गुप्तकालीन अर्थव्यवस्था - Economy of Guptas
गुप्तकालीन अर्थव्यवस्था - Economy of Guptas
गुप्तकालीन मुद्राएँ व अभिलेख तत्युगीन आर्थिक समृद्धि व संपन्नता को प्रमाणित करते हैं। कृषि, उद्योग-धंधे एवं व्यापार गुप्तकालीन अर्थव्यवस्था के प्रमुख आधार थे।
कृषि (Agriculture)- कृषि गुप्तकालीन अर्थव्यवस्था का प्रमुख आधार थी। राजा समस्त भूमि की माप करवाता था तथा उसे टुकड़ों में बँटवाता था। भूमि की सीमा निर्धारित की जाती थी। धान एवं ईख की खेती प्रमुख रूप से होती थी। इनके साथ-साथ गेहूँ, जूट, तिलहन, कपास, ज्वार, बाजरा, मसाले, धूप, नील आदि भी प्रचुर मात्रा में उत्पन्न होते थे।
राजा की ओर से सिंचाई की पर्याप्त व्यवस्था की जाती थी। कृषि की वृद्धि के लिए कुएँ, तालाब एवं नहरों का निर्माण किया जाता था। सुदर्शन झील का बाँध टूटने पर स्कंदगुप्त के सौराष्ट्र प्रांत के गवर्नर पर्णदत्त के पुत्र चक्रपालित ने इसकी मरम्मत कराई थी। इससे पता चलता है कि राज्य सिंचाई की पर्याप्त व्यवस्था करता था। दामोदरपुर ताम्रपत्रों से ज्ञात होता है कि भूमि दान में दी जाती थी।
राजा ने कृषि संबंधी कार्यों के लिए विभिन्न पदाधिकारी नियुक्त किए थे। भूमि का मानचित्र तैयार करके अभिलेख सुरक्षित रखे जाते थे।
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तीन वर्ष तक कर न देने वाले व्यक्ति को भूमि से वंचित कर दिया जाता था और राज्यसभा को अधिकार प्राप्त था कि वह इस प्रकार की भूमि का विक्रय करे।
गुप्तकाल में भूमि विक्रय काफी सावधानीपूर्वक किया जाता था। भूमि क्रेता को संबंधित विषयपति के यहाँ इस हेतु आवेदन करना पड़ता था। पुस्तपाल इस आवेदन को शासक के पास भेजता था। राजा महातार द्वारा उस भूमि का निरीक्षण कराता था। नगर सीमा में नगराधिकारी एवं ग्राम सीमा में ग्राम अधिकारी यह कार्य संपादित करते थे। उक्त संपूर्ण विवरण ताम्रपत्र पर लिखा जाता था। भूमि का प्रकार एवं भूमि सीमा का निर्धारण भी ताम्रपत्र पर अंकित होता था, साथ ही भूमि का मूल्य भी अंकित करना आवश्यक था।
कुल्य, द्रोण एवं पाटक प्रमुख माप उस समय प्रचलित थे। कुल्य आठ द्रोण के बराबर होता था। विक्रय भूमि पर कुछ सरकारी नियम होते थे-
नवी धर्म- इसमें भूमि विक्रय का अधिकार निवेदक को नहीं होता था। इसे अक्षयनीवी भी कहते हैं। अदायिक- मृत व्यक्ति की भूमि का मालिक राजा होता था।
गुप्त निधि- भूमि के नीचे गड़ी गुप्त निधि राजकीय संपत्ति होती थी।
अग्रहार- मंदिरों एवं ब्राह्मणों को दी जाने वाली भूमि। यह कर मुक्त होती थी। इसका विक्रय नहीं किया जा सकता था, इसे भूमि छिद्र न्याय' भी कहा जाता था। अतः ये लोग आगे चलकर भू-स्वामी हो गए एवं काफी समृद्ध हुए।
उद्योग धंधे - कृषि के साथ-साथ उद्योग-धंधे भी उन्नति पर थे। कपड़ा निर्यात सर्वप्रमुख उद्योग था। इसके अतिरिक्त हाथी दाँत की वस्तुएँ बनाना, मूर्तिकारी, चित्रकारी, शिल्प कार्य, मिट्टी के बर्तन बनाना, जहाज निर्माण आदि अन्य उद्योग-धंधे प्रचलित थे।
व्यवसाय एवं उद्योगों का संचालन श्रेणियाँ करती थीं। श्रेणी (Guild) एक ही प्रकार के व्यवसाय तथा शिल्प वालों की समिति होती थी।
श्रेणियों के अपने नियम एवं न्यायालय होते थे, जिन्हें राज्य की मान्यता प्राप्त थी। श्रेणियाँ बैंक का कार्य भी करती थीं। प्रत्येक श्रेणी का एक प्रधान तथा चार या पाँच व्यक्तियों की एक कार्यकारिणी होती थी। श्रेणियाँ एक तरह से स्वायत्तशासी संस्थाएँ थीं। प्रत्येक श्रेणी के पास अपनी एक मुहर होती थी। वैशाली से एक संयुक्त श्रेणी की 274 मुद्राएँ प्राप्त हुई हैं। श्रेणियाँ काफी संपन्न होती थीं। ‘मंदसौर अभिलेख से मालूम होता है कि दशपुर में जुलाहों की एक श्रेणी थी, जिसने सूर्य मंदिर की स्थापना की थी। इंद्रपुर (इंदौर) ताम्रपत्र में भी एक तैलिक श्रेणी का उल्लेख मिलता है।
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