औपनिवेशिक कानून, समाज सुधार आंदोलन एवं स्त्री प्रश्न - Colonial Law, Social Reform Movement and Women's Question
औपनिवेशिक कानून, समाज सुधार आंदोलन एवं स्त्री प्रश्न - Colonial Law, Social Reform Movement and Women's Question
औपनिवेशिक काल में समाज सुधारकों ने महिलाओं की स्थिति सुधारने के लिए लोगों में चेतना जगाने के बहुत प्रयास किए। लेकिन उससे पहले ब्रिटिश सरकार द्वारा कई ऐसे क़ानून सामने लाये गए, जिन्होंने समाज सुधार आंदोलन के लिए नींव तैयार करने का काम किया सती निरोध, विधवा पुनर्विवाह, बालविवाह पर रोकथाम, विवाह की आयु ऐसे कई मुद्दों पर कानून बने जिनके बार में काफी लेखन किया गया। इतिहासकार सुधीर चंद्रा का रक्माबाई पर बेहद महत्वपूर्ण शोध है, जो बाल विवाह और दांपत्य जीवन के अधिकार क़ानून को स्त्री के जीवन पर नियंत्रण के औजार के रूप में प्रस्तुत करता है (चंद्र, 2012) | समाज सुधारकों में राजा राम मोहन राय, ईश्वर चन्द्र विद्यासागर द्वारा उठाए स्त्री प्रश्न तो इतिहास का हिस्सा बने लेकिन “Herstory" में स्त्री प्रश्नों को लेकर महिलाओं का दृष्टिकोण शामिल किया गया, जिसमें पं. रमाबाई, ताराबाई शिंदे सावित्रीबाई फुले, बेगम रुकैया सखावत हुसैन आदि जैसी स्त्रियाँ प्रमुख रहीं। जहाँ पुरुष महिलाओं के जीवन में कुछ बदलाव से ही संतुष्ट थे, वहीं इन महिलाओं ने 19 वीं सदी के इसी दौर में संरचनात्मक ढाँचे के बीच बसी पितृसत्ता की ओर तीखे शब्दों में बात रखी और ऐसी उत्पीड़नकारी व्यवस्था बदलने की बात की। रुकैया ने तो एक कदम आगे जाकर अपने आलेख 'सुल्ताना का सपना के माध्यम से एक ऐसे काल्पनिक संसार का भी निर्माण कर लिया, जहाँ शासन महिलाओं के हाथ में है और पुरुष घरेलू जिम्मेदारियों का निर्वहन करते हैं (हुसैन, 2011)। स्त्री पुरुष दोनों की स्त्री प्रश्नों के प्रति समझ और बदलाव की पद्धति में जमीन आसमान का फर्क है। स्त्री इतिहास की यह एक महत्वपूर्ण कड़ी है।
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