गुप्तकाल : स्वर्णकाल : विभिन्न मत - Gupta period: golden period: different opinions

गुप्तकाल : स्वर्णकाल : विभिन्न मत - Gupta period: golden period: different opinions


स्वर्ण काल विभिन्न मत


गुप्त युग को भारत के इतिहास में स्वर्ण युग के नाम से जाना जाता है। गुप्त शासकों ने भारत को राजनीतिक एकता, सुरक्षा व शांति की भावना प्रदान की। गुप्त काल को स्वर्ण-युग कहा जाने के लिए इस युग में हुई चतुर्दिक उन्नति उत्तरदायी है। इस काल में राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक तथा कला आदि प्रत्येक क्षेत्र में असीमित उन्नति हुई। गुप्तकाल में भारतीय समाज एवं संस्कृति की विशेष उन्नति हुई। इस समय ऐसा कोई भी क्षेत्र नहीं था जिसमें भारत वासियों ने उन्नति की ओर कदम नहीं उठाया हो। वास्तव में यह काल भारतीय इतिहास का स्वर्ण युग था। अतः भारतीय इतिहास में गुप्त काल अपना एक विशिष्ट स्थान रखता है।


गुप्तकाल के पूर्व भारत


गुप्त काल के प्रादुर्भाव से पूर्व उत्तरी तथा दक्षिणी भारत विभिन्न छोटे-छोटे राज्यों में विभाजित था। कुषाण वंश का भारत से पूर्णतया लोप हो चुका था। (क) शांति तथा सुव्यवस्था का अंत भारत देश में आंतरिक तथा पारस्परिक स्पर्धा के कारण शांति तथा सुव्यवस्था का पूर्णतः लोप हो चुका था।


(ख) बाह्य आक्रमणों का शिकार गुप्तों के पूर्व पर्याप्त समय तक भारत बाह्य आक्रमणों का शिकार बना हुआ था जिसके कारण भारत का राजनीतिक जीवन विशृंखलित हो चुका था। भारत के पश्चिमी भागों पर विदेशियों की सत्ता स्थापित थी।


(ग) व्यापार एवं वाणिज्य की अधोगति - व्यापार एवं वाणिज्य अधोगति को प्राप्त हो चुका था। उसकी दशा बड़ी सोचनीय थी।


(घ) प्रजा का निम्न आर्थिक स्तर प्रजा का सामाजिक तथा आर्थिक स्तर बहुत गिर गया था। समाज - पतन की ओर अग्रसर हो रहा था। राजाओं के पारस्परिक कलह ने उग्र रूप धारण कर लिया था, जिसके कारण उनको अपने शासन प्रबंध एवं प्रजा की व्यवस्था उन्नत करने का अवकाश प्राप्त नहीं होता था। 


(ङ) गुप्तों द्वारा नई लहर का जन्म गुप्तों की दिग्विजय, आदर्श शासन व्यवस्था, उदार एवं सहिष्णु धार्मिक नीति तथा विद्या व विभिन्न ललित कलाओं के प्रोत्साहन ने भारत के जीवन में पूर्णतया परिवर्तन कर भारत में एक नई लहर को जन्म दिया।

इसका फल यह हुआ कि भारतीय जीवन के समस्त क्षेत्रों में उन्नति की झलक दिखाई देने लगी जिसके कारण इस काल को स्वर्ण युग कहा गया है। डॉ. भगवत शरण उपाध्याय के शब्दों में “दीर्घजीवी सम्राटों ने इस युग में शास्त्रों को आदर्श बनाकर उनके आदेशों के अनुसार आचरण किया। दिग्विजय, अश्वमेघ यज्ञादि अनुष्ठान कर उन्होंने भारतीय धरा को एक छत्र के नीचे लाने का सफल उद्योग किया और दीर्घकाल तक उस पर पितृवत् शासन किया।"


गुप्त सम्राट


गुप्तकाल में अनेक महान एवं यशस्वी सम्राटों का उदय हुआ जिन्होंने अपनी विजय द्वारा एकछत्र शासन की स्थापना की। समुद्रगुप्त चंद्रगुप्त विक्रमादित्य, स्कंदगुप्त आदि इस काल के योग्य तथा प्रतापी सम्राट थे।

