बौद्धिक पतन - intellectual decline

बौद्धिक पतन - intellectual decline


"भारत के निरंतर राजनैतिक पतन का प्रमुख कारण उस समय का बौद्धिक पतन था। यद्यपि संस्कृत अब भी पढ़े लिखे लोगों की भाषा थी और उसमें इस युग में भी प्रभूत साहित्य की रचना हुई किंतु धीरे-धीरे ये भाषा दुरूह, अलंकार बोझिल और शब्दाडंबर से युक्त होकर साधारण व्यक्ति और बोलचाल की भाषाओं से छू जाने लगी। परिणामतः उसकी व्यापकता और उपयोगिता कम होने लगी। 10वीं शताब्दी के राजशेखर के बाद उच्च कोटि के संस्कृत कवियों, नाटककारों और गद्यलेखकों की कमी हो गई तथा अपभ्रंश और प्राकृतों का प्रयोग अधिक किया जाने लगा। इस युग में जो साहित्य भी लिखा गया, वह केवल आनुश्रुतिक (पुराण, रामायण और महाभारत की पूर्ववत कथाओं पर आधारित) और टीकात्मक ही रहा।

उसमें वैदिक साहित्य, प्राचीन हिंदू और बौद्ध दर्शनों तथा अर्थशास्त्र अथवा धर्मशास्त्र के प्राचीन ग्रंथों की तरह विचारों की उड़ान, तर्कशक्ति, व्यवस्थापन, धार्मिक और सामाजिक नियमों का प्रतिष्ठापन और मार्गदर्शन का प्रायः अभाव प्रतीत होता है। संस्कृत साहित्य के अधिकांश ग्रंथ अब छंदशास्त्र, अलंकारशास्त्र और रसशास्त्र के विवेचन तक सीमित होने लगे, जिनके प्रायः सभी उदाहरण प्राचीन लेखकों से लिए जाते रहे। सदूक्तियों का संग्रह उसी प्रवृत्ति का एक दूसरा रूप था। शंकराचार्य ( 788-820 ई.) प्राचीन भारत के अंतिम दार्शनिक कहे जा सकते हैं, किंतु उन्होंने वृत्तियों और भाष्यों के लिखने की जो प्रणाली चलाई, आगे वही अनुकरण की वस्तु हो गई। विवेच्य युग प्राचीन स्मृतियों की टीकाओं से भरा हुआ है जो नवीन स्मृतियाँ लिखी भी गई,

उनकी वह मान्यता न हो सकी जो मनुस्मृति और याज्ञवल्क्य स्मृति जैसे प्राचीन धर्मशास्त्र ग्रंथों की थी। राजनीति के क्षेत्र में कौटिलीय अर्थशास्त्र के टक्कर की कोई भी पुस्तक हमें नहीं मिलती। जो ग्रंथ इस विषय पर लिखे भी गए वे प्राचीन सिद्धांतों और उक्तियों को दुहराने मात्र तक सीमित रहे और उनमें नवीन परिस्थितियों की कल्पना अथवा समकालिक समस्याओं पर विचार का प्रायः अभाव दिखायी देता है। लक्ष्मीधर और हेमाद्रि जैसे राजकार्यों के ऊँचे पदों पर रहने वाले विद्वानों ने भी दान, व्यवहार, प्रायश्चित और व्रत जैसे विषयों पर ही लिखने में अपना समय अधिक व्यतीत किया। यह वैचारिक उड़ान और राजनैतिक चिंतन के अभाव का ही द्योतक है। इस युग में बड़े-बड़े कवि भी राजाओं-महाराजाओं की प्रशस्तियों को लिखने और गाने मात्र तक से अपने को धन्य समझने लगे।

