सामंतवाद का परिणाम एवं प्रभाव - Consequences and Effects of Feudalism

सामंतवाद का परिणाम एवं प्रभाव - Consequences and Effects of Feudalism


सामंतवाद के उदय और विकास का परिणाम भारतीय शासन पद्धति के लिए बड़ा ही हानिकारक सिद्ध हुआ। गुप्तकाल के बाद से राजनैतिक बँटवारे की जो तस्वीर उपस्थित होती है, वह बहुत कुछ सामंतवाद का ही परिणाम था। विभिन्न सामंती क्षेत्रों में बड़ेबड़े राज्यों अथवा साम्राज्यों की तरह राजदरबार, राज्याधिकारी, न्यायालय, सचिवालय, पुलिस और सेना जैसे प्रशासन के अनेक तत्व होने लगे। परिणामतः, सामंतगण अधिराज की शक्ति कम होते ही अपनी शक्ति और राज्य क्षेत्र बढ़ाने का प्रयत्न करने लगते थे। बहुत से राज्य तो मूलतः दान दी गई अथवा राजकीय सेवा हेतु दी गई भूमियों से विकसित हो जाते थे।

11 वीं एवं 12वीं शदी में पालों के वैद्यदेव नामक अमात्य और सेनापति ने असम में इसी प्रकार के एक स्वतंत्र राज्य की स्थापना कर ली थी। राजाओं द्वारा प्रतिद्वंदी राजकुमारों को दिए जाने वाले जिलों अथवा प्रांतों से भी कुछ राज्य विकसित हो गए थे। अभिलेखों से स्पष्ट है कि महाराजाधिराज, परमभट्टारक, परमेश्वर और चक्रवर्ती जैसे विरुद सम्राटों अथवा अधिराजों के लिए ही लगाए जाते थे किंतु उनकी कमजोरी और अवनति के समय प्रतिहार मचनदेव जैसे सामंतों ने भी उन बड़े विरुदों को धारण करते कोई संकोच नहीं दिखाया।

12वीं शती की मानसार नामक रचना में अवतरण क्रम से 9 प्रकार के बड़े-छोटे राजाओं की सूची दी गई है। इसी प्रकार 12वीं शती के भट्टभुवनदेव के ग्रंथ अपराजितपृच्छा में भी अवतरण क्रम में ही 9 प्रकार के राजाओं का उल्लेख किया गया है। वह क्रम है महीपति, राजा, नराधिप, महामंडलेश्वर मांडलिक, महासामंत, सामंत, लघुसामंत और चतुराशिका शुक्रनीतिसार में वार्षिक आय के आधार पर विभिन्न राजाओं के क्रम और उनके शासकों की पदवियाँ निश्चित की गई हैं। स्पष्ट है कि राजाओं और राज्यों के घटते-बढ़ते हुए आकार के आधार पर उनका विशेषण और पदविशेष निश्चित किया जाने लगा। किंतु उनके सदा परिवर्तनशील रहने के कारण इस संबंध में कोई स्पष्ट मापदंड नहीं निश्चित हो पाए। आज का साम्राज्य, कल का सामंत क्षेत्र रहा हो अथवा आने वाले कल में उसकी विपरीत की स्थिति हो जाए,

यह इस युग में सदा संभव था। गुर्जर प्रतिहारों की अवनति और अंत में उनके पतन अर्थात् लगभग 950-1030 ई. के बाद उत्तर भारत में जो विभिन्न राज्य जैसे- चाहमान, परमार, चंदेल, चालुक्य, कलचुरि और गहड़वाल उठ खड़े हुए जो उनकी सत्ता के चरमोत्कर्ष के समय उनके सामंत राज्य रह चुके थे। ऐसी स्थिति में वंश और परिवार के प्रति भक्ति, आंतरिक कलह, फूट और युद्ध प्रशासनिक ढीलापन, केंद्रीय सत्ता का ह्रास, निरंतर अस्थिरता, विदेशी आक्रमणकारियों को मानों निमंत्रण देने वाली स्थिति और अन्य राजनैतिक कमजोरियों का उत्पन्न हो जाना स्वाभाविक था, किंतु आश्चर्य तो यह है कि भारतीय सम्राटों ने यह कभी नहीं सोचा कि उनके द्वारा दिए गए दानों से उत्पन्न उनके प्रशासनिक अधिकारों की कमी से तथा सामंतों को राज्य के बड़े-बड़े पदों पर नियुक्त करने अथवा उन्हें सैनिक अधिकार देने से अंत में उनकी शक्ति कितनी सीमित हो जाएगी और उसका कितना भयानक परिणाम होगा।