पल्लवों की सांस्कृतिक उपलब्धियाँ - Cultural Achievements of Pallavas

पल्लवों की सांस्कृतिक उपलब्धियाँ - Cultural Achievements of Pallavas


स्थापत्य एवं मूर्तिकला


वास्तुकला की द्रविड़ शैली की स्थापना पल्लवों के शासन काल में हुई। पल्लवों के शासनकाल में वास्तुकला कंदरा कला के प्रभाव से मुक्त हुई और प्रस्तर खंडों से बने स्वतंत्र अथवा संरचनात्मक मंदिरों का निर्माण प्रारंभ हुआ। दूसरे शब्दों में, पल्लव कलाकारों ने वास्तुकला के इतिहास में शैलकृत वास्तुकला एवं संरचनात्मक मंदिरों के मध्य सेतु का कार्य किया। पल्लवों केशासनकाल में वास्तुकला की जिस शैली का विकास हुआ, उसे चार श्रेणियों में विभाजित किया जाता है- 



(i) महेंद्रवर्मन शैली (600-640 ई.)


महेंद्रवर्मन शैली में निर्मित मंदिरों को मंडप कहा जाता है।

प्रत्येक मंडप एक स्तंभयुक्त विशाल कक्ष है, जिसे पर्वतीय चट्टानों को छील तराश कर 'शैलकृत विधि' से बनाया गया है। इन मंडपों के उदाहरण पल्लावरम एवं दलवनूर नामक स्थानों में उपलब्ध हैं।


महेंद्रवर्मन के शासनकाल के अंतिम वर्षों में सादे मंडपों से हटकर कुछ भिन्न रचनाएँ हुई जैसे- इंडवल्ली का अनंतशायिन मंदिर तथा भैरवकोंडा मंदिर समूह। अनंतशायिन मंदिर की रचना बौद्ध विहारों पर आधारित है। इसमें एक के ऊपर एक चार स्तंभयुक्त कक्ष हैं और इसे देखने पर पिरामिड का भ्रम होता


है। भैरवकोंडा स्थित मंदिर महेंद्रवर्मन शैली की अंतिम और अपेक्षाकृत अधिक विकसित रचनाएँ हैं। महेंद्रवर्मन शैली पर्वतीय चट्टानों को काटकर गुफा अथवा कंदरा आदि का रूप देने की पारंपरिक शैली से भिन्न थी । तोंडमंडलम में अपेक्षाकृत अधिक घनत्व वाली शिलाओं को उत्कीर्ण करना कठिन था। स्वाभाविक रूप से इस कठिनाई का प्रभाव शैली पर भी पड़ा। इसी कारण महेंद्रवर्मन शैली के गुफा मंडप चालुक्यों के गुफा मंदिरों की अपेक्षा अधिक संकीर्ण एवं कम अलंकृत हैं। 


(ii) मामल्ल शैली (640-700 ई.)


मामल्ल शैली का प्रमुख केंद्र मामल्लपुरम अथवा महाबलिपुरम नामक नगर था, जिसकी स्थापना नरसिंहवर्मन- प्रथम ने की थी।

यहाँ समुद्री तट पर कठोर पत्थर की चट्टाने हैं, जिन्हें तराश कर एकाश्म गुफाओं, मंदिरों और मूर्तियों का रूप दिया गया है। मामल्ल शैली के अंतर्गत दो प्रकार के मंदिरों का निर्माण किया गया- (क) मंडप एवं (ख) रथा


मामल्ल शैली के मंडप पूरी तरह पहाड़ों एवं चट्टानों को काटकर बनाए गए हैं किंतु वे मंडप महेंद्रवर्मन शैली के मंडपों की अपेक्षा अधिक अलंकृत हैं। इन मंडपों की विशेषता इनके स्तंभ हैं, जो सिंहों के सिर पर अवस्थित हैं और जिनके शीर्ष भाग मंगल घट के आकार के हैं। मामल्ल शैली के उल्लेखनीय मंडप हैं- वाराह मंडप, महिषासुर मंडप तथा पंच पांडव मंडप आदि।


