गुप्तोत्तरकाल (दक्षिण भारत) : आर्थिक गतिविधियों में पतन के कारण

गुप्तोत्तरकाल (दक्षिण भारत) : आर्थिक गतिविधियों में पतन के कारण


6 वीं शताब्दी से 12 वीं शताब्दी के मध्य का काल न केवल दक्षिण भारत में अपितु उत्तर भारत में भी पूर्व स्थापित बड़े राज्यों के विकेंद्रीकरण के लिए उल्लेखनीय है। उपरोक्त काल में राजनीतिक पटल पर निरंतर बनते-बिगड़ते तथा बदलते राज्यों तथा राजाओं की सत्तास्थापना हेतु हो रहे संघर्षों का एक अटूट सिलसिला शताब्दियों तक चलता रहा। इन लड़ाइयों से भारी जन-धन की हानि होती रही। सामंतशाही के उत्तरोत्तर विकास के परिणामस्वरूप दक्षिण भारत में तो साम्राज्य विस्तार की होड़ सी लगी हुई थी। प्रायः शासकों का अधिकांश समय स्कंधावारों में अथवा महत्वपूर्ण दुर्गों में वीराभिषेक कराने में ही नष्ट होता रहा। उनका जो योगदान सामाजिक तथा आर्थिक समुन्नयन के लिए होना चाहिए था,

निश्चयतः नहीं हो सका। एक तरफ तो विभिन्न राज्यों में पारस्परिक प्रतिशोध एवं युद्धों का क्रम जारी था दूसरी ओर सर्वत्र सामंतीकरण की परंपरा तेजी से जड़ पकड़ती जा रही थी। राजाओं में श्रेष्ठता एवं बड़प्पन की स्थापना हेतु भुमिदान की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही थी। फलतः कृषि योग्य जमीन का एक बड़ा हिस्सा इन अनुदानों के कारण करमुक्त होता जा रहा था। दक्कन के राष्ट्रकूट शासकों के दानपत्रों से ज्ञात होता है कि साम्राज्य में चतुर्दिक विस्तृत मंदिरों, पंडितों, पुरोहितों तथा विद्यालयों को जोत का एक बड़ा हिस्सा दान दिया गया था। ऐसी भूमि से लगान की वसूली बहुधा माफ कर दी जाती थी और यदि वसूल भी की जाती थी तो बहुत कमा राष्ट्रकूटों के दानपत्रों में सहस्त्राधिक ग्राम दानों का उल्लेख,

तत्कालीन भारतीय शासकों की दान देने की मानसिकता का परिचायक है। इतना ही नहीं, सामंतों, उपसामंतों, अधिकारियों तथा ग्राममुखियों को भी किया गया। इसका प्रमाण पूर्व मध्ययुगीन बहुसंख्यक ताम्रपत्रों (दान-पत्रों) के उल्लेखों से प्रस्तुत किया जा सकता है। दक्षिण भारत में सैनिकों को भी उनकी सेवाओं के लिए भूमि- प्रदान किए जाने की प्रथा प्रचलित थी। इन भू-दानों के कारण केंद्रीय अर्थव्यवस्था एवं स्थानीय शासकों अथवा अन्य अधिकारियों के बीच न केवल राजनीतिक संतुलन बिगड़ गया था, अपितु भू-राजस्व एवं उससे जुड़ी आर्थिक व्यवस्था भी चरमरा गई थी। अनुदान से प्राप्त नव-भू-स्वामियों को भूमि कर का संग्रह करने तथा उसे स्वेच्छा से केंद्रीय राजकोष में जमा करने की स्वायत्ता प्रदान करने की नवीन व्यवस्था के फलस्वरूप उक्त युग में सामंतीशोषण को पूरी छूट सी मिल गई थी।

फलतः खेतिहर मजदू पर न केवल मनमाने करों का दबाव पड़ रहा था, अपितु आर्थिक समुन्नयन में विशेष महत्वपूर्ण अंग, अधिक उत्पादन के उत्साह, को भी दबाया जा रहा था। सामंतों की प्रशासकीय एवं आर्थिक स्वायत्ता के क्रमिक विकास होने के कारण दक्षिण भारत में स्वतंत्र अस्तित्व रखने वाले अनेक प्रशासनिक- खंडों एवं प्रखंडों का उदय होने लगा। राष्ट्रकूटों के शासनकाल में यह प्रक्रिया गतिशील रही। सामंती एवं उपसामंती सत्ता खंडों एवं प्रखंडों के उदय के फलस्वरूप तत्कालीन आर्थिक इकाइयों का स्वरूप और भी लघुतर होता गया। फलतः शोषणपरक मनोवृत्तियों से युक्त भू अभिजात्य वर्गों का तेजी से विकास हो चुका था।