संभवतः देश की नित्य परिवर्तनशील परिस्थितियों और अशांत अवस्थाओं में बौद्धिक वर्ग की देखरेख करने वालों और उसे प्रोत्साहन देने वालों की इतनी कमी हो गई कि कविगण यदि थोड़ा भी आश्रय पा जाते तो उसकी तुलना में कई गुना आश्रयदाता का बखान करते। ऐसी स्थिति में ऊँचे साहित्य और चिंतन का पनपना असंभव था। कार्यकारण के इस परस्पर स्वरूप का कदाचित् सबसे बड़ा उदाहरण और उसकी परिणति बल्लालभट्टकृत (16वीं शदी का अंत) भोजप्रबंध है, जो पंडितों की दीनता, अल्पबुद्धि एवं इतिहास के तैथिक क्रम के ज्ञान के आश्चर्यजनक अभाव का अत्यधिक परिचायक है।


उपरोक्त बौद्धिक पतन का अप्रत्यक्ष प्रभाव राजकीय निरंकुशता और एकतंत्रवादिता के विकास के रूप में उपस्थित हुआ।

प्राचीन भारत के प्रारंभिक युग की तरह न तो इस समय गणतंत्र रहे और न उनकी शासन प्रणाली अथवा उनके विचारा 600 ई. के बाद राजाओं का नियमन करने वाली संस्थाएँ अत्यंत शिथिल हो गई और इस समय के वंशगत मंत्री प्रतिष्ठा और नियंत्रण शक्ति में प्राचीन मंत्रियों की अपेक्षा अत्यंत हीन और नगण्य हो गए। अब वे राजा की कृपा और आश्रय के अधिक आकांक्षी होने लगे और उनका परामर्श मानना या ना मानना राजा की इच्छा पर निर्भर हो गया। पुराणों, धर्मशास्त्रों और राजनैतिक ग्रंथों ने अब राजा को ईश्वर का अवतार और देवस्वरूप स्वीकार कर उसकी आज्ञाओं को सर्वदा स्वीकार करने की अनुशंसा की और यदि कहीं इनके अपवादस्वरूप परंपरागत राजनैतिक विचारों के आधार पर अत्याचारी राजा के विरोध की बातें दुहरायी भी गई तो उनका मूल्य नहीं रहा।

परिणामतः राजा और राजतंत्र एकतंत्री और निरंकुश हो गया और जनता में अत्याचारों के विरोध की शक्ति कम हो गई। इस युग में इस प्रकार के विरोध के बहुत ही कम उदाहरण मिलते हैं। राजनैतिक अस्थिरता और सतत विदेशी आक्रमणों के इस युग में निर्णय, कार्यान्वयन और नेतृत्व की शक्ति एक अथवा अत्यंत थोड़े हाथों में सीमित हो गई। किंतु इस सैद्धांतिक अथवा व्यावहारिक एकतंत्र की ओर इंगित करने का यह तात्पर्य नहीं है कि पूर्वमध्ययुगीन सभी हिंदूराजा निरंकुश अथवा अत्याचारी थे।


सांस्कृतिक पतन


गुप्तोत्तर काल निरंतर सामाजिक और धार्मिक गतिरोध संकोच, रूढ़िवादिता और अंधविश्वास की भावानाओं को भी परिलक्षित करता है। यहाँ तत्कालीन सामाजिक और धार्मिक स्थितियों पर विचार करना न तो अभीष्ट है न प्रासंगिक,

किंतु उस संबंध की कुछ विशेष बातों की ओर ध्यान दिलाना आवश्यक है, जिनका इस समय की राजनीति की गति पर प्रभाव पड़ा। विभिन्न वर्णों में जातियों- उपजातियों की बढ़ती हुई संख्याएँ तथा वर्णेतरों, अस्पृश्यों और अंत्यजों की स्थिति से सामाजिक भेदोपभेद और दुराव बढ़ने लगा। कर्म की प्रधानता के स्थान पर जन्म की प्रधानता हो गई। धीरे-धीरे समाज रूढिगत, प्रतिक्रियावादी और पुरातनवादी हो गया और नवीन परिस्थितियों के मुकाबले के लिए उसके पास विकल्पों की कमी हो गई। ब्राह्मणों का नेतृत्व ढीला हो गया तथा समाज और देश की रक्षा का भार केवल क्षत्रियों पर छोड़ दिया जाने लगा। पहले विदेशी आक्रमणों के प्रतिरोध का जो उत्तरदायित्व सार्वजनिक हुआ करता था वह अब राजकाज में लगे हुए केवल एक वर्ग पर छोड़ दिया गया,

