गुप्तकाल : आर्थिक जीवन - Gupta Period: Economic Life
गुप्तकाल : आर्थिक जीवन - Gupta Period: Economic Life
गुप्तकालीन आय-व्यय
गुप्तकालीन अभिलेखों से साम्राज्य की आय के विभिन्न साधन ज्ञात होते हैं। नियमित रूप से भूमि का नाप और निरीक्षण करके, भूस्वामित्व के अधिकारों का विश्लेषण करके भूमिकर निर्दिष्ट किया जाता था। राज्य की आय का मुख्य आधार भूमिकर था।
उद्रंग
गुप्तकाल में मुख्य भूमिकर को 'उद्रंग' कहते थे। ब्यूहर का मत है कि उद्रंग राज्य के लिए प्राप्त किए जाने वाले भू उत्पादन के अंश को कहते थे। फ्लीट ने भी इस मत का समर्थन किया है। डॉक्टर घोषाल का मत है कि उद्रंग भूमि की उपज का 1/6 भाग होता था।
लेखों और स्मृतियों में भी यह स्पष्ट उल्लेख है कि राजा उपज का छठा भाग भूमिकर के रूप में लेता था। फरीदपुर के ताम्र अभिलेख से भी विदित होता है कि राजा धान्य (उपज) का छठा भाग ग्रहण करता था। भूमि की दशा और उसके उर्वरापन के अनुसार भूमिकर सोलह प्रतिशत से लेकर पच्चीस प्रतिशत अर्थात् छठे से चौथे भाग तक लगाया जाता था।
उपरिकर
उदंग कर के साथ-साथ उपरिकर का भी उल्लेख गुप्त अभिलेखों में प्राप्त होता है। फ्लीट का मत है कि उपरिकर उन कृषकों पर लगाए जाने वाला भूमिकर था, जिनका भूमि पर कोई स्वामित्व नहीं था।
घोषाल का भी कथन है कि उपरिकर ऐसा लगान या भूमिकर था, जिसे अस्थायी कृषक देते थे। स्थायी कृषक वे कृषक होते थे जिनको राज्य द्वारा भूमि, स्वामित्व के पूर्ण अधिकार के साथ उपभोग के लिए दी जाती थी। यह भूमि अनुर्वर होती थी, जिसे उपजाऊ खेत बनाने या चरागाह में परिवर्तित करने के लिए या ऐसे ही अन्य कार्यों के लिए दी जाती थी। इस प्रकार की प्राप्त भूमि को कृषक या उसके उत्तराधिकारी बेच अथवा हस्तांतरित कर सकते थे। इस प्रकार भूमि प्राप्त करना भूमि छिद्र धर्म प्रणाली के अंतर्गत माना जाता था। इस प्रकार से भूमि प्राप्त करने वाले कृषक स्थायी कृषक होते थे। भूमि पर उनका पूर्ण स्वामित्व होता था।
'नवी धर्म' के अनुसार भी भूमि दी जाती थी। इसमें भूमि प्राप्त करने वाला कृषक प्रदत्त भूमि की आय या उपज का उपयोग मात्र कर सकता था।
उपभोग का अधिकार उसे जीवनकाल तक ही प्राप्त होता था। राज्य को उस भूमि को वापस लेने का अधिकार था।
धनदेह ताम्रपत्र अभिलेख से ज्ञात होता है कि अप्रदा नीवी धर्म के अनुसार कृषक को जो भूमि प्राप्त होती थी, वह और उसके उत्तराधिकारी उस भूमि का उपयोग कर सकते थे और इस प्रकार दी गई भूमि को राज्य वापस नहीं ले सकता था। किंतु इसमें यह विशेषता है कि प्राप्तकर्ता कृषक को यह अधिकार नहीं था कि वह बिना राज्य की विशेष स्वीकृति के किसी दूसरे व्यक्ति को भूमि बेच दे या हस्तांतरित कर दे। गुप्त संवत् 224 के दामोदरपुर के ताम्रपत्र अभिलेख से यह बात ज्ञात होती है।
इस प्रकार 'नवी धर्म' और 'अप्रदा नीवी धर्म के अंतर्गत भूमि कृषकों को कुछ विशेष शर्तों के साथ दी जाती थी।
