भारत में हूण - Huns in India

भारत में हूण - Huns in India


द्वितीय शताब्दी ईसा पूर्व में चीन के पश्चिमी सीमा पर बसी हुई हूण (हूँग नू) जाति के विषय में विदित है कि इसने यू-ची नामक अपर जाति को पराजित कर पश्चिम की ओर खदेड़ दिया। आगे चलकर हूण स्वयं एशिया के स्टेपी मैदानों से निकल कर भूमि, भोजन और चरागाहों की खोज में पश्चिम की ओर चल पड़े। वहाँ ये दो शाखाओं में विभाजित हो गए। एक शाखा ने वक्षु नदी की घाटी की ओर से होते हुए भारत में प्रवेश किया। द्वितीय शाखा ने वोल्गा नदी की घाटी से होते हुए यूरोप में प्रवेश किया । हूणों की संख्या, शक्ति और निर्दयता को भारत और यूरोप वासियों ने सहन किया। उनके खेत और गाँव उन्हीं के सामने जलाकर भस्म कर दिए गए और ये लोग बिना कारण मार दिए गए।


वक्षु-घाटी से लेकर फारस पर अधिकार करने वाली हूण शाखा इतिहास में श्वेत हूण के नाम से प्रसिद्ध है। वे फारस से आगे बढ़ कर काबुल होते हुए उत्तरी भारत पर टूट पड़े। उस समय महाराजाधिराज श्री कुमारगुप्त गुप्त - सिंहासन पर विराजमान थे।


हुआन सांग के अनुसार "मिहिरकुल ने बौद्धों पर बहुत अत्याचार किया। मिहिरकुल की क्रूरताओं से ही परेशान होकर संभवत: हिंदू शक्तियों ने एक संघ का संगठन कर मिहिरकुल पर आक्रमण किया।

" हुआन सांग के अनुसार बालादित्य ने ही इसे बंदी बनाया था। वहाँ से मुक्त होकर उसने कश्मीर नरेश के यहाँ शरण ली और अपने उदार आश्रयदाता को हटाकर स्वयं राजा बन बैठा। मिहिरकुल को यशोधर्मन ने भी परास्त किया था। वह शैव धर्म को मानने वाला था। अंत में वह मृत्यु का शिकार हुआ किंतु भारत पर हूणों के आक्रमण निरंतर होते रहे।


कालांतर में हूण भारत में बस गए और भारतीय बनकर भारत के उन्नायक बन गए। भारतीय इतिहास में तोरमाण और मिहिरकुल प्रसिद्ध ऐतिहासिक हूण शासक हैं,

जिनके विषय में हमें साहित्य और अभिलेखों में प्रचुर सामग्री प्राप्त होती है। वराह मिहिर की वृहत्संहिता में इन्हें 'सितहूण' अथवा 'श्वेत हूण' कह कर चीन के सन्निकट मरुचीन (चीती तुर्किस्तान) का बताया गया है। वृहत्कथामंजरी में हूणों को कंबोजों, यवनों, बबरों, तुषारों, पारसीकों के साथ ही नीच म्लेच्छ कहा गया है। इसलिए कि वे आचारहीन, उद्धत् और उग्र थे। स्कंदगुप्त के जूनागढ़ लेख में भी इन्हें म्लेच्छ कहा गया है। यहाँ पर यही बताया गया है कि स्कंदगुप्त से पराजित होकर वे 'म्लेच्छ देश में चले गए। स्कंदगुप्त के भीतरी स्तंभ लेख में इस गुप्तवंशी वीर और हूण आक्रांता में भीषण संग्राम होने का उल्लेख किया गया है।


इस प्रकार स्कंदगुप्त ने हूणों के आक्रमण से विचलित कुललक्ष्मी को नष्ट होने से बचा लिया। यद्यपि वह इसे स्थिर नहीं बना सका।

बुधगुप्त के एरण स्तंभ लेख गुप्त संवत् 165 (= 484 ई0) पूर्वी मालवा प्रदेश में गुप्त आधिपत्य सिद्ध होता है। परंतु तोरमाण के एरण स्तंभ लेख से सिद्ध होता है कि इस क्षेत्र में हूणों का आधिपत्य स्थापित हो गया था।


तोरमाण


एरण में स्थापित की गई वराहमूर्ति पर तोरमाण का लेख अब भी यहीं विद्यमान है। इस लेख से ज्ञात होता है कि महाराजाधिराज तोरमाण के शासन काल में स्वर्गीय मातृविष्णु का छोटा भाई धन्यविष्णु इसी ऐरिकिण प्रांत (एरण) में हूणों का राज्यपाल था। पहले ये दोनों भाई गुप्त सम्राट बुधगुप्त की ओर से इसी प्रांत के शासक थे।


