चालुक्य काल - Chalukya period
चालुक्य काल - Chalukya period
सामाजिक व्यवस्था में पारंपरिक वर्ण और जाति का विशेष असर था। ब्राह्मणों का समाज में सर्वाधिक आदर था। किंतु सामाजिक परिवेश में गृहस्थ, आदरणीय थे जो कि इन्हीं के आचरण पर समाज में आचार व्यवस्था और धार्मिक कृति, यथा दान, उत्सव आदि निर्भर करते थे। विभिन्न धर्मों के तीर्थों की चर्चा इस युग में खूब मिलती है। ब्राह्मणधर्म के दो विशेष संप्रदाय वैष्णव और शैव सर्वत्र मान्य थे। जैनियों का भी विशेष आदर था। किंतु बौद्धों का महत्व घट रहा था। कौथुम दानपत्र में राजा के संबंध में कहा गया है कि वह "सर्ववर्णधर्मधनु है” अर्थात राजा के आश्रित सभी धर्म थे।
चालुक्य साम्राज्य में शैव और वैष्णव तीर्थों की बहुलता थी। कोल्हापुर इस युग में एक शक्ति पीठ के रूप में विख्यात हो गया था। बेलारी जिले में कार्तिकय की पूजा विशेष लोकप्रिय थी। जिन दिनों कल्याणी पर कल्चुरियों का आधिपत्य था, लिंगायत संप्रदाय की विशेष प्रतिष्ठा हुई। वासव, जो वासवपुराण का कर्ता माना जाता है, इस संप्रदाय का विशेष प्रचारक माना गया है। अनेक चालुक्य सम्राटों द्वारा अश्वमेध यज्ञ भी संपन्न हुए। शिव, विष्णु, सुब्रह्मण्य और विघ्नेश की चर्चा अनेक अभिलेखों में हुई है। शैव संप्रदायों में का भी खूब प्रचार हुआ। पाशुपत धर्म
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