गुप्त साम्राज्य का पतन - Collapse
गुप्त साम्राज्य का पतन - Collapse
ऐसा नहीं कि साम्राज्यभोगी गुप्तों के बाद भारतवर्ष में उनकी तुलना में सम्राट और साम्राज्य हुए ही नहीं। 7वीं शती के प्रथमार्थ में हर्षवर्धन और 9वीं शती में गुर्जर प्रतिहारों का कन्नौज साम्राज्य अपने शक्ति और वैभव में गुप्तों से पीछे नहीं था। किंतु वे सकलउत्तरापथेश्वर' मात्र थे। मौर्यों और गुप्तों के मगध साम्राज्य दक्षिण भारत के लिए भी अधिराट् स्वरूप थे, किंतु उसके विपरीत कन्नौज साम्राज्य अपना प्रभाव विंध्याचल के नीचे कभी भी स्थापित नहीं कर सका। साथ ही, ऊपर जिन प्रवृत्तियों की ओर निर्देश किया जा चुका है,
उनके कारण कन्नौज साम्राज्य भी कभी शांत और निर्वाध होकर देश के सांस्कृतिक कलात्मक और साहित्यिक उन्नयन में उस प्रकार नहीं लग सका, जिस प्रकार मौर्यों और गुप्तों ने अपने को लगाया था और यदि यह अवस्था कन्नौज के विशाल साम्राज्य की थी तो अन्य छोटे-छोटे साम्राज्यों अथवा राज्यों की बात ही क्या। इस स्थिति का सर्वमुख्य कारण था भारत वर्ष के विशाल भू-भाग पर फैले हुए अनगिनत छोटे-बड़े राज्यों का प्रादुर्भाव। पाँचवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में उत्तर-पश्चिमी भारत पर होने वाहू आक्रमण गुप्त साम्राज्य के ह्रास के प्रमुख कारण बने।
प्रायः उसी समय गुप्त साम्राज्य का मैतृक नामक एक सामंतवंश भी वल्लभी में स्वतंत्र रूप से शासन करने लगा। पूर्व में कामरूप (असम) भगदत्तों के नेतृत्व में स्वतंत्र हो गया और बंगाल तथा उड़ीसा भौगोलिक और राजनैतिक इकाइयों के रूप में निखरने लगे। उत्तर में पुष्यभूति और उसके वंशजों ने थानेश्वर / कुरुक्षेत्र में एक राज्य की स्थापना कर ली। पश्चिम में राजस्थान/जोधपुर और गुजरात-सौराष्ट्र भृगुकच्छ-नांदीपुरी से गुर्जर प्रतिहारों की दो शाखाओं ने शासन प्रारंभ कर दिया।
सिंध भी स्वतंत्र था। अतः देश का उत्त- पश्चिमी द्वार हूणों के अतिरिक्त अनेक विदेशी आक्रमणकारी जातियों के लिए अप्रतिरुद्ध रूप में खुल गया। गुप्त साम्राज्य का हृदय स्थल (उत्तर प्रदेश और बिहार) भी कई छोटे क्षेत्रों में बँट गया। कन्नौज में मौखरि राजवंश शासन करने लगा, जो छठी शती के उत्तरार्द्ध और सातवीं शती के प्रथम 5-6 वर्षों के भीतर उत्तर भारतीय राजनीति में कई मोड़ों का कारण बना। विघटन के इस दौर में स्वयं गुप्तवंशके नामलेवा भी अन्य स्थानीय राजवंशों की तरह मालवा और मगध में अलग-अलग सीमित हो गए, जिनसे उनकी अपने पूर्वजों की सारी शक्ति जाती रही। इस प्रकार छठी शती ई. में उत्तर भारत से केंद्रीय सत्ता का लोप हो गया।
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