गुप्तकालीन व्यापार एवं उसका बदलता स्वरूप - Changing Pattern of the Gupta's Trade

 गुप्तकालीन व्यापार एवं उसका बदलता स्वरूप - Changing Pattern of the Gupta's Trade


गुप्तकाल में व्यापार प्रगति पर था। पाटलिपुत्र, वैशाली, उज्जैन, दशपुर, भड़ौच, प्रतिष्ठान, विदिशा, प्रयाग, मथुरा, अहिच्छत्र एवं कौशांबी आदि प्रसिद्ध नगर तथा व्यापारिक केंद्र थे। चंद्रगुप्त द्वितीय ने उज्जैन को अपना प्रसिद्ध नगर बनाया एवं यहीं वराहमिहिर ने पृथ्वी का देशांतर तैयार किया था। कालिदास एवं शूद्रक के ग्रंथों में भी इस नगर के वैभव का पता चलता है। शूद्रक रचित 'मृच्छकटिकम्' से ज्ञात होता है कि उज्जैन में अनेक धनाढ्य श्रेष्ठी तथा सौदागर निवास करते थे। लंबी-चौड़ी सड़कों द्वारा ये नगर आपस में जुड़े हुए थे। अतः आंतरिक व्यापार काफी प्रगति पर था।


समुद्रगुप्त द्वारा सीमावर्ती राज्यों की विजय के तहत समतट (समुद्र तटवर्ती प्रदेश, पूर्वी बंगाल) पर अधिकार हो जाने से पूर्वी बंगाल के समृद्ध बंदरगाह गुप्त राजाओं के नियंत्रण में आ गए। यहाँ का सुप्रसिद्ध बंदरगाह ताम्रलिप्ति था जहाँ से मालवाहक जहाज मलय प्रायद्वीप, लंका, चीन तथा अन्य पूर्वी द्वीपों को नियमित जाया करते थे। ताम्रलिप्ति बंदरगाह स्थल मार्ग द्वारा भी भारत के प्रमुख व्यापारिक नगरों से जुड़ा हुआ था। अतः समुद्रगुप्त द्वारा ताम्रलिप्ति बंदरगाह पर अधिकार हो जाने से तत्युगीन व्यापार में आशातीत वृद्धि हुई। भारत के आंतरिक क्षेत्रों में गंगा ब्रह्मपुत्र, नर्मदा, गोदावरी, कृष्णा एवं कावेरी नदियों द्वारा भी व्यापार होता था।

मालवाहक जहाजों का निर्माण गुप्तकाल की प्रमुख उपलब्धि थी। कुछ जहाजों में तो एक साथ 500 व्यक्ति भी बैठ सकते थे। व्यापारिक वस्तुओं में प्रमुखतः कपड़े, मसाले, खाद्यान्न, नमक, बहुमूल्य पत्थर आदि थे। आंतरिक क्षेत्रों में माल ढोने के लिए गाड़ियों तथा जानवरों का प्रयोग किया जाता था।


पूर्व में ताम्रलिप्ति तथा पश्चिम में भृगुकच्छ (भड़ौच) प्रसिद्ध बंदरगाह था। भृगुकच्छ से पश्चिम देशों के साथ समुद्री व्यापार होता था। दक्षिण-पूर्वी एशिया तथा पश्चिमी एशिया के विभिन्न देशों के साथ व्यापार प्रगति पर था।

कपड़े, बहुमूल्य पत्थर हाथी दाँत की वस्तुएँ, गरम मसाले, नारियल, सुगंधित वस्तुएँ नील, दवाएँ इत्यादि प्रमुख वस्तुएँ निर्यात की जाती थीं। पेरीप्लस के अज्ञातनामालेखक के अनुसार, "भड़ौच से व्यापारिक सामग्रियाँ बाँटी जाती थीं। स्थल मार्ग से भी यूरोप के साथ व्यापार होता था। एक मार्ग रोम तथा सीरिया को और दूसरा मार्ग आक्सस एवं कैस्पियन सागर होता हुआ, मध्य यूरोप को जाता था।"


पूर्व में चीन तथा पश्चिम में अफ्रीका व यूरोप तक व्यापारियों का दोतरफा आना-जाना होता था। भारतवासी बाहर के देशों से प्रमुखतः घोड़ा, सोना,

मूंगा, कपूर, रेशम का धागा, नमक आदि आयात करते थे। प्लिनी, टॉलमी एवं पेरीप्लस के अनुसार, “भारतीय व्यापार गुप्तकाल में चरमोत्कर्ष पर था। "


गुप्तकाल की पतनावस्था में गुप्तकालीन व्यापार का स्वरूप भी बदल गया था। कालांतर में भारत तथा पश्चिमी देशों के बीच व्यापारिक संबंधों में गिरावट दृष्टिगोचर होती है। प्रमाणस्वरूप कुमारगुप्त के मंदसौर अभिलेख की इस घटना का उल्लेख किया जा सकता है कि पट्टवाय श्रेणी (रेशमी बुनकरों की श्रेणी) लाट प्रदेश को छोड़कर दशपुर जाकर बस गई थी। संभवतः पश्चिमी विश्व के साथ व्यापार में आई गिरावट इस प्रव्रजन (Migration) का कारण रहा है।

इतिहासकार आर. एस. शर्मा भी आर्थिक दृष्टि से गुप्तकाल को पतन का काल मानते हैं, परंतु इस बुनकर श्रेणी द्वारा सूर्य मंदिर का निर्माण कराया जाना उसकी समृद्धि का द्योतक है एवं रोम के साथ व्यापार भी उस समय प्रगति पर था। रोम के पतन के बाद उसका स्थान कस्तुतुनिया ने ले लिया तथा कांसटेंटाइन महान ने 330 ई. में उसे अपने व्यापार का प्रमुख केंद्र बनाया। इस समय भारत तथा रोम का व्यापार और घनिष्ठ हो गया। अतः हमें इस बात के पर्याप्त प्रमाण नहीं मिलते कि गुप्त युग में व्यापारवाणिज्य का ह्रास हुआ। रोमिला थापर भी गुप्तकाल को प्राचीन भारत की आर्थिक समृद्धि एवं व्यापारिक समृद्धि का अंतिम चरण मानती हैं।


वैजंतियों ने चीनियों से रेशम के कीड़े पालने की विधि सीख ली थी। पश्चिम के साथ भारत के व्यापारिक संबंधों पर उसका बुरा असर पड़ा। शायद इसीलिए लाट (गुजरात) के बुनकरों को दशपुर जाना पड़ा हो। दूर देशों के साथ व्यापारिक गतिविधियाँ शिथिल पड़ गई। गुप्तकाल में धातु के सिक्कों की कमी होने लगी, जिसका मुख्य कारण व्यापारिक शिथिलता थी। व्यापार की शिथिलता और शिल्पों तथा माल उत्पादन के हास के फलस्वरूप तीसरी चौथी सदियों में बहुत-से शहर उजाड़ पड़ गए। कौशांबी, हस्तिनापुर, तक्षशिला इनके उदाहरण हैं। मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात के नोह, उज्जैन नगर पतन की अवस्था में थे। यह सब गुप्तकालीन व्यापार के बदलते स्वरूप का ही प्रतिफल कहा जा सकता है।