इतिहास में महिलाओं का योगदान - contribution of women in history

इतिहास में महिलाओं का योगदान - contribution of women in history


अगला चरण था महिलाओं का इतिहास में योगदान। इसमें महिलाओं को उनके योगदान के लिए इतिहास में चिन्हित किया गया जिसको अब तक पितृसत्ता के द्वारा दबा कर रखा गया था या ऐसा कह सकते हैं की उनको पुरुषों के अनुसार व्याख्यायित किया गया। परंतु इस स्तर पर कई तरह के सवाल उठने लगे की सामाजिक उन्मूलन में, समाज सुधार में या किसी भी प्रगतिशील आंदोलन में, मजबू आंदोलन में महिलाओं की क्या भूमिका रही है जो नया हो ? महिलाओं के योगदान को प्रश्न के कठघरे में रखा गया की उनका किसी भी आंदोलन में क्या योगदान रहा है।

ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि हमेशा से समाज में योगदान का निर्णय प्रभाव से नापा जाता था या फिर पुरुषों के अनुपात में महिलाओं की हिस्सेदारी से। ध्यान देने योग्य है कि भारत में अदृश्य महिलाओं के इतिहासलेखन की प्रक्रिया जटिल हो - गई क्योंकि 1 9वीं शताब्दी में औरतों की दृश्यता सामने आई। यह इसलिये नहीं हुआ कि औरतों पर शोध कार्य स्वतंत्र स्तर पर हुआ बल्कि इसलिये कि उन्हें राष्ट्रीय संस्कृति का मार्ग पट्ट या केंद्र बिंदू माना गया। यह राष्ट्रीय संस्कृति उपनिवेशिक शासकों द्वारा सभी भारतीयों पर आरोपित विचारधारा कि वह पिछड़े हुए थे, उससे मुक्त होना चाहती थी। इस प्रकार की लेखन शैली लिंग को एक विश्लेषणात्मक इकाई के रूप में देखने की प्रक्रिया में बाधा डालती थी।

यही कारण था कि स्त्री पक्ष से इतिहास लिखने वालों ने सबसे पहले 19 वीं और 20 वीं शताब्दी में महिलाओं का जो खाका भारत के प्राचीन इतिहास के संदर्भ में बनाया था, उसका विरोध किया। उसकी वर्तमान समय में तथाकथित व्याप्त बुराईयों से तुलना की और इसके बाद लिंग पर आधारित इतिहास को लिखने की शुरुआत की। जब भी हम इतिहास की बात करते है तो हमारे सामने राजा-महाराजाओं, बादशाहों के अपना साम्राज्य फैलाने के लिए आपसी मार-पीट के दृश्य सामने आते है। या फिर ब्रिटिशकाल के इतिहास को याद करेंगे तो हमारी पाठ्य-पुस्तकों में हमें 1857 का विद्रोह पढ़ाया जाता है, जिसमे कहीं थोड़ी जगह रानी लक्ष्मीबाई के लिए छोड़ दी गई होगी,

उसके बाद हमे तिलक युग, महात्मा गांधी युग, भगत सिंह का समय, सुभाषचंद्र बोस के बारे में इतिहास पढ़ाया जाता है, हमे इसी तरह पढ़ाया जाता है कि ब्रिटिश साम्राज्यवाद से आजादी इन महापुरुषों के कारण मिली। कुछ एक नारियों के बारे मे थोड़ा बहुत पढ़ाया जाता है जैसे- एनी बेसेंट, सरोजनी नायडू, भीकाजी कामा आदि। इनके बारे में उतना ही पढ़ाया जाता है जितना एक टिप्पणी के लिए आवश्यक हो । हमारे मानव समाज के इतिहास में हमेशा जन इतिहास को उपेक्षित किया गया है। इसी जन इतिहास में नारी इतिहास भी शामिल है, जिसे सामंतवादी, बुर्जुआ इतिहास कारों ने अपने लेखन में जगह नहीं दी। इतिहास के पन्नों से नारियों के इतिहास तक को अदृश्य कर दिया गया,