मामल्ल शैली के दूसरे प्रकार के मंदिरों को रथ कहा जाता है। ये एकाश्म मंदिर हैं। इनमें से प्रत्येक शिलाखंड को ग्रेनाइट से काट-तराश कर बनाया गया है। इनमें कहीं कोई जोड़ नहीं हैं और ये रथों की अनुकृति प्रतीत होते हैं। वे रथ मध्यम आकार के हैं और उनमें से कोई भी 42" लंबा, 35° चौड़ा और 40' ऊँचा से अधिक नहीं है। पश्चिमी कला समीक्षकों ने मामल्ल शैली के इन रथों को 'सप्त पैगोडा' या 'सप्त रथ' नाम दिया है। ऐसा प्रतीत होता है कि इन रथों के भीतरी भाग का निर्माण कार्य अपूर्ण रह गया और उनमें कभी किसी ने पूजा नहीं की। पर्सी ब्राउन इन रथों के विषय में कहते हैं, "शिल्पी अपने औजार छोड़कर सदा के लिए यहाँ से चले गए और ये मंदिर अपूर्ण रहकर पूजा के अयोग्य रह गए। संभव है कि ये रथ बड़े आकार में बनाए जाने वाले मंदिरों की लघु प्रतिकृति या मॉडल के रूप में बनाए गए होंगे।


मामल्ल शैली के रथों में द्रौपदी रथ महज एक कोष्ठ है। अन्य सभी रथ बौद्ध विहार अथवा चैत्य की अनुकृति हैं। बिहार की तरह दिखने वाले रथों में धर्मराज रथ महत्वपूर्ण है। यह अपने समूह का विशालतम रथ है, जिसका आधार वर्गाकार है और शिखर पिरामिड के आकार का है। इसमें तीन मंजिल हैं और आधार तल में दो गर्भगृह हैं। चैत्य की तरह दिखने वाले रथों में भीम रथ एवं गणेश रथ प्रमुख हैं। ये आयताकार हैं और इनके शिखर ढोलाकार हैं।


(iii) राजसिंह शैली (700-800 ई.)


नरसिंहवर्मन - प्रथम के साथ पहाड़ों को काटकर मंदिर बनाने की शैली का अंत हो गया और उसके स्थान पर प्रस्तर अथवा पाषाण खंडों की मदद से चिनाई विधि द्वारा स्वतंत्र रूप से निर्मित अथवा संरचनात्मक मंदिरों का निर्माण प्रारंभ हुआ।

इसके फलस्वरूप इच्छित स्थान पर इच्छित आकार के भवनों एवं मंदिरों का निर्माण संभव हो सका। राजसिंह शैली में निर्मित मंदिरों के उदाहरण निम्नलिखित हैं- (क) समुद्रतट मंदिर (मामल्लपुरम), (ख) ईश्वर मंदिर (मामल्लपुरम), (ग) मुकुंद मंदिर (मामल्लपुरम), (घ) पन्नमलाई मंदिर ( अरकाट), (ड़) कैलाशनाथ मंदिर ( कांचीपुरम), (च) वैकुंठ पेरूमल मंदिर ( कांचीपुरम)। इनमें समुद्रतट मंदिर, कैलाशनाथ मंदिर एवं वैकुंठ पेरूमल मंदिर अधिक महत्पूर्ण हैं, क्योंकि ये निर्माण के विकासक्रम को निरूपित करते हैं।


मामल्लपुरम स्थित समुद्रतट मंदिर राजसिंह शैली का प्रथम मंदिर है।

यह मंदिर धर्मराज रथ का विकसित रूप प्रतीत होता है। दक्षिण भारतीय मंदिरों में गोपुरम' तथा चारों ओर 'प्राकारम' बनाने का उदाहरण सर्वप्रथम यहीं मिलता है। पूर्वाभिमुखी इस मंदिर को समुद्र तट के ठीक किनारे इसलिए बनाया गया होगा ताकि सूर्य की प्रथम किरणें मंदिर के गर्भगृह में पड़े। समुद्रतट मंदिर का गर्भगृह वर्गाकार है तथा शिखर पिरामिड के आकार का हैं, जिसमें ऊपर के खंड नींचे के खंडों से क्रमशः छोटे होते जाते हैं। इस मंदिर में भी पल्लवों की विशिष्ट पहचान सिंहभूम स्तंभों का प्रचुर प्रयोग हुआ है।


