साम्राज्यवादी युग - imperial era
साम्राज्यवादी युग - imperial era
7वीं सदी के उत्तरार्द्ध में राजनैतिक नवनिर्माण की उत्कंठा से प्रेरित प्रायः एक ही साथ तीन दिशाओं में तीन विभिन्न राजनैतिक शक्तियाँ उदित हुई। दक्षिणापथ में मान्यखेट के राष्ट्रकूटों, बंगाल के पालों और मालवा के गुर्जर प्रतिहारों ने, अपने वास्तविक अधिकार क्षेत्रों अथवा प्रभाव क्षेत्रों का समान रूप से विस्तार करते हुए, उत्तर भारतीय राजनैतिक शून्य पर छा जाने का संघर्षपूर्ण प्रयत्न प्रारंभ कर दिया, जो लगभग 150 वर्षों तक चलता रहा। इनके पारस्परिक संघर्ष मालवा से लेकर बंगाल तक के कई क्षेत्रों में कई बार हुए किंतु उनका केंद्र प्रायः दोआब का उपजाऊ मैदान ही था।
उसकी राजधानी कन्नौज उन अनेक मार्गों को जोड़ती थी, जो गंगा के किनारों से होते हुए दक्षिण-पूर्व में समुद्र तट, मालवा से होते हुए पश्चिमी समुद्रतट एवं विन्ध्याचल से दक्षिण में स्थित अनेक प्रमुख नगरों और व्यापारिक केंद्रों तक जाते थे। उनके त्रिकोणात्मक संघर्षों का मूल कारण इन व्यापारिक मार्गों और अन्न के उत्पादक क्षेत्रों पर अधिकार करना था। पालों और प्रतिहारों के बीच होने वाले युद्धों का एक अन्य कारण उत्तर भारतीय राजनीति को अप्रतिद्वंदी रूप में संचालित करने की मनोकामना प्रतीत होती है। अंततः इस दौड़ में गुर्जर
प्रतिहार बाजी मार ले गए और कन्नौज पर उन्होंने अधिकार कर प्रायः समस्त उत्तर भारतीय राजनीति को बहुत दिनों तक प्रभावित एवं संचालित किया।
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