जिन गिनी चुनी नारियों का जिक्र इतिहास में किया जाता है, वे इतनी सशक्त थी कि उन्हें इतिहास के पन्नों से हटाना मुश्किल था। इसलिए उन्हें इतिहास में थोड़ी बहुत जगह मिली पर उस तरह नहीं, जिस तरह पुरुष महापुरुषों को मिली है। जब से दुनिया में नारीवादी आंदोलन उभरे उन्होने उपेक्षित इतिहास को फिर से लिखना शुरू किया जिसे इतिहास के पुनर्लेखन के माध्यम से सामने लाने का प्रयास किया गया। अधिकतर इतिहासकारों ने आंदोलनों में महिलाओं की भागीदारी को नारी-शिक्षा या समाज सुधार आंदोलनों से जोड़ने के लिए सिर्फ उच्च वर्ग की संभ्रांत महिलाओं की ही भूमिका को प्रमुखता से दर्शाया है ऐसा करते हुए उन इतिहासकारों ने बड़ी होशियारी से किसानों और मजदूर वर्ग कि उन महिलाओं के योगदान को अनदेखा कर दिया,

जिन्होने बड़ी संख्या में विभिन्न आंदोलनों में प्रत्यक्ष रूप से हिस्सा लिया। इनामे कईयों की माताएँ, बहने, पत्नियाँ और बेटियाँ शामिल थी। इन संघर्षों में कई ऐसी औरतें थी जिनके पतियों के मर जाने या जेल जाने के बाद उन्होने अपने बूढ़े बाप-माँ, सास-ससुर और छोटे बच्चों की जिम्मेदारियाँ अपने कंधों पर उठा के आंदोलनों में अपना योगदान दिया था।


19वी सदी की शुरुआत में ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ अनेक विद्रोह हुए जिसमें असंख्य महिलाओं ने अपनी भागीदारी दर्ज कराई थी लेकिन इतिहास के पन्नों में वे छू-छू तक दिखाई नहीं देती है। भारतीय स्वतंत्रता की लड़ाई में महिलाओं के योगदान को दर्ज करने की बात आती है,

तब सिर्फ उच्च वर्ग और उच्च जाति की विशेषकर कांग्रेसी महिला नेताओं की बात होती है। भारतीय स्वतंत्रता में साधारण किसान, मजदू, दलित महिलाओं का योगदान भरपूर था, पर उनको पूरी तरह नजर अंदाज किया गया। इन महिलाओं ने दमन का साहस के साथ सामना किया था और हर तरह के सामाजिक कलंकों के आरोपों का सामना किया था, पर उनके साहस और वीरता को इतिहास के पन्नों में जगह नहीं मिल पायी। वर्तमान में हम सब की जिम्मेदारी बनती है कि हम उन महान महिलाओं के साहस और वीरता भरे कारनामों को सामने लाया जाय जिससे की उन्हे सम्मान मिल सके और पुरुष प्रधान इतिहासकारों को उनके द्वारा लिखित इतिहास के इतर महिलाओं को स्थापित किया जा सके।

अठारहवीं सदी के अंत एवं बीसवीं सदी की शुरुआत में अनेक महिला आंदोलन हुए। पर उन आंदोलनों का कोई इतिहास नहीं मिलता। यही वह क्षण है, जब स्त्री आंदोलन व देश में हुए आंदोलन का पुर्नमूल्यांकन जरुरी है ताकि मुक्ति की सामाजिक परंपरा में एक नया अध्याय जोड़ा जा सके।


बावजूद इन सबके इतिहास में महिलाओं को स्थान न देना किसी साजिश को दर्शाता है और यह कहना बिलकुल भी अनुचित नहीं होगा की ऐसा अनायास हुआ है बल्कि यह सब सयास है। परिवार राज्य और निजी संपत्ति के उदय के साथ ही महिलाओं का विघटन प्रारंभ होता है।

वर्तमान समय में जब स्त्री की पहचान समाज एक स्वतंत्र ध्रुव के रूप में हो चुकी है तब ऐसे में यह सवाल उठता है की इतिहास लेखन फिर से होना ही चाहिए। और उस इतिहास लेखन का दृष्टिकोण बदलना चाहिए। अब तक इतिहास लेखन सिर्फ और सिर्फ पुरुषों को केंद्र में रख कर लिखा गया है और स्त्री को उसी मे समाहित माना गया है। उनके विचार को उनकी पहचान को उनके होने के एहसास को पुरुषवादी समाज ने दबा दिया है। जो आधी आबादी है उनकी अलग से कोई पहचान का न होना अपने आप में बहुत भयावह है।