भू-राजस्व में क्रमशः कमी आने के फलस्वरूप केंद्रीय शासन द्वारा किए जाने वाले सामाजार्थिक विकास कार्य बाधित होने लगे। राम शरण शर्मा का मत है

कि ग्राम या ग्राम समूहों के आर्थिक विकास पर सामंती - स्वायत्ता के फलस्वरूप विकेंद्रीकरण से तो प्रभाव पड़ा ही, साथ ही साथ, उन गाँवों का भी आर्थिक पतन प्रारंभ हो गया जो इस संदर्भ में इन विकेंद्रीकरण में सम्मिलित नहीं थे। यह पतन तत्कालीन व्यापारिक पतन के कारण अधिक संभव हुआ। तत्कालीन भारत में व्यापार-कर्म में आई गिरावट के कई कारण थे। भारत एवं रोम के बीच रेशम एवं मुलायम उत्तम कोटि के कपड़ों का जो व्यापार छठी सदी ई. तक किसी न किसी रूप में चल रहा था, उक्त काल में उसमें बड़ी कमी आ गई थी। छठी सदी के पर्ववर्ती कालों में रोम में भारतीय रेशम एवं रेशमी कपड़े की विशेष माँग एवं खपत थी।

परंतु 7वीं सदी में बाइजेंटाइन (रोम) के निवासियों ने चीन से रेशम के कीड़ों को पालने का ज्ञान तथा रेशम से कपड़े तैयार करने की कला को स्वयं विकसित कर लिया अब वे अपनी आवश्यकता भर के लिए रेशम स्वयं तैयार करने लगे। फलतः उन्होंने भारत से इसका आयात करना बंद कर दिया। इस प्रकार पाश्चात्य विश्व में निर्यात किए जाने वाले रेशम के व्यापार से होने वाली आय अवरूद्ध हो गई। दक्षिण भारत के समुद्रतटीय प्रदेशों एवं वहाँ के बंदरगाहों से दक्षिणी-पूर्वी एशियाई द्वीप समूहों के साथ इस समय भी न्यूनाधिक व्यापारिक संपर्क बना रहा। रामशरण शर्मा की धारणा है कि दक्षिण भारतीय बंदरगाहों से थोड़ा बहुत व्यापारिक संपर्क उपर्युक्त द्वीपों से अवश्य बना हुआ था।

परंतु प्रायद्वीतीय बंदरगाहों में हो रहे व्यापार एवं आर्थिक लाभ का प्रभाव भारत के अन्य अंतर्वर्ती क्षेत्रों पर विशेष नहीं था। फलतः व्यापारिक नगरों एवं गाँव के बीच की आर्थिक कड़ी पर्याप्त शिथिल हो चुकी थी। आर्थिक एवं व्यापारिक शिथिलता की पुष्टि मुद्रा- साक्ष्यों से भी होती है। 7वीं से 10वीं सदी के मध्य सोने के सिक्कों के प्रचलन का अभाव संपूर्ण भारत में देखा जा सकता है। यद्यपि राष्ट्रकूटों ने भारत के लंबे भू-भाग पर लगभग तीन शताब्दियों तक शासन किया तथापि उनके शासनकाल में सोने के सिक्कों का प्रचलन नहीं किया जा सका। इतना ही नहीं, उन्होंने संभवतः सिक्कों की कोई ऐसी शृंखला भी विकसित नहीं की, जिसके भरपूर उपयोग से आंतरिक एवं ब्राह्य-व्यापार तथा विनिमय में तेजी तथा गतिशीलता आती।

इससे आर्थिक प्रगति की संभावनाओं पर दुष्प्रभाव करके अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए विवश हो गए। इतना ही नहीं, छोट-छोटे अनेक राज्यों के उदय के कारण स्थान-स्थान पर जाँच -चैकियों की संख्या भी पहले की तुलना में बढ़ गई। फलतः उन पर कई प्रकार के करों को चुकाना भी व्यापारकर्म में बाधक सिद्ध हुआ। देश में छोटे-छोटे अनेक राज्यों का उदय, उनमें निरंतर तनाव, संघर्ष एवं विद्रोहों के कारण अंतर्राज्यीय व्यापार में अनेक खतरे उत्पन्न हो गए। इस काल के साहित्य तथा हेन्साँग के विवरण से इस बात की सूचना मिलती है कि व्यापारिक कारवाँ को राज्यों में व्याप्त अशांति एवं असुरक्षा के वातावरण में प्रायः डाकू लोग मार्ग में ही लूट लिया करते थे। 'कथासरित्सागर से ज्ञात होता है कि उपर्युक्त युग के व्यापारी लोग चुंगियों पर मनमाने कर वसूल किए जाने के भय से प्रायः जंगली मार्गों से गुजरते थे। इस प्रकार उक्त अधीत काल में व्यापारिक प्रगति अवरूद्ध सी हो गई थी तथा देश में आर्थिक समुन्नयन की गति शिथिल पड़ गई थी।