समुद्रतट मंदिर के कुछ समय बाद कांची में कैलाशनाथ मंदिर का निर्माण हुआ। इस मंदिर का अधिकांश भाग राजसिंह के शासनकाल में बना और इसके निर्माण में राजसिंह की रानी रंगपताका ने गहरी रुचि ली थी।

विष्णु को समर्पित तथा तीन मंजिलों वाला यह मंदिर पल्लव वास्तुकला का उत्कृष्ट उदाहरण है। पर्सी ब्राउन इसे एक शिव मंदिर मानते हैं। कैलाशनाथ मंदिर का आधार आयताकार है और इसका शिखर पिरामिड के आकार का है। पल्लव वास्तुकला की सभी विशिष्टताएँ, जैसे- मंडपों के सिंह स्तंभ, पिरामिड के आकार का शिखर और गोपुरम इस मंदिर में विद्यमान हैं। मंदिर परिसर में प्रवेश एक छोटे गोपुरम से होकर है, जिसके ऊपर वेसर शैली की गजपृष्ठाकार छत है।


पल्लव वास्तुकला का सर्वाधिक परिपक्व उदाहरण कांची स्थित वैकुंठपेरूमल मंदिर है। यह एक विष्णु मंदिर है। क्रिस्टोफर टैंडगेल के अनुसार,

पल्लवों की यह प्रायः अंतिम रचना है और आकार में कैलाशनाथ मंदिर से बड़ी है। वर्गाकार भू-विन्यास वाले इस मंदिर की विशेषता यह है कि इसके गर्भगृह, गर्भगृह और मंदिर के बीच का अंतराल, मंडप तथा गोपुरम सभी एक दूसरे से संबद्ध हैं और वे एक ही भवन के अभिन्न अंग जैसे प्रतीत होते हैं।.


 (iv) नंदिवर्मन मंदिर शैली (800-900 ई.)


प्रस्तर खंडों से निर्मित स्वतंत्र अथवा संरचनात्मक मंदिर शैली के अंतिम चरण में वे मंदिर आते हैं जो नंदिवर्मन और उसके उत्तराधिकारियों के काल में बने।

ये मंदिर आकार में छोटे और पूर्व के मंदिरों की नकल मात्र प्रतीत होते हैं। इस शैली के मंदिरों के वास्तु विन्यास में कोई विशिष्ट परिवर्तन नहीं किया गया, केवल पूर्व परंपराओं का निर्वाह किया गया है। इस शैली में कोई नवीनता नहीं है, किंतु स्तंभ शीर्षों का अधिक विकास हुआ है। नंदिवर्मन शैली के प्रमुख उदाहरण निम्नलिखित हैं- कांची स्थित मुक्तेश्वर एवं मांगतेश्वर मंदिरा


पल्लवों के शासनकाल में वास्तुकला के अतिरिक्त मूर्तिकला एवं संगीत कला का भी विकास हुआ। मंडपों, रथों एवं समुद्रतट मंदिर के अतिरिक्त महाबलिपुरम में शैल फलकों पर बहुत बड़ी संख्या में रिलीफ चित्रों को उत्कीर्ण किया गया है।

मूर्तिकला की दृष्टि से इनका विशेष महत्व है। यहाँ का एक चित्र समूह 'अर्जुन की तपस्या' शीर्षक से प्रसिद्ध है। इसमें एक संन्यासी को तपस्या की मुद्रा में लीन दिखाया गया है, जिसके सामने चतुर्मुखी शिव खड़े हैं। चंद्रमा, सूर्य, अप्सराओं, गायकों आदि को इनकी ओर बढ़ते हुए दिखाया गया है। कुछ इतिहासकार इस दृश्य को भगीरथ एवं गंगावतरण की कथा से संबद्ध करते हैं।


