प्राचीन क्षत्रिय राजवंशों की निरंतरता - Continuity of ancient Kshatriya dynasties
प्राचीन क्षत्रिय राजवंशों की निरंतरता - Continuity of ancient Kshatriya dynasties
भारतीय मान्यता के अनुसार मनु मानव जाति के जन्म दाता कहे जाते हैं और उनके 9 पुत्रों में से सूर्य वंश तथा एक पुत्री इला से चंद्रवंश की उत्पत्ति हुई। कालांतर में उनके उत्तराधिकारियों से संस्थापक के नाम पर अनेक वंशों का विकास हुआ, जो उत्तर भारत के विभिन्न भागों में फैलकर शासन करने लगे। छठी शताब्दी ईसा पूर्व तक देश छोटे-छोटे राज्यों में विभक्त था जहाँ ये जातियाँ स्वतंत्र रूप से शासन करती रहीं। इस काल के बौद्ध एवं जैन ग्रंथ 16 महाजनपदों तथा 10 गणराज्यों का हवाला देते हैं। इनमें अनेक जनपद एवं गणराज्य पौराणिक जनपदों के नाम से समानता रखते हैं।
छठी शताब्दी ईसा पूर्व में मगध साम्राज्य के उदय से अनेक जनपदों का इस साम्राज्य में विलय हो गया,
लेकिन राजनैतिक शक्ति के क्षीण होने के बावजूद भी यह जातियाँ अपनी प्राचीन परंपराओं का अनुकरण करती हुई समाज में अपना जीवन-यापन करती रहीं तथा समय पर केंद्रीय सत्ता के हास का लाभ उठाकर अपनी शक्ति का विकास करती रहीं।
नंदों के साथ इक्ष्वाकु कुरू, पंचाल, काशी, शूरसेन, कलिंग, मिथिला, अश्मक, हैहय, वीतिहोत्र आदि कलियुग राजवंशों का उल्लेख चौथी शताब्दी ईसा पूर्व में प्राचीन जातियों के अस्तित्व का बोध कराता है। मौर्यों के बाद शुंग -सातवहन काल में भी इन जातियों के उल्लेख मिलते हैं,
जो गौतमीपुत्र सातकर्णी तथा रुद्रदामन द्वारा पराजित हुई थी। तत्पश्चात् विशाल गुप्त साम्राज्य के समय एक बार पुनः देश राजनैतिक एकता से आबद्ध हुआ। प्रयाग प्रशस्ति में समुद्रगुप्त द्वारा विजित जातियों के नामों, प्राचीन जातियों के नामों में समानता किसी न किसी रूप में समाज उनके अस्तित्व का द्योतक है। सामाजिक ढाँचे के विकास एवं परिवर्तन के फलस्वरूप नई-नई जातियाँ नए-नए नामों से प्रकाश में आती रहीं तथा अवसर पाकर समय-समय पर अपनी स्वतंत्रता घोषित करती रहीं। 8वीं शताब्दी ईसवी के खालिमपुर ताम्रपत्र में भोज, मत्स्य, मद्र, कुरू, यदु, अवंति और गांधार का उल्लेख प्राप्त होता है।
गुप्त साम्राज्य के पतन के बाद प्रांतीय शासक एवं सामंत जातियाँ पुनः अपनी स्वतंत्रता घोषित करने लगीं तथा नए संस्थापकों के नाम से अभिहित होकर प्रकाश में आने लगीं। शताब्दियों के इस लंबे समय में इन प्राचीन पौराणिक जातियों को यद्यपि अनेक बार साम्राज्यवादी राजनैतिक शक्तियों का सामना करना पड़ा तथा अपनी सुरक्षा एंव भोजन हेतु अनेक व्यवसायों को ग्रहण करने के साथ-साथ समय-समय पर नामों में भी परिवर्तन करना पड़ा लेकिन वे अपनी प्राचीन परंपराओं एवं रीति-रिवाजों के साथ-साथ अपने मूल वंशों जैसे सूर्य वंश चंद्रवंश अथवा यादव वंश से अपना संबंध जोड़ना विस्मृत न कर सके।
यही कारण है कि हर्ष के पश्चात् ये जातियाँ उत्तर भारत में पुनः अपनी शक्ति का संगठन कर राजनैतिक मंत्र पर उपस्थित हुई तथा साम्राज्य का विस्तार करने लगी, साथ ही अपने को प्राचीन क्षत्रिय वंशो से जोड़ना न भूलीं, जो उनका वास्तविक मूल था।
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