गुप्तकाल : राजनैतिक उत्थान - Gupta Period: Political Rise
गुप्तकाल : राजनैतिक उत्थान - Gupta Period: Political Rise
गुप्तों की उत्पत्ति
गुप्तों की उत्पत्ति के विषय में बड़ा मतभेद है। गुप्त सम्राटों के अभिलेखों में इस विषय पर प्रकाश नहीं डाला गया है। इस कारण निश्चित रूप से यह कहना बड़ा कठिन है कि गुप्त किस वर्ण के थे। कुछ विद्वान उनको वैश्य मानते हैं। इस तथ्य में कोई सार प्रतीत नहीं होता, क्योंकि गुप्त, उनके पूर्व नाम का एक अंग ही रहा होगा। इतिहास में ऐसे उदाहरणों की कमी नहीं है जब ब्राह्मणों के नाम के उपरांत गुप्तः अथवा 'भूति' शब्द का प्रयोग किया गया। ब्रम्हगुप्त व भवभूति ब्राह्मण थे। आज के अधिकांश इतिहासकार गुप्तों को क्षत्रिय स्वीकर करते हैं। डॉ. आर.डी. बनर्जी के अनुसार गुप्त लिच्छवि वंश के क्षत्रिय थे। गुप्तों के प्रारंभिक शासकों के इतिहास का पूर्ण ज्ञान प्राप्त नहीं है।
ऐसा अनुमान किया जाता है। कि इस राजवंश का संस्थापक श्रीगुप्त नामक व्यक्ति था। वह एक साधारण सामंत था। उसके नाम के साथ केवल 'महाराजा' की उपाधि सम्मिलित थी। उसने कोई स्वतंत्र राज्य की स्थापना नहीं की थी। उसकी मृत्यु के उपरांत उसका पुत्र घटोत्कच उसका उत्तराधिकारी हुआ। वह भी अपने पिता के समान एक सामंत था। उसने केवल महराजा' की उपाधि से ही अपने आपको सुशोभित किया था। घटोत्कच की मृत्यु के उपरांत उसका पुत्र चंद्रगुप्तगद्दी पर बैठा। इसे चंद्रगुप्त प्रथम के नाम से जाना जाता है। वह इस वंश का प्रथम सम्राट था जिसने स्वत्रंत शासक के रूप में शासन आरंभ किया।
उसने 'महाराजा' की उपाधि के स्थान पर 'महाराजाधिराज' की उपाधि धारण की जो उक्त कथन को सिद्ध करने में अकाट्य सक्षम है। इस समय मगध का शासन अधोगति को प्राप्त हो रहा था। चंद्रगुप्त के नेतृत्व में पाटलिपुत्र की जनता ने विद्रोह किया जो सफल हुआ जिससे चंद्रगुप्त का मगध पर अधिकार हो गया। उसने लिच्छवि वंश की राजकुमारी कुमारदेवी से विवाह किया जिससे उसकी शक्ति का विस्तार हुआ। उसको साम्राज्य विस्तार में लिच्छवियों का पूर्ण समर्थन प्राप्त हुआ।
गुप्तों का परिचय
इस साम्राज्य का जन्मदाता श्रीगुप्त को माना जाता है किंतु गुप्त वंश का वास्तविक संस्थापक चंद्रगुप्त था, जिसे चंद्रगुप्त प्रथम के नाम से भी जाना जाता है।
चंद्रगुप्त के पूर्वज मगध राज्य के अंतर्गत छोटे सरदार थे। पुराणों के अनुसार गुप्त राज्य का उदय प्रयाग और अयोध्या के मध्य क्षेत्र में हुआ, जिसका काल तीसरी शताब्दी अनुमान किया जाता है।
चंद्रगुप्त प्रथम (319 ई.-324 ई.)