समुद्रगुप्त का आदर्श संपूर्ण पृथ्वी को बाँधना था। उसने न केवल आर्यावर्त के राजाओं का उन्मूलन किया, अपितु सुदूर दक्षिण तक अपनी विजय वैजंती फहराई। शक कुषाण आदि शक्तियों ने भी उसे अपना सम्राट स्वीकार किया। उसका उत्तराधिकारी चंद्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य उसी के समान वीर योद्धा था। उसका आदर्श कृत्स्नपृथ्वीजय' था। उसने गुजरात और काठियावाड़ के शकों का उन्मूलन किया तथा उसके प्रताप के सौरभ से दक्षिण के समुद्रतट सुवासित हो रहे थे। स्कंदगुप्त अपने वंश का अंतिम प्रतापी शासक हुआ। उसने हूण जैसी बर्बर एवं भयानक जाति को परास्त कर अपनी वीरता का परिचय दिया। हूणों के साथ उसने इतना घनघोर युद्ध किया कि उसकी भुजाओं के प्रताप से पृथ्वी कंपित हो उठी। इस प्रकार उसने एक क्रूर तथा बर्बर आक्रमण से भारत भूमि की रक्षा की। स्कंदगुप्त ने विक्रमादित्य उपाधि ग्रहण की।

इस प्रकार हम पाते हैं कि गुप्तकाल महान सम्राटों का काल रहा। इतने वीर एवं यशस्वी शासक प्राचीन भारतीय इतिहास के किसी अन्य युग में दिखाई नहीं देते।


वैदिक धर्म का पुनरुत्थान


गुप्त राजा वैदिक धर्म के अनुयायी थे। उन्होंने वैदिक धर्म के उत्थान के लिए विशेष प्रयत्न किया। उनके प्रयत्नों के परिणामस्वरूप बौद्ध धर्म का भारत से पतन होना आरंभ हुआ और वैदिक धर्म का उत्थान होने लगा। गुप्त राजा यद्यपि वैदिक धर्म के कट्टर अनुयायी थे, किंतु उनकी धार्मिक नीति अन्य धर्मों के प्रति सदा उदार रही। वे अन्य धर्मों के विद्वानों का उसी प्रकार आदर करते थे जिस प्रकार वे वैदिक धर्म के आचार्यों का आदर करते थे। इस काल में यज्ञों की भरमार थी। सम्राटों ने बड़े-बड़े यज्ञ किए।

समुद्रगुप्त ने अश्वमेध यज्ञ अपनी दिग्विजय के उपरांत किया था। इस काल में वैदिक धर्म वैसा संकीर्ण नहीं रह गया था जैसा कि वह महात्मा बुद्ध तथा महावीर स्वामी के काल में था। वैदिक धर्म ने अपने देवताओं को मानव रूपधारी देवताओं का बाना पहना दिया था। उन्होंने देवताओं की मूर्तियाँ स्थापित कर उनकी उपासना आरंभ कर दी थी। इस प्रकार इस काल से भक्ति मार्ग का प्रादुर्भाव हुआ। उस समय के उत्कीर्ण लेखों से यह स्पष्ट होता है कि वैदिक धर्म का क्षेत्र विस्तृत हो गया था। अन्य धर्मों के अनुयायियों की संख्या दिन प्रतिदिन कम हो रही थी। इसका कारण धार्मिक अत्याचार अथवा राजाओं की अनुदार नीति नहीं थी, वरन् वैदिक धर्म में आवश्यक सुधारों के होने पर जनता इस ओर विशेष रूप से आकृष्ट होने लगी थी। सरकारी सेवाओं की प्राप्ति में धर्म बाधक नहीं था।

चंद्रगुप्त प्रथम का सेनापति अमरकादिक बौद्ध धर्म का अनुयायी था। राजाओं की उदारता तथा सहिष्णुता का प्रभाव जनता पर भी अच्छा पड़ा। विभिन्न धर्मों के अनुयायियों में कटुता का अभाव था। उनमें सहयोग एवं सद्भावना विद्यमान थी। प्रसिद्ध चीनी यात्री फाहियान के अनुसार उस समय भारत में धर्म के नाम पर किसी प्रकार का अत्याचार नहीं किया जाता था। ब्राह्मणों तथा बौद्धों में मैत्रीपूर्ण संबंध था।


साहित्य की प्रगति


हिंदू धर्म के पुनरुत्थान के साथ-साथ संस्कृत भाषा ने विशेष रूप से उन्नति की। साहित्यकारों ने इस भाषा को अपनाकर अपने ग्रंथों की रचना संस्कृत भाषा में की। अतः इस भाषा ने उन्नति की चरम सीमा प्राप्त की। यह राजकीय भाषा के पद पर आसीन हुई।

