चोल काल - Chola period
चोल काल - Chola period
चोलों के अधीन विस्तृत भूमि थी और विभिन्न संस्कृतियों और प्रजातियों पर उनका शासन था। मूलतः चोल समाज की संरचना प्रारंभिक ढाँचे पर ही थी, किंतु साम्राज्य विस्तार तथा लोगों के दृष्टिकोण में परिवर्तन के कारण समाज की स्थिति में न्यूनाधिक परिवर्तन भी संभव था। सामाजिक स्वतंत्रता की स्थिति अपेक्षाकृत व्यापक थी। वर्ण और जाति का व्यापक प्रभाव समाज पर होते हुए भी पेशों के चुनाव के संबंध में जाति या वर्ण बाधक नहीं था। इण्णयिरम् एक प्रकार के ऐसे ब्राह्मण थे, जो पारंपरिक रूप से वाणिज्य ही करते थे, फिर भी ब्राह्मण के रूप में उनकी सामाजिक मान्यता कम नहीं थी। किंतु अधिकांशतः ब्राह्मण अभी भी अपने पारंपरिक षड्कर्म करते थे और अध्ययन-अध्यापन,
पौरोहित्य, कर्मकाण्ड तथा मंदिरों में पुजारी का काम करते थे। चिकित्सा के क्षेत्र में भी ब्राह्मण नियोजित थे। अधिकांश धर्मदेय और अग्रहार ब्राह्मणों के ही नाम होते थे। ब्राह्मणों की उदार दृष्टि के बावजूद इस समय तक इनमें सामाजिक वर्जनशीलता की भावना काफी उम्र थी और वे ग्रामों में भी रहते हुए अपनी बस्तियाँ या निवास अन्य सामाजिक वर्गों से पृथक बनाते थे। उन्हें कुछ विशेषाधिकार भी राज्य की ओर से प्राप्त थे, मुख्यतया "कर-मुक्ति के संबंध में इनकी अपनी व्यवस्था के लिए सभा भी होती थी। अग्रहार ग्रामों " का प्रशासन तो मूलतः उन्ही के अधिकार क्षेत्र में था। पारंपरिक मिश्र वर्णों की मान्यता अभी भी थी और मिताक्षरा का न्याय में महत्व था।
प्रतिलोम विवाह अब एकदम वर्जित न रह सके, अपितु कुछ पेशेवर, जैसे वर्धकी, तक्षक, स्वर्णकार और लौहकार समाज की संरचना में प्रतिलोम विवाहों का ही आधार था। रथकार और वास्तुकर्मी, स्थापित तथा शिल्पी और मूर्तिकार भी इसी वर्ग में आते थे। ब्राह्मणों का वह समुदाय जो मुख्यतया वैश्य कर्म करता था उसे ब्रह्मवैश्य कहा जाने लगा। वैश्य के द्वारा क्षत्रिय कन्या से उत्पन्न जुलाहों के वर्ग में आते थे। ऐसे ही जुलाहों से यज्ञोपवीत का सूत्र लेना, ध्वजपट्ट लेना उचित माना जाता था। क्षात्र वर्ग राज्य शासन और सेना में वृत्ति पाता था। शूद्र पारंपरिक रूप से कृषक श्रमिक, भूमिदास अथवा अन्य सेवाकर्म में लगे थे।
इन पारंपरिक वर्ण या जाति विभाजनों के अतिरिक्त चोल समाज दो विशिष्ट वर्गों में विभक्त था जो वलंगे और अडंगै कहलाता था। परंपरा के अनुसार यह विभाजन करिकाल (संगमयुग) के समय से ही चोलों में चला आता था,
किंतु राजराज प्रथम और राजेन्द्र प्रथम के समय में इसका प्रभाव अधिक मिलता है। सामाजिक वर्गभेद में इसका क्या स्वरूप था कहना कठिन है, किंतु ये परस्पर विरोधी - समुदाय थे, जो समय-समय पर उम्र संघर्ष कर बैठते थे। इस उग्रता और संघर्ष से सामान्य नागरिक तो प्रभावित थे ही सेना पर भी इसके दुष्परिणाम परवर्ती काल में और उजागर हुए। ये दोनों जातिवर्ग विभिन्न जातियों और उपजातियों के समूहों से निर्मित थे। वलगे की संरचना के विषय में विशेष जानकारी नहीं मिलती, किंतु यह वर्ग विशेषतया राज्यपोषित था। अतएव इसे दक्षिणावर्ती कहते थे। संभवतः इसमें भी ब्राह्मण सहित अन्य वर्णों के लोग थे। कुलोतुंग तृतीय के समय के एक अभिलेख में इडंगै जाति समूह के विषय में विशेष उल्लेख मिलता है।
यह अग्निकुल से उत्पन्न थे और इसमें भी ब्राह्मण और क्षत्रिय तथा अन्य वर्णों के लोग थे। चोल शासनकाल में अड़ंगे वर्ग के लोग अपने अधिकारों के प्रति विशेष सजग थे तथा संगठित थे। इनका वलंगैवर्ग से इतना विरोध था कि उन मंदिरों में यह पूजा भी नहीं करते थे जिनमें वलंगवर्ग के लोग पूजा-पाठ करते थे।
स्त्रियों को विशेष स्वतंत्रता मिली थी। सार्वजनिक अवसरों पर इन्हें उपस्थित होने की पूरी छूट थी। संभ्रांत वर्ग की स्त्रियों के पास अपनी संपत्ति भी होती थी। निम्नवर्ग की स्त्रियाँ श्रमिक रूप में कार्य करती थीं।
विवाह की मर्यादा का पालन स्त्रियों को करना होता था। सामान्यतया एक पत्नी व्रत का निर्वाह पुरूष करते थे किंतु राज्यवर्ग में बहुपत्नित्व की भी प्रथा थी। सतीप्रथा के बहुत कम उदाहरण मिलते हैं, किंतु वेश्यावृत्ति भी प्रचलित थी। मंदिरों में देवदासी की भी प्रथा थी। नर्तकियों के रूप में स्त्रियों का आदर समाज में था और मंदिर आदि के उत्सवों में वे भाग लेती थीं। दास होते थे, किंतु दासप्रथा इतनी जटिल नहीं थी और न उनके प्रति दुव्यवहार ही होता था। क्रीतदास भी होते थे। भूमिदासों के भी प्रमाण मिलते हैं।
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