इतिहास में अदृश्य महिलाएं एवं आंदोलन - Invisible women and movements in history
इतिहास में अदृश्य महिलाएं एवं आंदोलन - Invisible women and movements in history
अठरहवी सदी के अंत एवं बीसवीं सदी की शुरुआत में अनेक महिला आंदोलन हुए। पर उन आंदोलनों का कोई इतिहास नहीं मिलता। यही वह क्षण है, जब स्त्री आंदोलन व देश में हुए आंदोलन का पुर्नमूल्यांकन जरुरी है ताकि मुक्ति की सामाजिक परंपरा में एक नया अध्याय जोड़ा जा सके "आधा आसमान हमारा, आधी धरती हमारी, आधा इतिहास हमारा" यह युक्ति आज भी प्रासंगिक लेकिन इतिहास में महिलाओं ने अनेक आंदोलन किये और लड़ाइयाँ लड़ी लेकिन इतिहास के पन्नो में गिनी- चुनी महिलाओं को छोड़कर अन्य महिलाओं के योगदान पर प्रकाश नहीं डाला गया। देश का शायद ही कोई ऐसा कोना होगा जहां महिलाओं ने अपना योगदान, समर्पण, बलिदान न दिया हो।
मुंबई में 1904 में प्रथम अखिल भारतीय महिला परिषद की स्थापना की गयी। इस परिषद की अध्यक्ष श्रीमति रमाबाई रानाडे थीं। यह अपनी तरह का पहला अधिवेशन था, जिसमे सभी जाति, वर्ग, धर्म की महिलाएं एक मंच पर आयीं। उन्होंने महसूस किया कि सभी महिलाओं की स्थिति एक समान है। और उन्हें मिल कर उन समस्याओं पर कार्य करना चाहिए। हालांकि सम्मेलन में संपन्न घरों की कुछ महिलाएं ही एकत्र हुई थीं, लेकिन इसका व्यापक महत्व था क्योंकि भारत में एकत्रित होकर महिलाएं पहली बार मंच पर आयी थीं। 1905 के राष्ट्रीय आंदोलन में पहली बार महिलाओं ने हिस्सा लिया। इनमें अनियादेवी देवी और नृत्यमीदेवी का नाम महत्वपूर्ण है।
कांग्रेस के मंच से सरलादेवी चौधरानी ने वंदे मातरम गीत पहली बार गया, जो बाद में आंदोलनकारियों का राष्ट्रीय गीत बना। 1907 में स्टेटगार्ड में अंतर्राष्ट्रीय समाजवादी परिषद में भीकाजी कामा ने भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए वहां तिरंगा झंडा लहराया। उसी समय इंग्लैंड में जीवन बिता रहीं सरोजनी नायडू गांधी जी से प्रेरित होकर भारत आई और आजादी की जंग में कूद पड़ी इस दौरान यह भी निर्णय लिया गया कि आजादी की जंग में महिलाएं और पुरुष मिल कर लड़ेंगे। 1907 में विरूवाली नामक लड़की अपने भाई से मिलने रावलपिंडी जा रही थी तभी वेटिंग रूम में अंग्रेज़ सार्जेंट ने उसका बलात्कार कर दिया जिसपर कोर्ट ने कार्यवाही करते हुए अंग्रेज़ सार्जेंट को बरी कर दिया। इस घटना से विरूवाली ने आत्महत्या कर ली।
वही दूसरी घटना में बंगाल की स्नेह लता का विवाह उम्र बढ़ने से ना हो पाने की वजह से स्नेहलता लोगों के कटाक्ष सुनकर अपने को जला के मार डाला। इन दोनों घटनाओं ने महिलाओं को एकजुट होने और मिलकर महिलाओं के ऊपर होने वाले शोषण के प्रति लड़ने में संवेदित किया।
महिलाओं ने 1917 में महात्मा गांधी के आगमन के बाद पर्दा प्रथा, बाल विवाह, सती प्रथा, शिक्षा जैसे सवालों के साथ-साथ असहयोग, स्वदेशी, खिलाफत और खादी के आंदोलन में महिलाओं ने जमकर हिस्सा लिया।
आजादी के आंदोलन में गांधी जीने कहा था "स्वराज प्राप्त करने में जितना योगदान पुरुषों का है, उतना योगदान महिलाओं का उनके प्रयासों से पर्दे मे रहनेवाली औरते, अनपढ़ कही जाने वाली औरते, पढ़ी-लिखी औरते, खेतों में काम करने वाली औरते सभी आंदोलन का हिस्सा बनीं। उनके आंदोलन का हिस्सा बनते ही आंदोलनकारियों की संख्या बढ़ गयी जो पहले नहीं होता था। गांधी जी एवं अन्य नेता जानते थे कि आधी जनसंख्या को अनदेखा नहीं किया जा सकता है। इसलिए उन्होने महिलाओं को अहिंसक तरीके से चलाये जा रहे आंदोलनों में शामिल किया। इस आंदोलन में महिलाओं ने सूत कातने, प्रभात फेरिया निकालने, देश भक्ति गीत गाने एवं प्रचार-प्रसार करने, विदेशी कपड़ों एवं शराब का प्रतिशोध करने में महति भूमिका का निर्वहन किया,
