विदेशी राज्य - foreign state

विदेशी राज्य - foreign state


हरिषेण ने प्रयाग प्रशस्ति में कुछ विदेशी शक्तियों का उल्लेख किया है जिन्होंने समुद्रगुप्त को आत्मसमर्पण करना (आत्म निवेदन), कन्याओं का उपहार देना तथा गरूड़ मुद्रा (गुप्तों की राजकीय मुद्रा) से अंकित उसके आदेशों को अपने-अपने शासन क्षेत्रों में प्रचलित करना स्वीकार किया। अतः स्पष्ट है कि उपर्युक्त विदेशी राज्यों ने समुद्रगुप्त के साथ मैत्री संबंध स्थापित किया था। समुद्रगुप्त से मैत्री स्थापित करने वाले विदेशी राज्य निम्नलिखित थे :


(1) देवपुत्र -पाहि पाहानुषाहि यद्यपि इनके विषय में विद्वानों में अत्यधिक मतभेद है किंतु इनका


तात्पर्य उत्तरी कुषाणों से प्रतीत होता है जो उत्तर-पश्चिम भारत में शासन कर रहे थे।


(2) शक एलन का विचार है कि ये उत्तरी भारत के शक थे क्योंकि पश्चिम भारत के शकों का


विनाश चंद्रगुप्त द्वितीय ने किया था न कि समुदगुप्त ने । (3) मुरूण्ड हेमचंद्र के अभिधानचिंतामणि नामक ग्रंथ के अनुसार मुरूण्ड लम्पाक


(अफगानिस्तान) में शासन करते थे।


(4) सिंहल सिंहल द्वीप का अर्थ लंका से था। चीनी लेखों के अनुसार समुद्रगुप्त व लंका के तत्कालीन शासक मेघवर्मन के पारस्परिक संबंधों पर प्रकाश पड़ता है।

वांगहुएन-त्से नामक एक चीनी लेखक के अनुसार मेघवर्मन ने अपना दूत भेजकर समुद्रगुप्त को बहुमूल्य उपहार भेंट किए थे तथा बोधगया में एक मठ का निर्माण कराया था, जिसमें महात्मा बुद्ध की रत्नजड़ित मूर्ति स्थापित की गई थी।


(5) सर्वद्वीपवासी प्रयाग प्रशस्ति के अनुसार सिंहल के अतिरिक्त अन्य सभी द्वीपवासियों ने भी समुद्रगुप्त को उपहार भेंट किए। ये समस्त द्वीप संभवत: दक्षिण-पूर्वी एशिया के थे।


अश्वमेध यज्ञ


दिग्विजय के पश्चात् समुद्रगुप्त ने एक अश्वमेध यज्ञ भी किया था।

इस अवसर पर उसने एक विशेष प्रकार की स्वर्ण-मुद्राओं को प्रचलित किया जिनके एक ओर घोड़े की आकृति उत्कीर्ण है तथा उसके नीचे 'अश्वमेध पराक्रम:' ( अश्वमेध के योग्य पराक्रम वाला) लिखा है तथा मुद्रा के दूसरी ओर * राजाधिराजः पृथिवीमवजित्य दिवं जयति अप्रतिवार्य वीर्यः (राजाधिराज पृथ्वी को जीतकर अब स्वर्ग की जय कर रहा है, उसकी शक्ति और तेज अप्रतिम है) अंकित है।


साम्राज्य विस्तार


समुद्रगुप्त ने अपनी अनेकानेक विजय से एक विशाल साम्राज्य की स्थापना की। समुद्रगुप्त ने उत्तराधिकार में एक छोटा-सा राज्य अपने पिता से प्राप्त किया था,

किंतु अपने पुत्र के लिए उसने एक विशाल साम्राज्य छोड़ा। समुद्रगुप्त के साम्राज्य में लगभग संपूर्ण उत्तर भारत, छत्तीसगढ़ व उड़ीसा के पठार तथा पूर्वी तट के अनेक प्रदेश सम्मिलित थे। इस प्रकार उसका साम्राज्य पूर्व में ब्रह्मपुत्र, दक्षिण में नर्मदा तथा उत्तर में कश्मीर की तलहटी तक विस्तृत था। उत्तर भारत के एक बड़े भू-भाग पर समुद्र गुप्त स्वयं शासन करता था। स्वशासित प्रदेश के उत्तर व पूर्व में पाँच तथा पश्चिम में नौ गणराज्य उसके करद राज्य थे। दक्षिण के बारह राज्यों की स्थिति भी इन्हीं के समान थी। इन करद राज्यों के अतिरिक्त अनेक विदेशी राज्य भी समुद्रगुप्त के प्रभाव क्षेत्र में थे।