भारत में क्षत्रप - Kshatrapa in India
भारत में क्षत्रप - Kshatrapa in India
पुराणों के अध्ययन से ज्ञात होता है कि इस समय में उत्तरी भारत छोटे-छोटे राज्यों आर्यों और म्लेच्छों में बंटा था। उनमें संघर्ष हो रहा था। जैसा कि उपरोक्त विवरण से स्पष्ट होता है कि शुंगसातवाहन (आय) और शक-यवन-पह्नवों ( म्लेच्छों) में संघर्ष हो रहा था। इस संघर्ष में शक ही विजयी हुए और भारत के कई क्षेत्रों पर उनका अधिकार हो गया। जैसे तक्षशिला, मथुरा, महाराष्ट्र, उज्जयिनी इत्यादि उनके विविध राज्य केंद्र थे, जहाँ शक नरेशों के भारतीय प्रदेशों के शासक क्षत्रप कहे जाते थे। महाक्षत्रप (सम्राट) और क्षत्रप (युवराज) मिलकर शासन करते थे।
तक्षशिला के क्षत्रप
महाराज मावेज के 78 वें राज्य वर्ष के तक्षशिला ताम्र पत्र लेख में लियक कुसुलक और उसके पुत्र पतिक का उल्लेख मिलता है।
इस लेख में मावेज को 'महरयस महन्तस' की उपाधि दी गई है, जिससे उसका सार्वभौमत्व सिद्ध होता है। इसी से यह भी ज्ञात होता है कि लियक कुसुलक, पतिक शहर और चुक्ष (तक्षशिला के आस-पास ) क्षत्रप थे। इस प्रकार मावेज के राज्य काल में तक्षशिला के आस-पास उत्तरी पंजाब में क्षत्रप थे। मार्शल के अनुसार संभव है किचुक्ष की सैटूपी, सिंधु नदी के दोनों ओर विस्तृत थी, जिसमें पेशावर, हजारा, अष्टक और मियावाली के प्रांत (पश्चिमी पाकिस्तान) सम्मिलित थे।
एक ताम्रमुद्रा पर अभिसार प्रस्थ का भी उल्लेख मिलता है जहाँ शिवसेन क्षत्रप था। अभिसार प्रसिद्ध प्राचीन राज्य है और संभव है कि यहाँ भी इस पर्वतीय राज्य में एक अलग क्षत्रप नियुक्त किया गया था।
मथुरा के क्षत्रप
मध्य देश में अंतर्वेदी (गंगा-यमुना के बीच का दोआब भी शकों के अधिकार में चला गया था। सोडाश के मथुरा सिंह स्तंभ लेख से मथुरा के शक क्षत्रप के इतिहास पर विशेष प्रकाश पड़ता है। इस लेख में महाक्षत्रप राजुबुल और क्षत्रप सोडास का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। पहले राजुबुल महाक्षत्रप था और उसकी रानी अग्रमहिषी कहीं गई है। इस समय उसका पुत्र सोडास क्षत्रप था, परंतु आगे चलकर जैसा कि मथुरा लेख (राज्य वर्ष 72) से ज्ञात होता है, वह भी महाक्षत्रप हो गया था।
सिक्कों से खरोष्ठ नाम के अन्य क्षत्रप का भी उल्लेख मिलता है, जिसकी पहचान मथुरा सिंह स्तंभ में उल्लिखित युवराज खरोष्ठ से की गई है। इस प्रकार यह भी मथुरा का एक क्षत्रप था। संभवत: वह महाक्षत्रप राजुबुल का पुत्र था।
इस प्रकार ईसा की प्रथम शताब्दी के प्रारंभ में मथुरा के आस-पास का क्षेत्र शक क्षत्रप द्वारा शासित हो रहा था। कालांतर में यह भूखंड कुषाणों के अधिकार में चला गया।
पश्चिमी भारत के क्षत्रप
सिंध, काठियावाड़ और समीप के भू-भाग पर यवनों का अधिकार था। यवनों को हटाकर शकों ने उस स्थान पर अपना अधिकार कर लिया था। इसीलिए निचले सिंधु को शकस्थान का नाम दिया गया था। यहीं से शकों ने अपनी शक्ति सौराष्ट्र, काठियावाड़ और अन्य क्षेत्रों में भी स्थापित की थी। कालकाचार्य कथानक से प्रकट है कि सबसे पहेले उन्होंने काठियावाड़ पर अधिकार किया। सौराष्ट्र और दक्षिण गुजरात से उन्होंने उज्जयिनी पर आक्रमण कर राज्य स्थापित किया।
क्षहरात क्षत्रप भूमक
इस देश का सबसे प्रथम क्षत्रप भूमक था, जिसके तांबे के सिक्के (बाण, चक्र वज्र, सिंहध्वज और धर्मचक्र चिह्नों वाले) प्राप्त हुए हैं। इन सिक्कों पर प्राप्त लेखों- 'छहरात छत्रपस भूमकस' में की 'क्षहरात' कहा गया है। इससे सिद्ध होता है कि वह क्षहरात या खखरात वंश का शासक था।
महाक्षत्रप नहपान
भूमक का उत्तराधिकारी नहपान था। उसके राज्य-काल के कई अभिलेख और सिक्के प्राप्त हुए हैं। अभिलेखों में 41 से 46 तक की तिथियों ( शक संवत्) का उल्लेख हुआ है।
इस प्रकार उसका शासन काल संभवत: 119 ई. 125 ई. के आस-पास था। इसी समय सातवाहन सम्राट गौतमीपुत्र शातकर्णि दिग्विजय कर रहा था। उसके नासिक प्रशस्ति में बताया गया है कि उसने क्षहरात वंश का अंत कर दिया था।
नहपान के चांदी के सिक्के जोगलथम्बी (नासिक प्रांत) में ढेर में प्राप्त हुए हैं। इन सिक्कों के अधिकांश भाग को गौतमीपुत्र श्री शातकर्णि ने अपने राज्य में फिर से चलाया था। इससे स्पष्ट होता है कि गौतमीपुत्र शातकर्णि ने क्षहरातों का अंत कर उनके राज्य पर अधिकार कर लिया था।
नहपान और उसके दामाद उषवदात के लेखों से ज्ञात होता है कि यह शासन काल ब्राह्मण-संस्कृति का उन्नायक था।
एक नासिक लेख (वर्ष 19) में कहा गया है कि दीनीतपुत्र और क्षहरात क्षत्रप नहपान के जमाता उषवदात ने गो-दान, सुवर्ण दान, ब्राह्मण-दान के अतिरिक्त तीर्थों का भी निर्माण अथवा संस्कार कार्य किया था। इसी लेख में प्रसिद्ध प्राचीन प्रभास और पुष्कर तीर्थों का उल्लेख मिलता है साथ ही उसने कन्या- दान भी किए थे।
मालवा के क्षत्रप
मालवा के क्षत्रप का इतिहास उनके सिक्कों और लेखों से ज्ञात होता है। इस वंश ने पश्चिमी भारत पर कई पीढ़ियों तक राज्य किया। इस कुल का प्रथम शासक चस्टण था, जिसे उसके सिक्कों पर राजा यशोमतिक का पुत्र कहा गया है। अन्य सिक्कों पर उसे महाक्षत्रप भी कहा गया है। यह कर्दमक वंश का ही शासक था।
वार्तालाप में शामिल हों