यह युग धार्मिक साहित्य की तीन धाराओं- वैदिक साहित्य, बौद्ध साहित्य और जैन साहित्य में विभाजित किया जाता है। इस काल में अनेक साहित्यकार हुए जिसमें - कालिदास, भवभूति, हरिषेण, वीरसेन और वासुल विशेष उल्लेखनीय हैं। इन सब में कालिदास की कृतियाँ अनुपम तथा अद्भुत हैं। उनका 'अभिज्ञानशाकुंतलम्' नाटक विश्व की अद्भुत कृतियों में गिना जाता है। उनका महाकाव्य रघुवंशम्' है। संस्कृत कवियों तथा नाट्यकारों में मातृगुप्त, शूद्रक, विशाखदत्त तथा कालिदास बहुत प्रसिद्ध हैं। इस युग में गणित और ज्योतिष शास्त्र के क्षेत्र में विशेष प्रगति हुई। इसमें आर्यभट्ट और विष्णुगत्त विशेष महत्वपूर्ण विद्वान हैं। ऐसा अनुमान किया जाता है कि मनुस्मृति, महाभारत, पुराण, आदि धार्मिक ग्रंथों का भी वर्तमान रूप इस काल की ही देन है। इसी समय बौद्ध तथा जैन विद्वानों ने भी धार्मिक ग्रंथों की रचना की। बौद्ध लेखकों तथा विद्वानों में आचार्य मंत्रिम, असंग, कुमारजीव, चंद्रकीर्ति, धर्मपाल, आदि विशेष उल्लेखनीय हैं। जैन विद्वानों में चंद्रमणि, सिद्धसेन मणि हुए हैं।


विज्ञान का विकास


इस काल में गणित, आयुर्वेद और ज्योतिष विज्ञान की विशेष प्रगति हुई। गुप्तकाल ने ही आर्यभट्ट तथा वराहमिहिर जैसे जगतप्रसिद्ध गणितज्ञ एवं ज्योतिषाचार्य उत्पन्न किए जिनकी रचनाएँ आज भी प्राचीन विश्व के विज्ञान को भारत की महानतम देन स्वीकार की जाती हैं। सर्वप्रथम आर्यभट्ट ने ही यह खोज की थी कि पृथ्वी अपनी धुरी की परिक्रमा करती है तथा सूर्य के चारों ओर घूमती है।


कला एवं स्थापत्य


गुप्तकाल में विभिन्न कलाओं की भी विशेष रूप से उन्नति हुई। इस समय एक नवीन भारतीय कला का उदय हुआ। भारतीय कला पर जो प्रभाव विदेशी कला का था उसका पूर्णतया अंत हो गया।

भारतीय कला ने विदेशी कला को प्रभावित किया। इसका अन्य देशों की कला शैली पर विशेष रूप से प्रभाव पड़ा। इस काल में कलाओं को कई शीर्षकों के अंतर्गत विभक्त किया गया है जो निम्नलिखित हैं- 


(क) भवन निर्माण कला गुप्तकालीन भवन निर्माण कला के नमूने पर्याप्त मात्रा में प्राप्त नहीं होते हैं। इसका प्रमुख कारण समय का प्रभाव और विदेशी आक्रमणकारियों की ध्वंसात्मक नीति है, किंतु जो कुछ भी प्राप्त होते हैं उनके आधार पर स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि उस समय के भारत में भवन निर्माण कला उच्चकोटि पर थी।

सारनाथ स्तूप, अजंता एलोरा आदि के गुहा, विहार इसी समय के उत्कृष्ट नमूने हैं। ऐहोल में दुर्गा का मंदिर, देवगढ़ का मंदिर, बोधगया का महाबोधि मंदिर इस युग की भवन निर्माण कला के उत्कृष्ट नमूने हैं। भवनों के अलंकृत स्तंभों में मेहरौली (दिल्ली) स्थित स्तंभ की अपनी एक अलग विशेषता है जिस पर जल का आज तक कोई प्रभाव नहीं हुआ है।


(ख) मूर्ति कला- इस समय की मूर्ति कला पर से विदेशी प्रभाव का पूर्ण रूप से अंत हो चुका था। इस समय की अनेक मूर्तियाँ प्राप्त हैं। इस काल की देव मूर्तियों की विशेषताओं में अलंकृत प्रभावमंडल भीने वस्त्र, केशों की विशेष विन्यास शैली, मुद्रा आसन आदि उल्लेखनीय हैं।

इस समय की विष्णु, शिव, पार्वती, ब्रह्मा आदि देवताओं तथा बुद्ध बोधित्सव और अवलोकितेश्वरी की अनेक सुदंर तथा भव्य मूर्तियाँ विद्यमान हैं। सारनाथ में मिली हुई भगवान बुद्ध की प्रसिद्ध मूर्ति इस काल की मूर्ति कलाका उत्कृष्ट उदाहरण है।