एक अन्य रिलीफ चित्र दो विशाल हाथियों के हैं,

जिसे 'अर्जुन की तपस्या' नामक चित्रसमूह के निकट ही एक चट्टान पर उत्कीर्ण किया गया है। इसी प्रकार समुद्रतट मंदिर के निकट एक अन्य विशाल चट्टान पर दुर्गा की अष्टभुजी प्रतिमा, द्वारपाल तथा नारी की आकृतियाँ उत्कीर्ण हैं। पर्सी ब्राउन के अनुसार, "महाबलिपुरम की मूर्तिकला में एक मर्मस्पर्शी संवेगात्मक गुण विद्यमान है। यहाँ के रिलीफ चित्रों में उल्लेखनीय संयम तथा सादगी के दर्शन होते हैं।" महाबलिपुरम से यह मूर्ति-शिल्प अपने समस्त गुणों के साथ दक्षिण-पूर्व एशिया के कई प्रदेशों में पहुँचा। 4.1.9.2. संगीत एवं नाटक


पल्लव राजाओं ने संगीत और नाटक के प्रति अपनी रुचि दिखाई। इतिहासकारों की मान्यता है। कि पल्लवों की राजसभा में भास और शूद्रक के नाटकों का नियमित रूप से मंचन होता था।

संगीत के प्रति उनकी अभिरुचि का ज्ञान नरसिंहवर्मन द्वितीय की उपाधियों से होता है, जिसने वाद्यविहार एवं वीणानारद जैसी उपाधियाँ धारण की थीं।


महेंद्रवर्मन प्रथम की एक उपाधि चित्र कारप्पुलि थी। इससे संकेत मिलता है कि उसके समय में चित्रकला को राजकीय संरक्षण प्राप्त था। उसने चित्रकला पर 'दक्षिण चित्र' नामक एक ग्रंथ की रचना भी की थी। 4.1.9.3. शिक्षा एवं साहित्य


पल्लवों का शासनकाल साहित्यिक उन्नति का काल था। पल्लव राजाओं ने अनेक विद्वानों को संरक्षण दिया था। उदाहरणार्थ, सिंहविष्णु संस्कृत कवि भारवि का संरक्षक था,

जिसने किरातार्जुनीयम् की रचना की। इसी प्रकार, प्रसिद्ध कवि दंडी जिन्होंने दशकुमारचरित एवं काव्यादर्श की रचना की, नरसिंहवर्मन द्वितीय की राजसभा में थे। नंदिवर्मन द्वितीय भी साहित्य एवं संस्कृति का संरक्षक था। उसने प्रसिद्ध तमिल कवि पेरूदेवनार को आश्रय दिया था, जिन्होंने 'भारतवेणवा' की रचना की थी। स्वयं महेंद्रवर्मन - प्रथम ने मत्तविलास प्रहसन नामक ग्रंथ की रचना की थी, जिसमें उसने कापालिक और बौद्ध भिक्षुओं को उपहास का विषय बनाया। कुछ इतिहासकारों का मत है कि भगवदज्जुकीय' नामक प्रहसन की रचना भी महेंद्रवर्मन ने ही की।


पल्लवों के समय उनकी राजधानी, कांची दक्षिण भारत में शिक्षा एवं संस्कृति का एक प्रमुख केंद्र थी। यहाँ प्रख्यात बौद्ध विद्वान दिड् नाग अपनी बौद्धिक एवं आध्यात्मिक प्यास बुझाने आया था। मयूराशर्मन,

जिसने कदंब राजवंश की स्थापना की, ने कांची में ही अपना वैदिक अध्ययन पूरा किया था। प्रख्यात बौद्ध विद्वान धर्मपाल भी कांची का था, पर इन सबसे बढ़कर, कांची का महत्व इस बात में है कि भक्ति आंदोलन, जिसने संपूर्ण दक्षिण भारत में अपना प्रभाव स्थापित किया, का उद्गम स्थल कांची ही था। संत अप्पार एवं तिरुज्ञान संबंदर के प्रयासों से बौद्ध धर्म एवं जैन धर्म का दक्षिण भारत में धीरेधीरे पतन हो गया और शैव धर्म को पुनः लोकप्रियता मिली। कई पल्लव राजा शिव के उपासक थे, किंतु उन्होंने वैष्णव धर्म के प्रति सहिष्णुता की नीति अपनाई और वैष्णव धर्म आलवार संतों के प्रयासों से खूब फला-फूला। इस प्रकार कह सकते हैं कि कांची ने दक्षिण भारत के धार्मिक जीवन में एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा की।