इस प्रकार भूमि प्राप्तकर्ता कृषकों को भूमि के स्वामित्व जैसा कोई अधिकार प्राप्त नहीं था। वे केवल उसके उत्पादन का ही उपभोग कर सकते थे। पर वे किसी दूसरे व्यक्ति को न तो भूमि बेच सकते थे और न हस्तांतरित कर सकते थे। इसलिए ये अस्थायी कृषक थे। राज्य ही उनकी भूमि का स्वामी था। इन अस्थायी कृषकों को जो भूमिकर देना पड़ता था उसे उपरिकर कहा जाता था। उद्रग और उपरिकर अनाज और नगद दोनों के रूप में कृषकों से लिए जाते थे। फाहियान ने भी अपने यात्रा विवरण में लिखा है कि "जो लोग राज भूमि को जोतते हैं उन्हें उससे उत्पन्न अनाज का एक अंश देना पड़ता है। "
भूतोवा
गुप्तकाल में भूमिकर के अतिरिक्त व्यापारिक वस्तुओं पर भी कर लगाया जाता था। इनमें से एक कर भूतोवात प्रत्याय था। डॉक्टर अल्तेकर का मत है, “भूतोवात प्रत्याय नामक कर राज्य में बनने वाली
वस्तुओं पर लगने वाला कर था। जहाँ वस्तु उत्पन्न होती थी, वहाँ यह कर लगाया जाता था।" यह मादक या नशीली वस्तुओं पर लगाया जाने वाला कर था। परंतु नशीली वस्तुओं पर नाम मात्र का कर लगाया जाता था, क्योंकि फाहियान के अनुसार इस युग में न तो मदिरा की दुकानें ही थीं और न कोई मद्यपान करता था। मंदिरा का क्रय विक्रय सीमित मात्रा में होता होगा। इसलिए नशीली वस्तुओं में राज्य को नाम मात्र की आय होती थी।
नगरीय शुल्क
गुप्तकाल में नगर में आने वाली वस्तुओं पर शुल्क वसूल किया जाता था। यह राज्य के भाग के रूप में वसूल किया जाता था। इस शुल्क को वसूल करने वाले अधिकारी को शुल्काध्यक्ष कहते थे।
शुल्काध्यक्ष का कार्यालय नगर के प्रवेश द्वार पर होता था और उसके ऊपर एक ऊँची पताका फहरती थी। यहीं पर नगर में प्रवेश करने के पूर्व व्यापारियों की वस्तुओं पर शुल्क वसूल किया जाता था । यदि कोई व्यापारी धोखा देकर बिना शुल्क दिए नगर में अपनी वस्तुओं को ले जाकर बेचता था, तो उसे निर्दिष्ट शुल्क का आठ गुना शुल्क दंड के रूप में देना पड़ता था। नगर के बाजारों में भी व्यापारिक वस्तुओं पर शुल्क वसूल करने के लिए राजपुरुष (राजकीय कर्मचारी) घूमते रहते थे। आय व्यय तथा लाभ का परीक्षण करके चुंगी या कर की मात्रा निर्दिष्ट की जाती थी। भिन्न-भिन्न वस्तुओं पर विभिन्न मात्रा का शुल्क था। रस, औषधि, शाक, चमड़ा, फल आदि पर शुल्क लिया जाता था।
प्रतिवेधनिक कर
गुप्तकाल में नगर के बाजारों में प्रयुक्त होने वाले नाप, माप और तौल को पूर्ण रूप से निरीक्षण कर उस पर शासकीय मुहर लगाकर प्रमाणित कर दिया जाता था। इसके लिए व्यापारियों और दुकानदारों को प्रतिवेधनिक नामक कर देना पड़ता था।
विक्रय कर
बाजार में व्यापारियों से विक्रय कर भी वसूल किया जाता था। विष्णुस्मृति में उल्लेख है कि तराजू पर तौलकर बेची जाने वाली वस्तु का बीसवाँ भाग विक्रय कर के रूप में और जो वस्तुएँ गिनकर बेची जाती थीं, उनका ग्यारहवाँ भाग विक्रय कर के रूप में व्यापारियों और दुकानदारों से वसूल किया जाता था। संभव है कि इस प्रकार के विक्रय कर की प्रथा गुप्तकाल में प्रचलित रही हो ।