व्यापार की गति शिथिल पड़ने के कारण शिल्पियों, व्यवसाइयों तथा कारीगरों के उद्योग-धंधों पर इसका गहरा प्रभाव पड़ा। नगरों में औद्योगिक केंद्र, जहाँ कारीगरों की हर समय आवश्यकता रहा करती थी, तैयार माल की बिक्री न हो पाने के कारण धीरे-धीरे बंद होने लगे। वहाँ औद्योगिक उत्पादन के स्थान पर सैनिक स्कंधावार अथवा सामंती शासन केंद्र बना दिए गए। कारीगरों एवं व्यापारियों को स्थानीय खपत के लिए जगह-जगह बँध जाना पड़ा। ग्रामदानों के समय वहाँ के कारीगरों को दानदाता का यह आदेश पालन करना अनिवार्य होता था कि वह अन्यत्र जाकर न बसे। दक्कन तथा द्रविड़ क्षेत्र में अनेक ऐसे दानपत्र मिले हैं, जिनमें दानदाता शासक द्वारा गाँव अथवा मंदिर के आस-पास बसे कारीगरों को आदेश दिए गए हैं कि वे अन्यत्र जाकर न बसें। उक्त प्रदेशों में मंदिरों तथा मठों को भूमि अथवा ग्रामदान के साथ कारीगर भी भेंट किए गए हैं। फलतः उन्हें विवश होकर शासक के आदेश का पालन करना पड़ता ही था। प्रायद्वीपीय पश्चिमी समुद्र तट पर स्थित नगरों में व्यापारियों एवं श्रेणियों को भी

कारीगर प्रदान किए गए थे। कारीगरों की भाँति व्यापारियों को भी संभवतः अंतर्राज्यों एवं विदेशों में व्यापार हेतु जाने पर बहुत कुछ मनाही थी। दक्कन से प्राप्त 7वीं एवं 8वीं शती के कतिपय लेखों में यह आदेश मिलता है कि व्यापारियों को नगर के एक ही बाजार में इकट्ठा न होने दिया जाए। इस पर रामशरण शर्मा का मत है कि इन आदेश पत्रों से तत्कालीन बाजारों में व्यापारिक प्रतियोगिता के हास का संकेत किया है। बाजार में व्यापारिक माल में संभवतः कमी आने लगी थी। व्यापारी अब स्थानीय आवश्यकाताओं की संपूर्ति से अधिक वस्तुओं का आयात-निर्यात अथवा खरीद-बिक्री बंद करने लगे थे। फलतः व्यापारियों में स्थानीयकरण की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही थी।

यह प्रवृत्ति सामंतीकरण की सहज देन मानी जा सकती है। इतना ही नहीं, कतिपय दानपत्रों में तो ग्राम दानों के समय उनमें बसे किसानों को भी दान कर दिया गया था ( धनजनसहित जनता समृद्ध सप्रतिवासीजनसमेत आदि का उल्लेख ) । इस प्रकार सामंतोपसामंतीकरण से गाँवों का शोषण तो बढ़ गया लेकिन उनकी अर्थ व्यवस्था में कोई सुधार नहीं हो सका। आर्थिक विकास लगभग गतिहीन हो गया तथा प्रगति अवरूद्ध हो गई। उनमें स्थानीय संकीर्णता आ गई। अधिक उत्पादन करने का सामाजिक उत्साह तथा वाणिज्य व्यापार-कर्म चरमरा गया। सामंती- मनोवृत्ति के कारण श्रम एवं उत्पादन का शोषण चलता रहा। फलतः उत्साह एवं पूँजी दोनों में कमी होती गई।

