भारत में सामंतवाद का विकास - Growth of Feudalism in India

 भारत में सामंतवाद का विकास - Growth of Feudalism in India


राजनैतिक स्वरूप


भारतीय सामंतवाद का प्रारंभ गुप्त सम्राटों के काल में हो चुका था। समुद्रगुप्त की प्रयाग प्रशस्ति से ज्ञात है कि उसकी दिग्विजय के सिलसिले में विजित अटावी राज्यों को परिचारकीकृत (सेवकाई करने); सीमांतों में विजित राज्यों और गणों को अपनी स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए सर्वकरदान (सभी प्रकार के करों को देने), आज्ञाकरण (सम्राट की आज्ञाओं का पालन करने) तथा प्रणामागमन (सम्राट के सामने उपस्थित होकर प्रणाम करने) और दैवपुत्रषाहिषाहानुषाहि शक (मुरूडों) तथा सिंहल आदि द्वीपों के निवासियों की आत्मनिवेदन (सम्राट के सामने अपने को उपस्थित करने) और कन्योपायन (अपनी कन्याओं को सम्राट अथवा उसके राजपरिवार के व्यक्तियों से ब्याहने) जैसी अनेक शर्तों को मानने के लिए विवश होना पड़ा।

इस प्रकार छोटे राजा दिग्विजयी से राजनैतिक अधीनता के सूचक अनेक संबंधों से बंधे होते थे और समय-समय पर सम्राट के प्रति उनके कई प्रकार के कर्तव्य होते थे। ये ही बाद में सामंत अथवा महासामंत कहलाए। कौटिलीय अर्थशास्त्र, अशोक के धर्मलेखों अथवा मनुस्मृति और याज्ञवल्क्यस्मृति जैसे धर्मशास्त्रग्रंथों में मूलतः सामंत का अर्थ पड़ोसी व्यक्ति अथवा स्वतंत्र पड़ोसी राज्य माना गया है। राजनैतिक अधीनस्थ के रूप में इस शब्द का प्रयोग पहली बार छठी शती के अनंतवर्मा नामक मौखरी राजा के एक अभिलेख में प्राप्त होता है। वहाँ उसके पिता को सामंतचूडामणि कहा गया है। बाणभट्ट ने हर्षचरित और कादम्बरी नामक अपने ग्रंथों में सामंतों के बहु प्रकारों की चर्चा करते हुए उनके हर्ष के राजदरबार में उपस्थित होने और बहुविध अभिवादन करने की चर्चा की है।

सम्राट के अधीनस्थ सामंत उसके दरबार में उपस्थित होकर उसकी सेवा और भक्ति तो करते ही थे, साथ ही रास्ते में पड़ने वाले सामंत विजय यात्राओं पर जाती हुई सम्राट की सेनाओं की अगवानी, आवभगत और आवश्यकतापूर्ति भी करते थे। धीरे-धीरे सामंतों का यह प्रधान कर्तव्य हो गया कि सम्राट की विजय यात्राओं में उसके शत्रुओं के विरुद्ध लड़ने के लिए भी वे अपनी सेना लेकर सन्नद्ध हो जाएँ। इस प्रकार के अनगिनत उदाहरण पाल, गुर्जर प्रतिहार, चंदेल, चाहमान, चालुक्य और परमार अभिलेखों से हमें प्राप्त होते हैं। 5वीं-6ठी शताब्दियों के बाद सामंतगण अपने अभिलेखों में अपने सम्राटों का भी उल्लेख करने लगते हैं, किंतु उल्लेखनीय है कि स्वयं सामंत भी अपनी राजधानी में अपनी राजगद्दी पर बड़ेबड़े चमर, पालकी और हाथी जैसी प्रतिष्ठासूचक वस्तुओं एवं सवारियों का प्रयोग कर सकते थे।

बड़े सामंतों को पंचमहाशब्द अथवा समधिगतपंचमहाशब्द की उपाधियाँ प्राप्त होती थीं। कल्याणी के चालुक्य राजा तृतीय सोमेश्वर कृत मानसोल्लास (1131 ई.) नामक ग्रंथ से इंगित होता है किपंचमहाशब्द विरुद धारण करने वाले सामंतों को शृंग तम्मट (अस्पष्ट), शंख, भेरी और जयघंटा नामक बाजाओं के बजाने की स्वतंत्रता प्राप्त थी। इस प्रकार सामंतों की अनेक कोटियाँ हो गई, जिनके आधार पर उन्हें राजा, महाराजा, राजराजानक, राणक, राजपुत्र, ठक्कुर, सामंत, नृप, महासामंत, महासामंताधिपति, महासामंतराणक और माण्डलिक जैसे विशेषण दिए जाने लगे।


सांस्कृतिक स्वरूप


सामंतवाद के राजनैतिक स्वरूप के अतिरिक्त उसका एक सांस्कृतिक स्वरूप भी था। गुप्तकाल के बाद छोटे-बड़े सभी राजे-महाराजे ब्राह्मणों,