पंजाब के कूरा (साल्ट रेंज) अभिलेख में भी इस शासक को राजाधिराज महाराज तोरमाण षाहि” कहा गया है। इसी लेख से ज्ञात होता है कि उसके परिवार में राजपुत्र, राजदुहिता, भाई, बहन और पत्नियाँ भी थीं। यह भी ज्ञात होता है कि वह बुद्ध धर्मावलंबी भी था।


कल्हण की राजतरंगिणी में भी तोरमाण का उल्लेख प्राप्त होता है। मिहिरकुल के ग्वालियर लेख (राज्य संवत् 15) से ज्ञात होता है कि तोरमाण महान गुणज्ञ राजा था, जिसने अपने राज्य का शासन शक्ति, न्याय और सत्य सनातन सिद्धांतों के अनुसार अत्यंत उदारता से किया।


 मिहिरकुल


प्रतापी शासक तोरमाण का कुलवर्धन और यशस्वीपुत्र मिहिरकुल उसके बाद प्रसिद्ध सम्राट हुआ। वह शिव का उपासक था। इसे भी ग्वालियर लेख में पराक्रमी श्रेष्ठ शासक और प्रजा को शरदचंद्र के समान सुखद बताया गया है। इसीलिए वह राजाओं में श्रेष्ठ राजा (नृपः वृषः) कहा गया है, परंतु सिक्कों को देखने से ज्ञात होता है कि वृष उसके विरुद्ध ही था। इसीलिए द्विजगण उसका गुणगान करते हुए मंगल पाठ करते थे। ग्वालियर लेख में उसके द्वारा ग्वालियर (गोपद्रिगिरि) में सूर्य मंदिर स्थापित करवाया गया था। परंतु इसी लेख में सूर्य भक्ति के अतिरिक्त शिव भक्ति और विष्णु की भी भक्ति-पूजा का उल्लेख किया गया है।

इस शिलालेख की तिथि उसका 15वाँ राज्यवर्ष है। अतः यही सिद्ध होता है कि उसने कम-से- कम 15 वर्ष अवश्य राज्य किया होगा।


मिहिरकुल के विषय में कुछ जानकारी यशोधर्मन के मंदसौर स्तंभ लेख से भी प्राप्त होती है। इस लेख में बताया गया है कि जिस मिहिरकुल का सिर शिव के अतिरिक्त और किसी के सामने नहीं झुकता 'था उसे यशोधर्मन के दोनों चरणों पर नीचे झुक कर प्रणाम करना पड़ा और साथ ही चूड़ा तथा पुष्पोपहार से भी मिहिरकुल ने यशोधर्मन की अर्चना की। इस प्रकार स्पष्ट है कि सं. 589 अथवा 522-33 ई. के लगभग मिहिरकुल की इसी मालवा प्रदेश में ही पराजय हुई।


कल्हण की राजतरंगिणी में भी हूणों के आधिपत्य स्थापित हो जाने और उस वंश के राजा मिहिरकुल का एक क्रूर शासक के रूप में उल्लेख किया गया है। राजतरंगिणी में ही चंद्रव्याकरण का भी उल्लेख (राजतरंगिणी 1/175-176) किया गया है। चंद्रव्याकरण की सूत्रवृत्ति में दिए गए एक उदाहरण से- अजयद्-गुप्त हुणान् से हूणों की पराजय सिद्ध होती है। इसके प्रतिकूल सोमदेव से हूणों की चित्रकूट विजय का प्रमाण मिलता है। इन उल्लेखों से हूणों और हिंदू शक्तियों के संघर्ष का परिचय मिलता है, जिसकी पुष्टि तत्कालीन अभिलेखों से भी हो जाती है।


 बालादित्य-मिहिरकुल


हुआन सांग के अनुसार मिहिरकुल का संबंध पंजाब के शाकल नगर सियालकोट) से था।

उसने आसपास के सभी राज्यों को जीतकर अपना अधिकार स्थापित किया। उसने बौद्धधर्म पर बहुत से अत्याचार किए। चीनी यात्री का कथन है कि मगध नृप बालादित्य बुद्ध धर्मावलंबी था। उसने राज्य की सीमा सुरक्षा का प्रबंध कर हूण शासक को कर देना अस्वीकार कर मिहिरकुल का विरोध करना प्रारंभ किया। मिहिरकुल के आक्रमण के समक्ष बालादित्य ने भागकर एक द्वीप में शरण ली। मिहिरकुल ने उसका यहाँ भी पीछा किया, परंतु उसे बालादित्य ने बंदी बना लिया और वह उसका बध भी करना चाहता था; परंतु माता के कहने पर बालादित्य ने उसे मुक्त कर दिया। इस प्रकार छूटने के बाद मिहिरकुल ने कश्मीर के राजा के यहाँ शरण ली और उस कश्मीर के उदार राजा को कुछ वर्षों के बाद मार कर मिहिरकुल ने उसका राज्य हड़प लिया। इस कारण राजतरंगिणी (कश्मीर के इतिहास) में उसे क्रूर कहा गया है।