चोल काल : आर्थिक स्थिति - Chola Period: Economic Condition

चोल काल : आर्थिक स्थिति - Chola Period: Economic Condition


चोल काल में कृषक उत्पादकों की ही अधिकता थी जो ग्रामों में रहते थे। भूमिस्वामित्व व्यक्तिगत था। भूमिहस्तांतरण विक्री और दान के द्वारा वैध था। समाज में इन लोगों का विशेष आदर था जो कि अधिक से अधिक भूमि के स्वामी थे। ग्राम प्रबंध में मुख्यतया जमींदारों का ही हाथ रहता था। कुछ क्षेत्रों में सामूहिक भूमि स्वामित्व होता था। अधिकांश किसान भूमिहीन कृषक थे अथवा भूमिदास थे। सरकारी कागजातों में सभी करदाताओं का नाम दर्ज होता था। भूमिहीन किसानों का कोई लेखा- जोखा नहीं होता था। शिल्पियों के अधीन भी भूमि होती थी।

ग्राम शिल्पी ग्रामों की छोटी-मोटी आवश्यकताओं की पूर्ति करते थे। ग्राम में रहने वाले छोटे किसानों और भूमिदासों तथा छोटे शिल्पियों की आर्थिक स्थिति विपन्न होती थी और उन्हें अपनी जीविका के लिए मुख्यतया भूमिधर जमींदारों का मुखापेक्षी होना पड़ता था । श्रमिक वर्ग दैनिक वृत्ति पर निर्वाह करते थे जो कि मुख्यतया अन्न के रूप में देय होता था। इनकी बस्तियाँ भी ग्रामों में संभ्रांत कृषकों एवं व्यक्तियों से छू झोपड़पट्टी के रूप में होती थीं। खेती के योग्य भूमि का बहुत बड़ा भाग मंदिरों पर चढ़ाया होता था अथवा ब्रह्मदेय तथा अग्रहार के रूप में वितरित था। ब्राम्यदेय और अग्रहार ग्राम विभिन्न करों से मुक्त होते थे।

असामी प्रथा भी थी अर्थात बड़े किसान अपनी भूमि पर खेती न करके उपकिसानों को खेती के लिए देते थे तथा पैदावार में भाग लेते थे। सैनिकों एवं सेनापतियों को भी वेतन के रूप में भूमि दिया जाता था। कृषि की व्यवस्था पर राज्य विशेष ध्यान देता था। यह राजकीय आय का एक बहुत बड़ा स्रोत भी था। ग्राम प्रचायतों को नहरों एवं तालाबों की निरंतर देखरेख करनी होती थी। सिंचाई के विभिन्न साधन प्रयोग में लाए जाते थे। चोलशासन में बंजर और जंगलों को कृषिभूमि में परिवर्तित करने का विशेष प्रयास किया गया। भूमि का वर्गीकरण उपज के आधार पर किया जाता था। पशुधन पर विशेष ध्यान दिया जाता था। गड़ेरिये, कलनै नामक समूहों में संघटित थे।

इन पर भी अनेक प्रकार के कर लगाए जाते थे। उद्योग की स्थिति अच्छी थी। उद्योगों की खपत कुछ तो स्थानीय बाजारों के माध्यम से हो जाती थी और कुछ दूर टू के बाजारों में खप जाते थे। चोल अभिलेखों में विभिन्न प्रकार के बुनकरों, बढ़इयों, लोहारों, स्वर्णकारों एवं रत्नाकारों का उल्लेख • मिलता है। नमक के व्यापार और उत्पादन पर राजकीय नियंत्रण था। ऐसे उद्योग जो कि विशिष्ट प्रकार के थे और महँगी वस्तुएँ बनाते थे, उनका ग्राहक मुख्यतया राज्यवर्ग होता था। व्यापारी संगठित थे और उनके विभिन्न प्रकार के शक्तिशाली संगठन थे, जैसे मणिग्रामम् बल जियर तेलिकी आदि। इनका उल्लेख विभिन्न अभिलेखों में बहुत बार आया है। सबसे प्रमुख वणिकसंस्थान नानादेशी कहलाता था। वह वस्तुतः अंतर्राज्यीय अथवा अंतर्राष्ट्रीय व्यापार करते थे।

इनके संघ आंतरिक व्यवस्था के लिए स्वतंत्र थे और राजनैतिक तथा प्रशासनिक बाधाओं से मुक्त थे। राजा तथा प्रजा में इनका विशेष सम्मान था किसी बड़े नगर में इनका कार्यालय होता था और अन्य स्थानों पर इनकी शाखाएँ होती थीं। आंतरिक व्यवस्था के लिए इनकी अपनी सभा होती थी। सार्वजनिक लाभ के लिए इनके द्वारा अनेक हितकारी कार्य होते थे, जिनमें मंदिर संबंधीदान और मंदिर निर्माण भी शामिल था। एक अंतर्राष्ट्रीय नानादेशीय नामक व्यापारिक संघ ने पगान (बर्मा) में एक विष्णु मंदिर का निर्माण कराया था। स्थानीय व्यापारी संघ जो कि बड़े-बड़े नगरों में स्थानीय व्यापार करते थे, नगरम् कहलाते थे। उद्योग और व्यापार के लिए ऋण सुलभ था जिस पर 12% अथवा 15% ब्याज देना होता था। देश-देशांतर की व्यापार की दृष्टि से चोलशासन में बड़ी प्रगति हुई।

वस्तुतः कडारम जैसे विजय चोल राजाओं ने अंतर्राष्ट्रीय व्यापार की पृष्ठभूमि में ही किया था। चोल नाविक और व्यापारी लंका, लक्षदीप, मालद्वीप के अतिरिक्त मलाया प्रायद्वीप तथा चीन के कैंटन नगर तक व्यापार करते थे। मुख्य बंदरगाह जो इन समुद्री व्यापार के केंद्र थे, महाबलीपुरम्, कावेरीपट्टनम् सैलूर, कोरकै आदि थे। व्यापार सुविधाओं को प्राप्त करने के लिए राजराज और राजेंद्र के समय में चीन देश को दूतमंडल भी भेजे गए। विदेशी व्यापार के माध्यम से विभिन्न प्रकार के गंध, चंदन, कपूर, रत्न, हाथीदांत के सामान, आबनूस, कागज, औषधियाँ आदि इस देश से बाहर जाती थीं। पूर्वी द्वीपसमूहों से मसाले का व्यापार होता था। अरब देश से घोड़े का व्यापार होता था। चीन से रेशमी वस्त्र, रत्न आदि इस देश को आते थे। विनिमय के माध्यम के रूप में सिक्कों का व्यापार होता था। सिक्के सोने और चाँदी, दोनों के होते थे। सोने के सिक्के दो भार के होते थे। एक गदैया प्रकार के सिक्के जो 58 ग्रेन के होते थे और दूसरा कलंजु प्रकार के सिक्के जो 72 ग्रेन के होते थे। व्यापारिक लेन-देन के लिए मान पद्धति भी निर्धारित थी, जिसका सबसे वजनी मान कलम और सबसे हल्का मान मंजाडी और सेविडु कहलाता था।