गुप्त अभिलेखों से ज्ञात होता है कि चंद्रगुप्त प्रथम ही गुप्तवंश का प्रथम स्वतंत्र शासक था जिसकी उपाधि महाराजाधिराज थी। यह सार्वभौमिक उपाधि इस बात का प्रमाण है कि चंद्रगुप्त प्रथम गुप्त वंश का प्रथम शक्तिशाली और स्वतंत्र राजा हुआ जिसके पौरुषपूर्ण प्रारंभिक प्रयत्नों ने गुप्त राजशक्ति के विकास का द्वार उन्मुक्त कर अपने उत्तराधिकारी और पुत्र समुद्रगुप्त के सार्वभौम साम्राज्य के निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया।
दुर्भाग्यवश चंद्रगुप्त प्रथम का कोई व्यक्तिगत लेख या प्रशस्ति उपलब्ध नहीं है, अतः उसकी उपलब्धियों एवं तत्कालीन राजनीतिक घटनाओं के विषय में जानकारी अत्यंत अल्प है।
गुप्त-संवत्
चंद्रगुप्त के समय की प्रमुख घटना अपने राज्यारोहण के समय उसके द्वारा एक नवीन संवत् की स्थापना करना था जो गुप्त संवत् के नाम से जाना जाता है। चंद्रगुप्तने इस संवत् की स्थापना 319-20 ई. में की थी।
वैवाहिक संबंध
चंद्रगुप्त प्रथम के शासनकाल की सबसे प्रमुख घटना उसका लिच्छवि राजकुमारी के साथ विवाह होना था।
इस विवाह के विषय में जानकारी विशेष प्रकार की स्वर्ण मुद्राओं से होती है जिन्हें 'लिच्छवि-प्रकार', 'विवाह-प्रकार' अथवा 'राजा-रानी प्रकार की मुद्राएँ कहा जाता है। इस प्रकार की अब तक 25 मुद्राएँ प्राप्त हुई हैं। इन मुद्राओं के मुखभाग पर चंद्रगुप्त प्रथम एवं उसकी रानी कुमारदेवी के चित्र नामों सहित उत्कीर्ण हैं। इन मुद्राओं के पृष्ठ भाग पर धराशायी सिंह अथवा सिंहासन की पीठ पर शुभासी देवी की आकृति उत्कीर्ण है तथा इसी ओर लिच्छवयः लेख भी प्राप्य है। इस विवाह की पुष्टि प्रयाग प्रशस्ति से भी होती है, जिसमें समुद्रगुप्त को महादेवी कुमारदेवी के गर्भ से उत्पन्न तथा 'लिच्छवि- दौहित्र' (लिच्छवियों का नाती) कहा गया है।
चंद्रगुप्त व कुमारदेवी के इस विवाह का अत्यधिक राजनीतिक महत्व है।
विवाह के परिणामस्वरूप ही चंद्रगुप्त प्रथम सम्राट बन सका तथा महाराजाधिराज की उपाधि धारण करने में सफल हुआ, किंतु एलन का विचार है कि इस विवाह का वास्तविक महत्व वस्तुतः सामाजिक है। लिच्छवि रक्त पर समुद्रगुप्त के घमंड करने का कारण लिच्छवियों की कुलीनता थी, परंतु एलन के इस निष्कर्ष को मानना कठिन है क्योंकि लिच्छवि किसी उच्च जाति के नहीं थे। इसके विपरीत, राजनीतिक शक्ति के रूप में लिच्छवियों की महत्ता महात्मा बुद्ध के समय से ही चली आ रही थी। अतः इसी कारण समुद्रगुप्त ने प्रयाग प्रशस्ति में लिच्छवि-दौहित्र कहने में गर्व का अनुभव किया होगा। चंद्रगुप्त प्रथम के शासनकाल में गुप्तों की शक्ति व वैभव में जो असीमित वृद्धि हुई,
उसमें इस विवाह का प्रमुख योगदान था। डॉ. राय का विचार है कि कुमारदेवी के समय में लिच्छवियों के राज्य का गणतंत्रात्मक संघटन बहुत कुछ विघटित हो गया था और उसके स्थान पर उसने स्वतंत्र राजतंत्रात्मक स्वरूप धारण कर लिया था। यही कारण है कि राजकन्या कुमारदेवी पैतृक आधार पर लिच्छवी राज्य की स्वामिनी बन गई तथा लिच्छवियों का संपूर्ण अधिकार क्षेत्र चंद्रगुप्त प्रथम को उपलब्ध हो गया। डॉ. अल्तेकर का विचार है कि लिच्छवि राज्य के गुप्त साम्राज्य में विलीन हो जाने पर भी गुप्त शासन पर लिच्छवियों का प्रभाव कुछ समय तक छाया रहा। संभवत: इसी कारण ‘राजा-रानी-प्रकार की मुद्राएँ प्रचलित की गई होंगी। इन मुद्राओं के आधार पर ही कुछ विद्वानों का विचार है कि कुछ समय तक चंद्रगुप्त प्रथम व कुमारदेवी ने संयुक्त रूप से शासन किया था।
राज्य विस्तार
चंद्रगुप्त प्रथम ही गुप्त वंश का प्रथम स्वतंत्र शासक था। चंद्रगुप्त प्रथम ने ही सर्वप्रथम गुप्त- साम्राज्य का विस्तार करने का प्रयत्न किया। कुमारदेवी से विवाह करने के कारण उसे लिच्छवियों का वैशाली का राज्य प्राप्त हो गया था। पुराणों एवं प्रयाग प्रशस्ति से चंद्रगुप्त प्रथम के राज्य विस्तार के विषय में प्रकाश पड़ता है। उपरोक्त स्रोतों से ज्ञात होता है कि चंद्रगुप्तका राज्य पश्चिम में प्रयाग जनपद से लेकर पूर्व में मगध अथवा बंगाल के कुछ भागों तक व दक्षिण में मध्य प्रदेश के दक्षिण-पूर्वी भाग तक विस्तृत था।
समुद्रगुप्त (335 ई.-380 ई.)