उन्होने अपने गहने एवं पैसे कांग्रेस को चंदे में दिये। इस आंदोलन के कारण महिलाओं को अपने परिवार एवं समाज का विरोध भी झेलना पड़ा। वे चरखे के कपड़े बेच कर पैसा आजादी के प्रचार-प्रसार में लगातीं, इन औरतों ने पुलिस की मार खाई, जेल गयीं। नमक सत्याग्रह में कुल 80,000 लोग गिरफ्तार हुए थे, जिसमें 17,000 महिलाएं थीं। महिलाओं के इस अतुलनीय कार्यों का परिणाम है कि आज हम आजाद है जिसे हमें नहीं भूलना चाहिए। 1912 में पटना में राममोहन राय सेमिनरी में महिला सम्मेलन का आयोजन किया गया। श्रीमती मधोलकर ने इसकी अध्यक्षता की। और बाल विवाह के खिलाफ समिति बनाने का सुझाव दिया। 1928 में महिलाओं ने साइमन कमिशन का जबरदस्त विरोध किया। बिहार में लेजिस्लेटिव कौंसिल में महिलाओं को वोट देने के अधिकार व लैंगिक भेदभाव को लेकर नवम्बर,
1921 को एक प्रस्ताव पेश किया गया। 1919 के एक्ट के अनुसार वे वोट नहीं दे सकती थीं। कौंसिल में इस मसले पर जमकर बहस हुई। और यह प्रस्ताव 10 वोटों से गिर गया। और कोलकाता में पेश महिलाओं के मताधिकार देने संबंधित प्रस्ताव भी भारी मतों से पराजित हो गया। पर महिलाएं हिम्मत नहीं हारीं। उनके संघर्ष जारी रहे। लंबी लड़ाई के बाद बिहार और उड़ीसा में 1929 में यह अधिकार महिलाओं को मिला।
अतीत में हुए संघर्ष को देखते हुए हम ये कह सकते हैं स्त्री के भीतर आजादी की आग है। और उसकी पहली लड़ाई है वर्चस्व विहीन समाज की स्थापना। यही वजह है
कि आज स्त्रियाँ परिवार में श्रम के विभाजन, पारवरिक संबंधों में उसकी उपस्थिति और सत्ता में उसकी जगह को लेकर आंदोलित हैं। सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक आंदोलन में स्त्रियों की भूमिका का भले ही आंकलन नहीं हुआ हो सच तो यह है कि सभी आंदोलनों में उसकी भागीदारी रही है। देश में 70 के दशक में जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में बड़ा आंदोलन हुआ। जिस आंदोलन ने सत्ता की नींव हिला दी। उसमें बड़ी संख्या में स्त्रियों हिस्सा लिया। कॉलेजों एवं स्कूलों से निकल कर निरंकुश सत्ता के खिलाफ वे सड़कों पर थीं। स्त्री जब भी किसी आंदोलन का हिस्सा होती है, तो वह एक साथ कई वर्जनाओं को तोड़ती है।
स्त्री आंदोलन को महत्वपूर्ण आयाम देने वाली सिमोन द बोवुआर कहतीं हैं ' मात्र वर्ग संघर्ष के द्वारा ही स्त्री-मुक्ति के महान लक्ष्य को हासिल नहीं किया जा सकता है। महिलाएं एक तरफ स्त्री के मसले पर लड़ रही थीं दूसरी तरफ देश में चले सभी प्रमुख आंदोलन में उसकी हिस्सेदारी रही। राजनीति में अपनी हिस्सेदारी से लेकर वह जल, जंगल और जमीन की लड़ाई में लगी रही और आज भी हर मोर्चे पर लड़ रही है। महिलाओं के द्वारा किए गए कार्यों, आंदोलनों एवं प्रयासों को पुरुषवादी इतिहासकार पुरुषों की तुलना में इतिहास के पन्नों में कमतर कर के आँका है जिसे उन्हें बेहतर करने की आवश्यकता है। आज औरत अपनी क्षमता और कौशल को और अधिक तराश रही है। वह इस अमानवीय परंपरा के विरुद्ध खड़ी है।
पूंजीवादी पितृसत्ता उपर से चाहे जिनती उदार और सरल लगे भीतर से बड़ी जटिल है। प्रभा खेतान कहती हैं कि' दोष इसकी संरचना में ही है। हमें इस संरचना से ही अलग होना होगा। इसके लिए स्त्री समूह की जरुरत है। उसे हर मोर्चे पर लड़ना होगा। दुनिया की आधी आबादी स्त्रियों की है, दुनिया में दो तिहाई काम औरतें करती हैं लेकिन दुनिया की सबसे गरीब कौम औरत ही है। ये औरत कौन है, जो लड़ रही है, जो जीने का हक मांग रही है जो जानती है अपमान सहती हुई शोषणग्रस्त आधी आबादी जब विद्रोह करेगी तो उसमें सच्ची आग और तड़प होगी। वह फूटती लरजती जहां-जहां बहेगी वही से इतिहास का नया अध्याय लिखा जायेगा। जो नारा कार्ल मार्क्स ने दुनिया के मजदूरों के लिए दिया था वह नारा उसके लिए है। वह कह रही है दुनिया की स्त्रियां एक हो तुम्हारे पास खोने के लिए कुछ नहीं है।
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