दलित महिलाओं की इतिहास में अदृश्यता - Dalit women's invisibility in history
दलित महिलाओं की इतिहास में अदृश्यता - Dalit women's invisibility in history
दलितों और महिलाओं का अपना कोई इतिहास नहीं होता। महिलाएं सिर्फ अपने स्वामी के प्रति समर्पित होती हैं। इसी तरह दलितों का इतिहास प्रताड़ना से भरा है। इनका काम सिर्फ मालिकों की सेवा तक सिमट कर रह गया है। इन्हें बराबरी का अवसर नहीं मिल पाया है। इसका मुख्य कारण राजनीति है। राजनीति में सिर्फ सत्ता की लड़ाई होती है। इसका शिकार सबसे ज्यादा दलित वर्ग ही हुआ है। सत्ता का एक ही प्रकृति है। आदिवासियों के इतिहास में यातना और संघर्ष शामिल है। आदिवासियों ने अंग्रेजों और सूदखोरों के खिलाफ संघर्ष किया। भारतीय समाज की सबसे निचली सीढ़ी पर खड़ी दलित स्त्री ने समाज की वर्जनाओं निषेधाज्ञाओं को लांघते हुऐ ब्राह्मणवादी व्यवस्था केमुख्य आधार स्तम्भ;
पितृसत्ता, धर्म और जातीयता को हमेशा कड़ी टक्कर दी है। चाहें वह चिन्तन का क्षेत्र हो अथवा संघर्ष का, दोनो स्तरों पर उसने अपने अस्तित्व व अस्मिता की लड़ाई को प्राचीन काल से लेकर आज तक जारी रखा है। आधुनिक महिला आंदोलन की शुरूआत 18वीं शताब्दी से मानी जाती है परंतु दलित महिला आंदोलन की शुरूआत हम बौद्धकाल से ही मानते है। दलित महिला आंदलनों महज 200 साल पुराना न होकर सदियों पुराना है, जिसमें सर्वप्रथम बौद्धकाल में दलित वर्ग की, थेरी सुमंगला और पूर्णिमा दास के द्वारा लिखी गई कविताओं को, हम दलित नारीवाद की प्रथम सशक्त अभिव्यक्ति मानते हैं। सुमगला उन्मुक्त स्वर में अपने द्वारा,
अपने आप को पा लेने की घोषणा करते हुए यानि अपने अस्तित्व को पहचाने की एक लंबी कष्टदायक प्रक्रिया से गुजरते हुए, एक उन्मुक्त और स्वतंत्र स्त्री की तरह अभिव्यक्त करते हुए गा उठती है। पति की मार से त्रस्त सुमंगला मुक्ति का मार्ग ढूंढ लेती है तो दलित स्त्रियों के जीवन के दमघोटू और शोषणकारी पलों को दासी पूर्णिमा ने बड़ी सशक्त अभिव्यक्ति दी है।
विभिन्न सामाजिक, राजनैतिक आंदोलनों में भी इसी पूर्वाग्रहों चलते उनकी हिस्सेदारी व नेतृत्व की तो बात दूर है उनका नाम तक का वर्णन नहीं मिलता है। इसी वजह से दलित संत कवयित्रियों के साथ-साथ दलित महिला आंदलनों की नेत्रियों और कार्यकर्ताओं की भी किसी भी इतिहास में चाहे वह दलित इतिहास हो या गैरदलित दोनो में,
उपस्थिति शून्य दिखाई जाती है। दलित महिला आंदलनों और लेखन की एक लंबी परंपरा रही है, अब साक्ष्यों का भी अभाव नहीं है, आज दलित महिलाएं बड़ी शिद्धत और प्रतिबद्धता से अपने अस्तित्व और अस्मिता के सवालों से जूझने के साथ उन्हें उठा ही नहीं रही बल्कि उन पर विमर्श भी चला रही है। दलित महिला आंदलनों के अपने आदर्श रहे हैं, सावित्रीबाई फुले से लेकर रमाबाई अंबेडकर और अन्य दलित महिला नेता आज भी हम दलित गैरदलित महिला आंदलनों पर चर्चा करते समय विदेशी विचारकों की तरफ मुंह उठाकर देखना बंद नहीं करते जबकि भारत में एक से एक दलित व गैर दलित महिला विचारक रही हैं। क्या हम तारा बाई शिंदे,
