दक्षिणापथ का अभियान - Dakshinapatha campaign

दक्षिणापथ का अभियान - Dakshinapatha campaign


आर्यावर्त के प्रथम अभियान की सफलता के पश्चात् समुद्रगुप्त ने दक्षिण भारत का अभियान किया तथा 12 राज्यों पर विजय प्राप्त की। समुद्रगुप्त द्वारा पराजित राज्य निम्नलिखित थे- 


01. कोसल कोसल का राजा महेंद्र था। इस राज्य के अंतर्गत आधुनिक मध्यप्रदेश के बिलासपुर, रायपुर सम्भलपुर जिले थे।


02. महाकांतर यहाँ का शासक व्याघ्रराज था। यह राज्य मध्य प्रदेश का वन्य प्रदेश था।


03. कोराड - कोराड का शासक मंटराज था। यह राज्य उड़ीसा व मद्रास के मध्य में कहीं स्थित था।


04. पिष्टपुर पिष्टपुर का राजा महेंद्रगिरि था। यह राज्य गोदावरी जिले में स्थित था।


05. कोट्टु र कोडर का राजा स्वामिदत्त था। स्वामिदत्त का राज्य गंजाम जिले में कोठूर नामक स्थान पर स्थित था।


06. एरंडपल्लक- यहाँ का शासक दमन था। एरंडपल्लक राज्य की स्थिति के विषय में विद्वानों में


मतभेद है। संभवत: यह उड़ीसा के समुद्र तट पर स्थित एरंडपल्ली नामक स्थान पर स्थित था।


07. कांची- कांची का शासक विष्णुगोप था जो पल्लव-वंशीय था। यह राज्य आधुनिक कांजीवरम् नामक स्थान पर स्थित था।


08. अवमुक्तक- यहाँ का शासक नीलराज था। इसकी राजधानी गोदावरी के निकट पिथुडा थी।


09. वेंगी - वेंगी का शासक हस्तिवर्मन था। यह राज्य मद्रास के कृष्णा जिले में स्थित था।


10. पालक्क- पालक्क में उग्रसेन राज्य कर रहा था। यह राज्य गोदावरी नदी के तट पर पालकोल्लू


नामक स्थान पर स्थित रहा होगा।


11. देवराष्ट्र- इस राज्य में कुबेर शासन कर रहा था। यह राज्य विशाखापट्टनम के समीप एलमंचि नामक स्थान पर था। 


12. कोस्थलपुर - यहाँ का शासक धनंजय था। यह राज्य आरकट में स्थित कुट्टलुर नामक स्थान पर था।


विजित राज्यों के प्रति नीति


समुद्रगुप्त ने दक्षिण के इन राज्यों के प्रति नीति निर्धारित करने में एक कुशल कूटनीतिज्ञ होने का परिचय दिया।

समुद्रगुप्त अपने साधनों व सामर्थ्य को भली-भाँति समझता था, वह जानता था कि इन दूरस्थ प्रदेशों पर स्थायी रूप से राज्य करना संभव न होगा। अतः समुद्रगुप्त के दक्षिणी अभियान का उद्देश्य वहाँ के राज्यों को उन्मूलित कर गुप्त साम्राज्य में मिलाना न था। प्रयाग प्रशस्ति से ज्ञात होता है कि दक्षिण के राजाओं से समुद्रगुप्त केवल अपना प्रभुत्व स्वीकार कराना चाहता था। अतः समुद्रगुप्त ने सभी राजाओं को बंदी बनाने के पश्चात् अपने-अपने राज्य का शासन करने के लिए पुनः मुक्त कर दिया (सर्वदक्षिणापथ राज-ग्रहण मोक्षानुग्रह) और समुद्रगुप्त उनसे भेंट व राजस्व आदि लेकर संतुष्ट हो गया। इस प्रकार दक्षिणापथ के प्रति समुद्रगुप्त ने 'धर्मविजय' की नीति का पालन किया, उसका यह कार्य निःसंदेह उसकी राजनीतिक महत्ता का परिचायक है।