कारुकर
गुप्तकाल में शिल्पियों से वसूल किए जाने वाले कर को कारुकर कहते थे। यह कर दो रूपों में वसूल किया जाता था— प्रथम विष्टि और द्वितीय द्रव्य के रूप में विष्टि एक प्रकार की बेगार थी। यह छोटे कारीगरों से ली जाती थी। सुतार (बढ़ई), कुम्हार, लुहार जैसे कारीगर विष्टि देते थे। मनुस्मृति में कहा गया है कि राजा छोटे कारीगरों से माह में एक बार सार्वजनिक कार्यों में विष्टि ले सकता था। राजा की ओर से ग्राम के शासक विष्टि का उपयोग सार्वजनिक कार्यों में जैसे कुएं, तालाब, मंदिर के निर्माण में करते थे। बड़े शिल्पी या कारीगरों से कारुकर द्रव्य के रूप में लिया जाता था। इन कारीगरों में सुनार, जुलाहे और मदिरा बनाने वाले होते थे।
सामयिक कर
गुप्तकाल में कुछ कर ऐसे थे जो नियमित नहीं थे, परंतु परिस्थितिवश समय समय पर लगाए जाते थे; जैसे चाट भाट प्रवेश कर पुलिस और सेना के सिपाही जितनी अवधि के लिए किसी विशेष स्थान पर जाते और वहाँ रखे जाते थे, उस अवधि में वहाँ के स्थानीय निवासियों को राज्य को कर देना पड़ता था। इसे चाट भाट प्रवेश कर कहते थे। यह कर उन सिपाहियों पर हुए व्यय के निमित्त होता था।
अर्थदंड
गुप्तकाल में अपराधी को अपराध करने पर न्यायालयों द्वारा आर्थिक दंड दिया जाता था। इससे राज्य की आय होती थी। परंतु गुप्तकाल में दंड विधान नरम था वह मौर्यकाल जैसा कठोर नहीं था।
इसके अतिरिक्त गुप्तकाल में शारीरिक दंड की अपेक्षा अर्थदंड अधिक दिया जाता था, किंतु यहाँ यह विशेष उल्लेखनीय है कि गुप्त युग में अपराधों की संख्या बहुत कम होती थी। इससे अर्थदंड कम दिया जाता था और उससे आमदनी भी कम होती थी। फिर भी अर्थदंड राज्य की आय के साधनों में से एक प्रमुख साधन था।
वन कर
गुप्तकाल में वनों और चारागाहों पर राज्य का स्वामित्व माना जाता था। चारागाहों व वनों के वृक्षों और वन से होने वाली उपज पर कर लगाया जाता था। इससे राज्य को आय होती थी।
भूमि से आय गुप्तकाल में कृषि योग्य भूमि को छोड़कर शेष भूमि राज्य की मानी जाती थी। वह राज्य की संपत्ति होती थी। इसलिए जो भूमि खेती के योग्य नहीं होती थी, अर्थात् जो बंजर या पड़त होती थी, या जिस भूमि पर बस्ती के निवासगृह बनाए जाते थे, उसको बेचने से राज्य को आय होती थी। इस प्रकार की भूमि से प्राप्त विभिन्न खनिज पदार्थों पर लगे कर से भी राज्य को आमदनी होती थी।
सामंतों से कर और उपहार
गुप्त शासकों को अधीनस्थ मांडलिक राजाओं, सामंत शासकों और करद राज्यों से जो वार्षिक कर और उपहार प्राप्त होते थे उससे राज्य की आय होती थी।
समुद्रगुप्त ने दक्षिण भारत के राज्यों को अपने साम्राज्य में सम्मिलित करने की अपेक्षा उनके स्वामियों को वे राज्य लौटा दिए और इसके बदले में उनसे भेंट, उपहार, धन और वार्षिक कर लिए। इससे गुप्त राज्य की आय में वृद्धि हुई। इसके अतिरिक्त सीमा क्षेत्र के राज्य और गणराज्य भी प्रतिवर्ष सम्राट को उपहार व कर भेजते थे। विदेशी शासक भी गुप्त सम्राटों का अनुग्रह प्राप्त करने के लिए भेंट, उपहार आदि अपने दूतों के साथ भेजते थे। सिंहलद्वीप के नरेश मेघवर्ण ने बोधगया में सिंहली यात्रियों व भिक्षुओं के लिए एक विशाल विहार बनवाने की अनुमति प्राप्त करने के लिए गुप्त सम्राट के पास अपने राजदूतों के साथ बहुमूल्य हीरे, रत्न, स्वर्ण आदि भेजे थे।
