नारीवादी इतिहास लेखन एवं प्रमुख इतिहासकार - Feminist Historiography and Prominent Historians
नारीवादी इतिहास लेखन एवं प्रमुख इतिहासकार - Feminist Historiography and Prominent Historians
हर कालखंड में स्त्रियों का इतिहास विद्यमान है बस आवश्यकता इतिहास के पन्नों से बाहर निकाल कर लाने की है। जो छूट गया है उसे पुनः प्रकट करने की आवश्यकता है। फ्रांस की क्रांति के बाद गणराज्य की स्थापना और फिर उसके कुछ समय बाद से मताधिकार को लेकर उठे स्वर से अब तक के समय में एक लंबा सफर रहा है महिलाओं का। फिर भी इतिहास में उनकी अदृश्यता काफी चिंतनीय है। अब वक़्त आ गया है की इतिहास में जेंडर को परिभाषित किया जाए तथा इतिहास का लेखन जेंडर के आधार पर किया जाए।
जिसमें समाज के हर तबके की भागीदारी हो । अधिकत्तर इतिहासकारो ने आंदोलनों में महिलाओं की भागीदारी को नारी-शिक्षा या समाज सुधार आंदोलनों से जोड़ने के लिए सिर्फ संभ्रांत वर्ग की महिलाओं का जिक्र किया या फिर वैसी महिलाओं का जिक्र किया जिनहोने पुरुषवादी समाज को चुनौती दी। सिमोन द बोउवार ने कहा है कि साहित्य, संस्कृति, इतिहास व परंपराएं पुरुषों ने बनाए हैं और पुरुषों ने अपने बनाए इस विधान में स्त्रियों को सर्वत्र दोयम दर्जा दिया है। इसलिए अब समय आ गया है की हम इतिहास का पुनर्पाठ करें। एक ऐसा मुक्कमल इतिहास जिसमे सबका जिक्र हो। उसे हम इतिहास के नाम से जाने और समझें।
जिस प्रकार महिलाओं को एक अलग वर्ग के रूप में इतिहास में दर्शाया जाता रहा है अब उसे समाप्त करके जेंडर के आधार पर इतिहास लेखन होना चाहिए तब जाकर इतिहास में महिलाओं की वो पहचान सामने आ पाएगी जिसके लिए उन्होंने बलिदान दिया है। अब यह आवश्यक हो गया है की हम उन्हे उनके सही अधिकार को उन्हें लौटाएँ और उनकी भूमिकाओं को तथा उनके योगदान को सही मायनों में दस्तावेजीकरण किया जाए। इसमें वक़्त लगेगा परंतु इसे करने का पीड़ा भी उन्हीं लोगों को उठानी पड़ेगी जिन्होंने पहले इसपर विचार नहीं किया। इससे न केवल महीलाओं का इतिहास सामने आएगा बल्कि हमारे अतीत की सही समझ भी विकसित होगी जो हमे नयी दृष्टि भी प्रदान करेगी।
इससे समाज में पहले से व्याप्त कई मिथक टूटेंगे कई सारी नई विचारधाराओं का भी जन्म होगा। यह न केवल सैद्धांतिक दृष्टिकोण से बल्कि साम्राज्यवादी अध्ययन के लिए भी फलदायी साबित होगा। उदाहरण के तौर पर अब तक ऐसा देखा जाता है की समाज में जो हमारी सोच है महीलाओं के प्रति वो ऐसी रही है की अब तक उनके बारे में यही बातें की जाती रहीं हैं कि क्या पहना जाए, कैसे रहा जाए, क्या किया जाए। कभी यह नहीं बताया गया की इतिहास में महीलाओं ने क्या पहना क्या किया कैसे किया कैसे उन्होने चुनौतियों का सामना किया कैसे औपनिवेशिक काल में उन्होंने अपना योगदान दिया और कैसे समाज के परिवर्तन में अपनी हिस्सेदारी से उस परिवर्तन को अंजाम दिया।
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