पंडिता रमाबाई ओर सावित्रीबाई फुले को भूल गए जिन्होंने विपरीत सामाजिक और स्त्री विराधी परिस्थितियों में काम ही नहीं किया अपितु स्त्रियों के पक्ष में भी परिस्थितियां बनाने भरपूर कोशिश की। सावित्रीबाई फुले का दलित- गैरदलित महिलाओं के लिए विद्यालय खोलना, विधवा आश्रम चलाना अपने आप में क्रांतिकारी उपलब्धियां है। हम नारी आंदलनों की शुरूआत 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध से मानते है जबकि दलित महिला आदलनों भारत में बहुत पुराना है। दलित फेमनिस्ट मूवमेंट की शुरूआत हम बौद्धकाल से ही मानते है। आज भी भारतीय महिला आंदलनों की उच्चवर्गीय व उच्चवर्णीय अगुवा महिला नेता,
दलित महिला आदलनों के नेता व उनके 'आईडियल को संपूर्ण नारीवादी आंदोलन का आईडियल मानने को तैयार नही हैं। दलित महिला आंदलनों की खासियत है कि वह अपने मुक्ति के सवाल को सामाजिक और आर्थिक प्रश्न से जोड़कर देखता है। दलित महिला आंदलनों के लिए घरेलू हिंसा के साथ-साथ सामाजिक हिंसा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है क्योंकि दलित महिलाएं रोज-रोज गांवों-शहरों में फैक्ट्रियों- खेतों में दलित स्त्री होने के कारण अपमान शोषण और अत्याचार की शिकार होती है। दुख की बात है कि इस सामाजिक हिंसा के सवाल को महिला आंदलनों उस प्रतिबद्धता के साथ नहीं उठाता जितना कि घरेलू हिंसा को ।
दांडी यात्रा में गांधी जी के हजारों संख्या में दलित महिलाओं ने भागीदारी निभाई।
नमक सत्याग्रह में 80,000 लोग गिरफ्तार किए गए जिनमें 17,000 महिलाएं थी जिनमें सर्वाधिक संख्या दलित व गरीब महिलाओं की थी। देश की आजादी के लिए अपने प्राण न्यौछावर करने वालो में झलकारी बाई, उदादेवी पासी, रानी अवन्तीबाई लोधी, वीरांगना महावीरी देवी, सिनगी दई, कइली दई, फूलों, झानों, रानी गुडियालों देवमनी उर्फ बंधनी, राजस्थान की वीर बाला काली बाई आदि अनेक नाम मिल जायेगे। जिन्होने अकेले अकेले कई-2 मोर्चों पर संघर्ष किया। पर आज भी आजादी की लड़ाई में उन्ही शिक्षित सभ्य और ऊँचे घरानों की महिलाओं के नाम ही गिनाएं जाते हैं जो समाज, घर व अपने परिवार की अच्छी सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक हैसियत होने के कारण जुड़ी थी। दूसरी ओर हन हैसियत से वंचित दलित वंचित गरीब समुदाय की इन औरतों को याद भी नहीं किया जाता है। यह पूर्वाग्रह साहित्य से लेकर समाज में गहरे तक व्याप्त है।
'डॉ अंबेडकर का समय दलित महिलाओं की अपनी व समाज की स्वतंत्रता समानता को लेकर की गई सक्रिय भागीदारी का स्वर्ण काल है। परंतु दुःख इस बात का है कि अंबेडकर कालीन 30-40 साल चले दलित आंदलनों में इस आंदलनों में लाखो लाख शिक्षित-अशिक्षित घरेलू गरीब मजदूर किसान व दलित शोषित महिलाएं जुड़ीं। केवल वे दलित आंदलनों में ही नहीं जुड़ी अपितु उन्होंने अलग से दलित महिला संगठनों की स्थापना भी की। 25 दिसम्बर 1927 को चावदार तालाब के महाड़ सत्याग्रह में ढाई हजार दलित औरतो ने भाग लिया। 12 अक्टूबर 1929 को डॉ अंबेडकर और दलित महिला नेता तानुबाई के नेतृत्व में हजारों महिलाओं ने पूना के पार्वतीबाई के मंदिर में प्रवेश करते हुए लाठी-डंडे खाये। नासिक के कालाराम मंदिर प्रवेश के दौरान एक पुजारी द्वारा दलित महिलाओं को धक्का मारने पर एक दलित महिला ने पुजारी के मुंह पर सनसनाता थप्पड़ जड़ दिया था।