इसके अतिरिक्त गुप्त साम्राज्य में अनेक अधीनस्थ सामंत शासक थे जो प्रतिवर्ष गुप्त नरेश को कर देते थे। इस प्रकार इन विभिन्न स्रोतों से प्राप्त धन, भेंट, उपहार, वार्षिक, कर आदि से भी राज्य की आमदनी में वृद्धि होती थी।
राज्य का व्यय
उपरोक्तानुसार विभिन्न स्रोतों और करों से प्राप्त आय को गुप्त नरेश विभिन्न मदों में और जन कल्याण के कार्यों पर व्यय करते थे। शासन संचालन के लिए अनेकानेक अधिकारियों और कर्मचारियों को नियुक्त किया जाता था और इनको नगद वेतन भी दिया जाता था।
फाहियान ने शासकीय कर्मचारियों को वेतनभोगी उल्लिखित किया है। अतः ऐसा प्रतीत होता है कि राजकीय आय का यथेष्ठ भाग शासकीय कर्मचारियों और अधिकारियों के वेतन पर तथा उनके कार्यालयों पर व्यय होता था। देश की सुरक्षा के लिए तथा आंतरिक शांति व्यवस्था के लिए रखी गई सेना व पुलिस के लिए तथा समुचित न्याय व्यवस्था के या संकटकालीन परिस्थिति के लिए राज्य व प्रजा की रक्षा हेतु विदेशी आक्रमणों से सुरक्षा के लिए कुछ धन संचित भी किया जाता था। इसे 'व्यय प्रत्यय' कहा जाता था। जब राज्य में दुर्भिक्ष पड़ता था, तब प्रजा कर मुक्त कर दी जाती थी और राजा उसी संचित कोष से शासन प्रबंध पर व्यय करता था। सार्वजनिक हित के लिए जनकल्याण के कार्य राज्य की ओर से होते थे, जैसे— कुओं, बावड़ियों, तालाबों, सिंचाई के लिए नहरों आदि का निर्माण,
निःशुल्क औषधालय तथा अनाथों के लिए सदावर्त की स्थापना, मंदिरों और विहारों की स्थापना और उनमें शिक्षा की व्यवस्था आदि। उच्च शिक्षा के लिए गुप्त नरेशों ने नालंदा में महाविहार की स्थापना की थी। यज्ञों और अनुष्ठानों के समय सहस्त्र मुद्राएँ अनाथों और ब्राह्मणों को दान में दी जाती थीं। धर्मशालाओं में भी अनार्थों को अन्न और वस्त्र वितरण किया जाता था और औषधालयों में रोगियों को निशुल्क औषधियाँ दी जाती थीं और उनका उपचार किया जाता था । विद्वानों को भी पुरस्कार दिया जाता था और मंदिरों का निर्माण भी किया जाता था। गुप्त अभिलेखों में अग्रहार दान का उल्लेख है। इसके अंतर्गत भूमि ब्राह्मणों और मंदिरों को दान में दी जाती थी। यह दान मंदिरों की व्यवस्था तथा विद्वान आचार्यों व पुरोहितों के लिए होता था। इस प्रकार दान में दी गई भूमि की व्यवस्था के लिए कुछ कर्मचारी और समितियाँ होती थीं। इनमें से प्रमुख कर्मचारी को दानाध्यक्ष या अग्रहारिक कहते थे। अन्य अभिलेखों में इसे 'दूतक' भी कहा गया है। इस प्रकार इन सार्वजनिक कार्यों पर भी राज्य की आय का एक बहुत बड़ा भाग व्यय होता
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