धर्मसंस्थानों, मंदिरों तथा विहारों और संघारामों को भूमिदान देते समय दान की गई भूमि से राज्य को प्राप्त होने वाले करों जैसे सभी आर्थिक लाभों का भी दान कर देते थे तथा उनके शासन के संपूर्ण अधिकार दानग्रहीता को हस्तांतरित हो जाते थे। मौर्य युग अथवा उसके पूर्व भी भूमिदान किए जाते थे, किंतु उनमें कहीं भी राजा द्वारा अपने प्रशासनिक अथवा कर संबंधी अधिकारों और खनिज, वन्य एवं जलीय क्षेत्रों के छोड़ने का उल्लेख नहीं है। अतः इस युग वाले दानों का परिणाम यह हुआ कि सारे राज्य में दान दी गई भूमियों के ऐसे अनेक खंड प्रखंड बन गए, जहाँ से केंद्रीय प्रशासन समाप्त हो गया और उसके स्थान पर ब्राह्मणों अथवा देवस्थानों या धर्मस्थानों का प्रशासन प्रारंभ हो गया।

ऐसे दान प्राप्तकर्ताओं की संख्या लाखों में थी और वे सभी दान शाश्वत समय के लिए (जब तक सूर्य और चंद्र उगते और डूबते रहे किए जाते थे। दानकर्ता अपने उत्तराधिकारियों और बाद में होने वाले राजाओं से भी आशा करता था कि वे उन्हें बाधित नहीं करेंगे। ऐसी स्थिति में राजकीय प्रशासन से स्वतंत्र छोटे-छोटे प्रशासनों की ऐसी अनेक इकाइयाँ उत्पन्न हो गई, जो आर्थिक और प्रशासनिक दृष्टि से स्वतंत्र रूप में अपने पैरों पर खड़ी होने में समर्थ थीं। आगे चलकर कहीं-कहीं तो दान प्राप्तकर्ताओं को चोरों को दंडित करने के भी अधिकार प्राप्त हो गए। यद्यपि इस प्रकार के दान मुख्यतः ब्राह्मणों, पुजारियों, पुरोहितों और धर्मसंस्थानों को ही दिए जाते थे एवं राजकीय अधिकारियों अथवा सेना- कर्मचारियों को भी वेतन अथवा पारिश्रमिक स्वरूप भूमि दिए जाने के उदाहरण मिलते हैं।

इन सबका परिणाम यह हुआ कि साधारण कृषकों और केंद्रीय शासन के बीच एक ऐसे भौमिक जमींदार वर्ग का विकास होता गया, जो शासितों और शासकों के बीच मध्यमवर्ती अथवा दीवार का काम करने लगा। साधारण कर वसूली और प्रशासन के अतिरिक्त बेगार (विष्टि) लेने की भी उन्हें सुविधा थी। चूँकि इस प्रकार के दान अथवा भूमिप्रबंधों का अधिकार सामंतों अथवा दानप्राप्तकर्ताओं को भी था, इस प्रकार प्रशासन का शिथिलीकरण निरंतर बढ़ता गया।


प्रशासकीय स्वरूप


गुप्तकाल से गुप्तोत्तर काल तक केंद्रीय शासन के अथवा उसकी ओर से प्रशासन के विभिन्न पदों पर सामंतों के नियुक्त किए जाने के अनेक उल्लेख मिलते हैं। अनेक उच्चाधिकारी ऐसे भी होते थे,

जो वास्तव में सामंत न होते हुए भी सामंती पदवियाँ धारण करते थे। भोगपति भोगिक, उपरिक महाराज, सांधिविग्रहिक अथवा महासांधिविग्रहिक दण्डनायक अथवा महादण्डनायक, कुमारामात्य और अक्षपटलाधिकृत जैसे अनेक अधिकारियों के उल्लेख सामंत अथवा महासामंत मांडलिक अथवा महामांडलिक और महाराज जैसे विशेषणों से युक्त मिलते हैं। स्पष्ट है सामंतवाद की संस्थात्मक प्रवृत्तियों ने केंद्रीय प्रशासन से लेकर नीचे तक घर कर लिया था। इन अधिकारियों में अनेक ऐसे थे, जिन्हें राजकीय सेवाओं के बदले अंशतः या पूर्णतः भूमि और उससे प्राप्त होने वाली आय के रूप में पारिश्रमिक दिया जाता था।


उपरोक्त की तुलना फ्रांस जर्मनी अथवा इंग्लैंड में प्रचलित सामंती व्यवस्थाओं से नहीं की जा सकती। इन दोनों में मुख्य अंतर यह है

कि यूरोप की तरह भारतीय सामंतवाद सहायता करने और रक्षा करने की आवश्यकताओं अथवा पारस्परिक आदान-प्रदान संबंधों से उत्पन्न नहीं हुआ था। वास्तव में भारतीय सामंतवाद असुरक्षा और विदेशी आक्रमणों का परिणाम था। साथ ही यूरोपीय चर्चे की तरह भारत के मंदिरों और बौद्ध विहारों की भूमियों के दान प्राप्त तो हुए थे, किंतु उससे यहाँ के भिक्षु पंडित- पुजारी और ब्राह्मण वर्ग की शक्ति बहुत बढ़ी नहीं और न उनका राज्यों से कोई झगड़ा और संघर्ष ही हुआ। वास्तव में भारत का यह वर्ग यूरोपीय चर्चों की तरह संगठित नहीं था और यहाँ यूरोप के पोपों और सम्राटों के बीच होने वाले संघर्षों जैसी विषम स्थितियों की कोई संभावना ही नहीं थी, किंतु राजदरबार में उपस्थिति का दायित्व, अपने लाड अथवा अधिराजों से पद और प्रतिष्ठा की प्राप्ति तथा उनकी सैनिक सेवाएँ सामंतों के लिए दोनों ही जगह समान थीं।