जो उसे अपनी राजनैतिक कमजोरियों के कारण, वीरता होते हुए भी पूरी तरह निभा नहीं सका। देवी-देवताओं की अदृश्य शक्तियों पर कभी-कभी इतना अधिक विश्वास (अथवा अंधविश्वास) किया जाने लगा कि मुनष्य अपने कर्तव्यों को भी खो बैठा। मंदिरों में धन बहुत बड़ी मात्राओं में जमा किया जाने लगा, जो तुर्क आक्रमणकारियों की गिद्धदृष्टि का कारण बना और परिणामतः भयावह विनाश, लूट और हत्याओं का तांता लग गया।


गुप्तोत्तर कालीन राजाओं की धर्मनीति, समाजनीति अथवा युद्धनीति, स्त्रियों, ब्राह्मणों, देव स्थानों और गाँवों का आदर और किसी भी अवस्था में उनकी अघन्यता स्वीकार करती थी।

शस्त्र छोड़े हुए अथवा युद्ध से विरत धूर्त और भयंकर शत्रु पर भी शस्त्र प्रहार न करने अथवा शरणागत होने प उसे क्षमा कर देने जैसे हिंदुओं में अनेक उदात्त गुण थे, किंतु कई कठिन अवसरों पर ये गुण भी उनके नाश के कारण बन गए। तुर्क आक्रमणों के लिए इन नीतियों का कोई मूल्य नहीं था। उन्होंने हिंदुओं के इन नैतिक गुणों का भी लाभ उठाया, जिनके सम्मुख उपर्युक्त प्रकार के आचरण नीति नहीं अपितु दुर्नीति ही साबित हुए। इस प्रकार का एक उदाहरण यहाँ अनुप्रयुक्त न होगा। मुल्तान के अरब- शासकों की चर्चा करता हुआ अल्-मसूदी (914-916) कहता है कि “वहाँ उन्होंने सब मंदिर गिरा दिए केवल एक छोड़ रखा, जिसकी मूर्ति की पूजा के लिए प्रतिवर्ष अनगिनत हिंदू तीर्थयात्री जाते थे और उस पर इतनी अधिक धन-संपत्ति चढ़ाते थे कि वहाँ के मुसलमान शासक का बहुत बड़ा खर्च उससे चल जाता था।"

यही नहीं, जब वे मुल्तान पर प्रतिहार राजाओं के नेतृत्व में हिंदू प्रतिरोधियों के आक्रमण की आशंका करते थे तो उस मूर्ति को तोड़ देने की धमकी देकर उन्हें चढ़ाई से विरत कर देते और अपने को बचाते थे। यदि पृथ्वीराजरासो के इस कथन को अतिरंजित भी माना जाय कि तृतीय पृथ्वीराज मुहम्मद गोरी को अपनी अंतिम पराजय के पूर्व सात बार हराकर छोड़ चुका था तो भी वह निर्विवाद है कि तराइन की पहली लड़ाई में वह विजयी हुआ था। उसे चाहिए था कि भारत से भागते हुए उस आक्रमणकारी को घेरकर सदा के लिए तुर्क विभीषिका को समाप्त कर दे किंतु उसने ऐसा नहीं किया और उसकी गलती का परिणाम उसे ही नहीं बल्कि भारत को भी दीर्घकाल तक भोगना पड़ा।