(ग) चित्रकला - चित्रकला के सर्वोत्तम उदाहरण गुप्तकाल में ही उपलब्ध होते हैं। गुप्तकाल की चित्रकला के उदाहरण अजंता एलोरा, बाघ गुफा, बादामी एवं सितनपल की गुफाओं में उपलब्ध हैं । गुफाओं में चट्टानों को काटकर उनकी दीवारों पर चित्रकारी की तालिका ने गुप्तकालीन चित्रकला को अमर बना दिया है। अजंता की विश्वविख्यात गुहा की चित्रकारी अधिकतर गुप्तकाल में ही संपन्न हुई है।

इसकी प्रशंसा विश्व के सभी कला विज्ञानों ने मुक्तकंठ से की है। मानव भावों का इतना सुदंर सूक्ष्म एवं मनोवैज्ञानिक चित्रण और कहीं भी उपलब्ध नहीं होता है जैसा अजंता की गुफाओं में देखा गया है। समाधिरत बुद्ध से लेकर प्रणय क्रीड़ारत दंपत्ति तथा शृंगार में मग्न स्त्रियाँ प्रशांत तपस्वी, कुख्यात निर्दयी बधिक, राज-परिवार, धूर्त एवं सभी प्रकार के महलों के चित्र यहाँ पर चित्रित हैं। अजंता के चित्रों की प्रमुख विशेषता विविध प्रकार के अंगविन्यास, वेश-भूषा, मुख-मुद्रा एवं भावभंगिमा आदि हैं।


(घ) संगीत कला- गुप्तकाल में संगीत कला की भी पर्याप्त उन्नति हुई। इस कला को गुप्तकाल के सम्राटों का संरक्षण एवं आश्रय प्राप्त था। उन्होंने इस कला को प्रोत्साहित करने हेतु विशेष रूप से ध्यान दिया।

सम्राट समुद्रगुप्त संगीत कला का विशेष प्रेमी था। उसको इससे विशेष अनुराग था। वह इस कला में दक्ष था। उसे वीणा बजाने का विशेष चाव था। साहित्य में भी संगीत का पर्याप्त उल्लेख है। समुद्रगुप्त को उस समय के साहित्यकारों ने नारद और तुमरू से भी अधिक योग्य बतलाया है।


(ड.) मुद्रा कला- गुप्तकाल में मुद्रा कला की भी उन्नति हुई। इस काल की मुद्राएं विशेष आकर्षक थीं। इन पर अंकित मूर्तियाँ बड़ी भव्य थी। इन पर सम्राटों की मनोवृत्ति तथा उनकी कीर्तियाँ अंकित की गई हैं। समुद्रगुप्त की एक मुद्रा पर उसका अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा तथा वह स्वयं वीणा लिए हुए अंकित किया गया है। इनकी मुद्रा शुद्ध भारतीय स्वर्ण की थी।


(च) नाट्य कला- इस काल में नाट्य कला का भी तीव्रगति से विकास हुआ। इस कला में कई नाट्यकार हुए हैं। नाटकों में जनता की विशेष रुचि थी। रंगमंच उन्नत अवस्था में था। 2.4.9. प्रशासनिक व्यवस्था


गुप्तों के प्रशासन का आधार मौर्यकालीन प्रशासनिक व्यवस्था ही थी। दोनों के शासन प्रबंध में केवल अंतर यह था कि गुप्तकालीन नियम व दंड व्यवस्था उतनी कठोर नहीं थी जितनी कि वह मौर्यकाल में थी। इस काल में जनता को व्यक्तिगत स्वतंत्रता मौर्य काल से अधिक प्राप्त थी। गुप्त राजा, मंत्रियों और सचिवों की सलाह से शासन करते थे। समस्त साम्राज्य प्रांतों में विभक्त था और प्रत्येक प्रांत एक प्रांतीय सूबेदार के अधिकार में था। वह अपने प्रत्येक कार्य के लिए सम्राट के प्रति उत्तरदायी था। प्रांतों का विभाजन कई भागों में किया जाता था। उस समय न्याय व्यवस्था बहुत उच्चकोटि की थी। राजा प्रधान न्यायाधीश था। अपराधों की संख्या बहुत कम थी। दंड अपराध के अनुसार दिए जाते थे। साधारणतः आर्थिक दंड दिया जाता था। शारीरिक तथा मानसिक दंड बहुत कम दिए जाते थे।