशतः सामान्य वित्त वर्गों से जुड़ी हुई थीं। ये निर्धन वर्गों से आती थीं।
ये या तो अविवाहित थीं या विवाहित थीं तो भी विवाह के घेरे को तोड़कर उससे बाहर आ गई थीं। इन स्त्रियों की रचनाओं में स्त्री होने की पीड़ा शिद्दत से महसूस की जा सकती है। इनमें प्रतिरोध का स्वर अत्यंत प्रबल है। डॉ सुनीता गुप्ता के शब्दों में, "इसमें अधिकतर स्त्रियाँ वे हैं, जो या तो आजीवन अविवाहित रहीं, या विवाह करने के बाद उसके घेरे को तोड़कर बाहर आई। स्त्री होने की पीड़ा को इन्होंने किसी-न-किसी स्तर पर अवश्य महसूस किया, चाहे वे सवर्ण वर्ग की ही क्यों न हों। यह भी ध्यान देने योग्य है कि इनमें बड़ी संख्या उन स्त्रियों की है, जो सामान्य वर्ग अथवा निर्धन परिवार से आती हैं। सबसे बड़ी बात कि इन खियों का स्वर न केवल आत्मविश्वास से परिपूर्ण है, बल्कि भक्ति काल में ये स्त्रियाँ ही हैं, जिनकी रचनाओं में सामाजिक पक्ष अधिक स्पष्ट है।
अन्याय के प्रति प्रतिरोध का स्वर तथा स्त्रीजनोचित मर्यादा का डंके की चोट पर उल्लंघन ये इनकी कविताओं को समाजशास्त्रीय दृष्टि से अत्यंत मूल्यवान बना देते हैं।"
भक्तिकाल का सूत्रवाक्य था समानता। यह समानता प्रायः सभी क्षेत्रों में थी। स्त्री के लिए यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण अवसर था। सामाजिक एवं जातिगत समानता के साथ-साथ लैंगिक समानता की बात भी महत्व के साथ उठी। भक्ति के आवरण में स्त्री-पुरुष समानता की अवधारणा सामने आई, जिसका भरपूर लाभ स्त्रियों ने उठाया। इस आंदोलन का सबसे अधिक लाभ समाज के दलित, उपेक्षित तबकों को मिला,
जिनमें पुरुषों के साथ-साथ इन वर्गों की खियाँ भी थीं। अनेक उच्च वर्ग की स्त्रियों ने भी इस आंदोलन से समानता का पाठ सीखा। शहनाज बानो ने यह ठीक लिखा, “भक्ति आंदोलन ने जहाँ सभी वर्णों की समानता का नारा दिया, वहाँ भक्ति और आध्यात्मिकता की आड़ में स्त्री को भी अपनी आवाज सुनाने का अवसर एक सीमा तक मिला। स्त्रियों को भी भक्ति आंदोलन ने अपनी आवाज को बुलंद करने का अवसर दिया।” शहनाज बानो ने अपने शोध में ऐसी अनेकानेक गुमनाम कवयित्रियों के नाम उल्लिखित किए हैं,
जिनका उल्लेख बहुधा भक्तिकाल संबंधी ग्रंथों में नहीं मिलता। उनका यह विवरण इस प्रकार है- "बड़ी संख्या में स्त्री कवयित्रियाँ हुई सीता सहचरी, झाली, सुमति, शोभा, भटियानी, गंगा, गौरी, उबीठा, गोपाली, गनेशदेई, मानमती, सत्यभामा, यमुना, कोली, रमा, मृगा, जुगजेवा, कीकी, कमला, देवकी, हीरा, हरिचेरी, इत्यादि। इसके अलावा अलबेली अलि, इन्द्रमती, उमा, कविरानी चौबे, कृष्णावती, केशव पुत्रवधू, मुक्ताबाई, पार्वती, सहजोबाई, दयाबाई, गंगाबाई, रानी सोन कुंवरि, वृषभानु, कुंवरि, रसिक बिहारी बनी ठनी, रानी बांकावती, ताज बीबी, रत्न कुंवरि, मधुर अली, प्रताप कुंवर बाई, प्रवीणपातुर, रूपवती बेगम, तीन तरंग इत्यादि प्रमुख हैं। इसके अतिरिक्त ऐसी स्त्रियाँ भी आंदोलन में सामने आई, जो समाज की दृष्टि स्व पतित थीं।"
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