इस आंदलन को संबोधित करते हुए राधाबाई बडाले नामक सत्याग्रही ने अपने ओजस्वी भाषण में कहा- हमें मंदिरों मे जाने का पनघट से पानी पीने का, भरने का अधिकर मिलना चाहिए यह हमारा सामाजिक हक है। शासन करने का राजनैतिक अधिकार भी हमें मिलना चाहिए। हम कठोर सजा की चिंता नहीं करतीं। हम देश भर की जेलों को भर देंगे। हम लाठी गोली खाएंगे। हमें हमारा हक चाहिए योद्धा कभी अपनी जान की चिंता नहीं करता।
गुलामी के साथ मिल कर जी गई जिंदगी से मौत बेहतर है। हम जान दे देगें मगर अधिकर छीन कर रहेगें। दलित महिला आंदलनों अस्पृष्यता, लिंगभेद,
असमानता के खिलाफ लड़ता हुआ दलित महिलाओं को स्कूल, कालेज हॉस्टल खोलने के साथ पत्र-पत्रिकाओं में लिखने की प्रेरणा देता रहा। इस आदलनों में कौशल्या बैसन्त्री, बेबीताई कांबले, सुलोचना डोगरे, सीताबाई गायकवाड़, तानुबाई काबले, राधाबाई बराले और भी अनेक दलित नेत्रियां थी, जिनके नामों को अगर मैं गिनाने लगूं तो सूची- बहुत लंबी हो जायेगी। यहां यह सवाल भी महत्वपूर्ण है कि अंबेडकर के समय चला दलित महिला आंदलनों 56 के बाद एकदम रूका क्यों नजर आने लगा? वह वास्तव में रूका था या दलित आंदलनों की कमी थी जो वह दलित महिलाओं के आंदलनों व उनके मुद्दों को उचित जगह नहीं दे पाया। बाबा साहब के साथ आंदोलन में इतनी बड़ी संख्या मे जुड़ी दलित महिलाएं उनके परिनिर्वाण के बाद एकाएक घरों में क्यों लौट गई?
इसमें कोई शक नही की दलित आंदोलन भी अन्य आंदोलनों की तरह दलित स्त्री को बराबरी की हिस्सेदारी देने में नाकाम रहा।
इस चौतरफा शोषण के खिलाफ लड़ने के साथ-साथ उसे अन्य महिला समूहों व विचारधाराओं के अलावा उसको अपने समाज परिवार की मुक्ति के साथ खुद की मुक्ति और बराबरी की भी लड़ाई लड़नी है। इन सबके बीच वह कैसे इन सब मुद्दों पर अपना तालमेल बैठायेगी, यह भी चिंतन का विषय है। आज दलित महिलाओं से जुड़े मुद्दे चाहे वह महिला रिर्जवेशन का मुद्दा हो या कोई अन्य स्त्री मुद्दा,
इनके नाम पर उसे अन्य महिला संगठनों द्वारा उसे बार-बार कहा जाता है कि जाति के नाम पर महिला आदलनों को दो हिस्सों में मत बांटों या फिर एक बार महिला आरक्षण बिल पास होने दो तब बात करेंगे। यही बात जब वह अपने घर परिवार के जाति भाईयों से कहती है तो उसका यह कहकर मजाक उड़ा दिया जाता है कि बड़ी-बड़ी गुलामियों को छोटी-छोटी आजादियों से मत तोलो" या व्यंग्य में “इतनी छोटी कहां है मेरी आजादी कि तुम्हें और तुम्हारे जैसों को पूरी जगह ना हो तो मेरा मानना है दलित स्त्रियों के चिंतन और संघर्ष की अत्यंत कठिन है, पर वह लड़ रही है और लड़ती रहेगी। और अंत में निर्मला पुतुल की कविता के साथ दलित-आदिवासी महिलाओं का एक सशक्त वक्तव्य जिसके लिए वे हरदम तैयार रहेगी।
वार्तालाप में शामिल हों