चंद्रगुप्त प्रथम के पश्चात् उसका पुत्र समुद्रगुप्त शासक बना। समुद्रगुप्त के शासनकाल का गुप्तकालीन इतिहास में विशेष महत्व है
क्योंकि भारत-राष्ट्र की सुरक्षा, समृद्धि एवं संस्कृति की संवृद्धि के लिए यह आवश्यक था कि भारत में एक छत्र राज्य की स्थापना हो ताकि भारत एक राजनीतिक शृंखला में आबद्ध रहे। राजधर्म के इसी आदर्श से अनुप्रेरित होकर भारतीय धर्म और संस्कृति के पोषक समुद्रगुप्त ने भारत को एक राजनीतिक सूत्र में बाँधने का दायित्व अपने ऊपर लिया तथा उसे सफलतापूर्वक निभाया।
स्रोत
समुद्रगुप्त के विषय में यद्यपि अनेक शिलालेखों, स्तंभ-लेखों, मुद्राओं व साहित्यिक ग्रंथों से व्यापक जानकारी प्राप्त होती है, परंतु सौभाग्य से समुद्रगुप्त पर प्रकाश डालने वाली अत्यंत प्रामाणिक सामग्री प्रयाग प्रशस्ति' के रूप में उपलब्ध है।
यह प्रशस्ति प्रयाग के किले के भीतर अशोक के स्तंभ पर उत्कीर्ण है, जिसे समुद्रगुप्त की राजसभा के प्रसिद्ध विद्वान हरिषेण ने उत्कीर्ण कराया था। यह वस्तुतः समुद्रगुप्त की आत्मकथा के समान है, जिसमें उसके शासनकाल की प्रमुख घटनाओं, विजयों, आदि का सुदंर वर्णन किया गया है। प्रयाग प्रशस्ति के अतिरिक्त समुद्रगुप्त का ही एरण अभिलेख भी एक महत्वपूर्ण स्रोत है। गया व नालंदा के ताम्रपत्रों से भी समुद्रगुप्त के विषय में महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है। ऐतिहासिक दृष्टि से समुद्रगुप्त की मुद्राएँ भी अत्यंत उपयोगी हैं, अभिलेखीय प्रमाणों की पुष्टि करने के साथ ही ये अतिरिक्त स्वतंत्र सूचनाएँ भी प्रदान करती हैं।
दिग्विजय
सिंहासन पर आसीन होने के पश्चात् समुद्रगुप्त ने दिग्विजय की योजना बनाई। प्रयाग प्रशस्ति के अनुसार इन योजना का ध्येय 'धरणि बंध (भूमंडल को बाँधना था। जिस समय समुद्रगुप्त शासक बना था, संपूर्ण भारत छोटे-छोटे राज्यों में विभक्त था। समुद्रगुप्त इन राज्यों पर विजय प्राप्त करना तथा भारत को राजनीतिक एकता के सूत्र में बाँधना चाहता था। समुद्रगुप्त एक महान योद्धा तथा कुशल सेनापति था। समुद्रगुप्त ने अपनी इस योजना को पूर्ण करने के लिए अपनी शक्ति से अनेक राज्यों को जीतकर प्रायः संपूर्ण आर्यावर्तव पूर्वी भारत पर गुप्तों का प्रभुत्व स्थापित किया और दक्षिणापथ के समस्त राजाओं को अपना स्वामित्व स्वीकार करने के लिए विवश कर उन्हें अपना करदू बनाया तथा अनेकानेक गणराज्यों,
विदेशी शक- कुषाणों व सीमांत के प्रत्यंत नृपतियों एवं लंका व अन्यान्य द्वीपवासियों को अपने प्रचंड पराक्रम से आक्रांत कर उनका आत्मनिवेदन प्राप्त किया। अतः गुप्तों के प्रताप का आलोक, पूर्ण तेजस्विता और प्रखरता के साथ भासमान हो उठा। डॉ. मुखर्जी ने इस विषय में लिखा है, “सौ युद्धों के विजेता समुद्रगुप्त ने अपनी लगातार विजय यात्रा से, संपूर्ण भारत पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया।" समुद्रगुप्त की विजय यात्रा का निम्नलिखित क्रम में वर्णन किया जा सकता है:-
1. आर्यावर्त का प्रथम अभियान।
2. दक्षिणापथ का अभियान।
3. आर्यावर्त का द्वितीय अभियान।
4. अटाविक राज्यों (जंगली क्षेत्रों में स्थित राज्य- विंध्य क्षेत्र) पर विजय ।
5. सीमावर्ती राज्यों द्वारा अधीनता।
6. विदेशी राज्या
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