उत्पादन से जुड़े लोगों में स्थानीय की भावना ने उन्हें धर्मभीरू तथा कायर बना दिया। इस युग के नवीन सामाजिक आदर्शों से पूरित कलिवज्य में तो ब्राह्मण तक को पर्यटन की छूट नहीं दी गई है। इसका तात्पर्य यह है कि किसी भी वर्ण को देश या विदेश यात्रा पर जाने की स्वतंत्रता नहीं रह गई थी। समुद्रयात्रा पर तो और भी कड़ा प्रतिबंध था। 'औशनस-स्मृति' के अनुसार समुद्रयात्रा करने वाला व्यक्ति न केवल जाति- ते च्युत होता था, अपितु श्राद्ध भोजन में वह आमंत्रण का भी पात्र नहीं रह जाता था। 11 वीं शती के विद्वान अरब पर्यटक अल्बरूनी ने लिखा है कि दक्कन क्षेत्र में ब्राह्मणों का आवास अन्य सामाजिक वर्गों से अलग रखा जाता था। वहाँ हिंदुओं को तुर्कों तथा कर्णाटों के क्षेत्र में जाने की अनुमति नहीं थी। इतना ही नहीं, आलोच्काल के ग्रंथों में देश-धर्म को तो नियत किया ही गया, कालांतर में ग्राम धर्म को भी नियत कर दिया गया। रामशरण शर्मा के अनुसार ऐसा प्रतीत होता है कि पूर्व मध्यकाल में गाँव आत्मनिर्भर आर्थिक एवं प्रशासनिक इकाई के रूप में प्रतिष्ठित हो चुके थे।

पूर्वमध्यकालीन समाज में उत्पादन स्थानीय आवश्यकताओं के लिए ही किया जाता था । विकसित व्यापार के लिए अतिरिक्त उत्पादन की संभवतः आवश्यकता ही नहीं रह गई थी, क्योंकि अतिरिक्त उत्पादन प्रायः सामंतों द्वारा हड़प लिया जाता था। परंतु दक्षिण भारत में अब भी अनेक ऐसे क्षेत्र थे, जहाँ व्यापार विकसित था तथा मानव उपयोग की आवश्यक वस्तुएँ जैसे नमक, अनाज, कपड़ा, लोहा, शक्कर आदि को सामान्यतया अंर्त क्षेत्रीय माँग एवं पूर्ति के हिसाब से एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुँचाया जाता था। शासकों, सामंतों, अधिकारियों आदि की शौक एवं विलास की वस्तुएँ अन्य प्रदेशों से मँगाई जाती थीं। पूर्व-मध्यकाल में प्रायद्वीपीय भारत में अनेक समुन्नत बंदरगाह थे, जिन्हें देश के अंतर्वर्ती प्रदेशों तथा व्यापारिक मार्गों द्वारा जोड़ा गया था।

इसके अतिरिक्त नदियों द्वारा भी व्यापारिक माल बंदरगाहों तक पहुँचाया जाता था। 9वीं एवं 10वीं शती में भारत का व्यापारिक संपर्क अरब चीन, पश्चिमी एशिया, दक्षिण-पूर्वी एशियाई द्वीपों के साथ विकसित था। पल्लवों तथा चोलों के समय तमिल देश की आर्थिक प्रगति में उपर्युक्त विदेशी व्यापार विशेष सहायक सिद्ध हुआ।


ऐतिहासिक तथा आर्थिक गतिविधियों की समीक्षा के आधार पर अंनतः यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि गुप्तोत्तरकालीन भारत में दक्षिण की अपेक्षा उत्तर भारत में आर्थिक प्रगति विशेष अवरूद्ध हुई। इसका प्रमुख कारण सम्राट हर्षवर्धन के उपरांत मध्यप्रदेश में अद्भुत एक दीर्घकालीन राजनीतिक शून्यता को माना जा सकता है। कान्यकुब्ज के राज्य को लेकर पूर्व, पश्चिम तथा दक्षिण की शक्तिशाली पाल,

प्रतिहार तथा राष्ट्रकूट राजवंशों की शक्तियाँ परस्पर संघर्षरत रहीं। शक्तिशाली साम्राज्य-शक्ति के अभाव में सामंती-शोषण तथा उनके द्वारा प्रस्तुत संकीर्ण आदर्शों एवं आदेशों में फँसी जनता 10वीं शती तक दबती, कुढ़ती तथा अधिक उत्पादन से विमुख बनी रही। परंतु दक्षिण भारत में पश्चिमी चालुक्यों तथा राष्ट्रकूटों को छोड़कर अन्य राज्यों की आर्थिक स्थिति सामंती व्यवस्था से शासित होने के बावजूद विशेष अवरूद्ध नहीं हो सकी। पल्लवों एवं चोलों द्वारा बनाए गए बहुसंख्यक मंदिरों तथा अन्य सांस्कृतिक क्रियाकलापों को देखने से यही प्रतीत होता है कि यहाँ विकास की गति शिथिल अवश्य थी, परंतु पतनोन्मुख नहीं थी।