गुप्तकाल : सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन - Gupta Period: Social and Cultural Life
गुप्तकाल : सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन - Gupta Period: Social and Cultural Life
गुप्तकालीन सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन भारतीय इतिहास में गुप्तकाल सांस्कृतिक विकास का युग माना जाता है। गुप्त शासक मात्र साम्राज्य निर्माता ही नहीं थे, अपितु संस्कृति के उन्नायक भी थे। इन्होंने अपनी रचनात्मक प्रतिभा को उभारते हुए गुप्तकालीन सांस्कृतिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
सामाजिक स्थिति (Social Condition)
गुप्तकाल एवं गुप्तोत्तर काल (600-1200 ई.) में सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन दृष्टिगोचर होते हैं। गुप्तकाल में परंपरागत चार वर्णो ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एंव शूद्र का अस्तित्व था।
वराहमिहिर के अनुसार, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्रों के घर क्रमशः पाँच, चार, तीन एवं दो कमरे वाले होने चाहिए।" समाज में ब्राह्मण को प्रतिष्ठित स्थान प्राप्त था। यज्ञ, अनुष्ठान के अलावा भी कुछ ब्राह्मणों ने अन्य जातियों के पेशे अपना लिए थे। कुछ ब्राह्मण व्यापार वाणिज्य का व्यवसाय भी करते थे, जिसे स्मृतियों में 'आपद्धर्म' कहा गया है। कुछ क्षत्रियों ने भी व्यापार एवं औद्योगिक वृत्ति अपना ली थी। इस प्रकार सभी वर्गों की परंपरागत वृत्तियों में शिथिलता स्पष्टतः दृष्टिगोचर होने लगी थी। कृषक, पशुपालक, जुलाहे आदि की विशिष्ट जातियों का उद्भव हो रहा था। अनुलोम एवं प्रतिलोम विवाह के फलस्वरूप अंबष्ठ, पारशव, उम्र एवं करण आदि मिश्रित जातियों का भी उद्भव हो रहा था।
सर्वप्रथम कायस्थ जाति का उल्लेख इस काल में मिलता है जो पेशे से लेखक थे। स्मृतियों ने शूद्रों को व्यापार, शिल्प व कृषि कार्य की अनुमति प्रदान कर दी थी। फाहियान के अनुसार, चांडाल गाँव से बाहर रहते थे व शहर प्रवेश के समय लाठी से ठक-ठक करके आवाज करते थे, ताकि लोग उनसे स्पर्श करने से बचे रहें।" गुप्तकालीन समाज में दास प्रथा अस्तित्व में आ चुकी थी परंतु यह पश्चिमी देशों की दास प्रथा के अनुरूप जटिल नहीं थी।
समाज में स्त्रियों को प्रतिष्ठित अधिकार प्राप्त था। अनुलोम विवाह प्रचलित था। समाज में विधवाओं की स्थिति अच्छी नहीं थी।
याज्ञवल्क्य स्मृति कन्या के लिए उपनयन संस्कार व वेदाध्ययन निषेध करती है। सती प्रथा का उल्लेख भानुगुप्त के एरण अभिलेख में मिलता है, जिसके अनुसार उसके मित्र गोपराज की मृत्यु के पश्चात् उसकी पत्नी सती हो गई थी। यह अभिलेख 510 ई. का है।
समाज में वैश्याओं का अस्तित्व था। 'कामसूत्र' में गणिकाओं के निमित्त प्रशिक्षण की व्यवस्था थी। विशाखदत्त बताता है कि उत्सवादि में काफी वेश्याएँ सड़क पर निकलती थीं।
कालिदास उज्जयिनी के महाकाल मंदिर में नृत्यगान करने वाली देवदासियों का उल्लेख करता है। पर्दा प्रथा प्रचलित नहीं थी। कुमार देवी ने चंद्रगुप्त के साथ (पति के साथ) मिलकर शासन चलाया था। प्रभावती गुप्त ने अपने अल्पवयस्क पुत्रों की संरक्षिका के रूप में शासन किया था। यह गुप्तकालीन स्त्रियों की स्वतंत्र स्थिति का द्योतक है। तत्युगीन स्मृतियों में स्त्रियों के संपत्ति संबंधी अधिकारको मान्यता दी गई है। स्त्री के धन का दायरा भी बढ़ाया गया था। कन्या को भी पिता की संपत्ति की अधिकारिणी माना गया था। धार्मिक कृत्यों में पति के साथ पत्नी का रहना आवश्यक था।
जनता का भोजन साधारण तथा सात्विक था। आम जन शाकाहारी थे। मांस-मदिरा का प्रयोग केवल चांडाल लोग ही किया करते थे। कालिदास कृत रघुवंशम् में अनेक प्रकार के भोजनों का उल्लेख मिलता है। व्रत, उपवास एवं प्रायश्चित समाज में प्रचलित थे। शकुन-अपशकुन पर लोगों का विश्वास था।
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