कुषाण युग - Kushan Age
कुषाण युग - Kushan Age
बेग्राम (प्राचीन कपिश, जो अफ़गानिस्तान में है) की खुदाई से गोन्दोफनिर्स के बहुत से सिक्के प्राप्त हुए हैं। परंतु उसके उत्तराधिकारियों के सिक्के नहीं मिले हैं, जिससे सिद्ध होता है कि कपिशा और काबुल नदी की घाटी में पहवों की सत्ता समाप्त हो चुकी थी और एक नए राज्य का उदय हो चुका था। पंजार शिलालेख ( 64 ई.) से ज्ञात होता है कि पेशावर प्रांत में कुषाणों ने अपना राज्य स्थापित कर लिया था। चीन के ऐतिहासिक विवरणों से ज्ञात होता है कि कुषाण राजा कैडफाइसिस (प्रथम) ने पार्थिया पर आक्रमण किया और काबुल तथा कश्मीर पर अधिकार कर लिया। इस प्रकार यह सिद्ध होता है कि 64 ईसवी के पहले सिंधु नदी की घाटी में कैडफाइसिस (प्रथम) शासन कर रहा था।
कैडफाइसिस (प्रथम) नामक कुषाण राजा के उदय से इतिहास में एक नए युग का प्रारंभ होता है, जिसे 'कुषाण युग' कहा गया है।
कुषाण युग का महत्व
भारतीय इतिहास में कुषाण युग का विशेष महत्व है। मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद उत्तरी भारत में पहली बार एक ऐसा साम्राज्य बना, जिसमें पूर्व देश, मध्य देश और उत्तरापथ के अतिरिक्त हिंदुकुश की पहाड़ियों के उस पार मध्य एशिया के भू-भाग भी सम्मिलित थे। इससे भारत पुनः विदेशों के संपर्क में आया और इस युग में भारतीय संस्कृति और विचार प्राकृतिक सीमाओं को पार कर सुदूर देशों में भी • फैले। बौद्ध महायान धर्म के उदय और विस्तार से मथुरा और गांधार कला प्रस्फुटित हुई।
गांधार कला ने भी अपने रूप-शिल्प से मध्य एशिया की पहाड़ियों को भी एक अभिमंडित स्वरूप प्रदान किया जहाँ शिलाखंडों पर बुद्ध और उनकी लीलाओं का चित्रांकन किया गया है। इसी युग में संस्कृत के संपर्क और सहयोग से बौद्ध संस्कृति अधिक समृद्ध हुई। प्रसिद्ध ब्राह्मण और वैदिक विद्वान अश्वघोष कालांतर में बुद्ध भक्त बना। उसका 'बुद्धचरित' प्रथित संस्कृत काव्य है। आयुर्वेद के क्षेत्र में भी चरक और सुश्रुत प्रसिद्ध हैं। बौद्ध साहित्य में यदि हम इस युग को 'संस्कृत अवदानों का युग कहें तो अतिशयोक्ति न होगी। दिव्यावदान, ललितविस्तार, महावस्तु आदि अत्यंत प्रसिद्ध ग्रंथ हैं, जिनमें तत्कालीन जीवन का सुचित्रण हुआ है।
यूचियों का अभियान
चीन के उत्तर पश्चिम स्थित कांसू प्रांत में यूची और हूँग नू नाम की दो जातियाँ रहती थीं।
वे घुमक्कड़ जातियाँ अपने पशुओं के साथ एक स्थान से दूसरे स्थान को घूमती-फिरती रहती थीं। 165 ई. पूर्व के आस-पास हूँग नू ने यू-ची जाति को पराजित कर अपने देश (कांसू प्रांत को छोड़ने के लिए विवश किया। पश्चिम की ओर घूमते हुए गोबी के निकट वू सुन जाति से मुठभेड़ हुई। यू-ची लोग वू सुन का वध कर आगे बढे, क्योंकि उनका देश यथेष्ट उपयोगी न था। आगे बढ़कर शकों को पराजित कर उनके देश पर अधिकार कर लिया। अतएव पराजित शक भारत की ओर चल पड़े। यू-ची शकों के देश में कुछ समय रहने के बाद वहाँ ही उन्हें फिर हँग नू जाति से पराजित होना पड़ा। हँग नू जाति ने मृत वू सुन के पुत्र का पक्ष लेकर इन्हें शक देश छोड़ने को विवश किया।
अब यू-ची शक देश छोड़कर आगे बढ़े और आक्सस (वक्षु) नदी के तट पर पहुँच कर बस गए। कालांतर में इस जाति का घुमक्कड़ी स्वभाव जाता रहा। वे पाँच शाखाओं राज्यों में विभक्त होकर वहीं बस गए। बैक्ट्रिया और सोडियना (बोखारा राज्य ) भी इनके अधिकार में था। इनमें एक शाखा राज्य का नाम कोशांग (कुशन) था, जिसके प्रधान कैडफाइसिस प्रथम ने शेष चारों राज्यों पर अधिकार स्थापित किया। इसी ने भारत में कुषाण राज्य की स्थापना की।
इस प्रकार स्पष्ट है कि यू-ची जाति जिसने कुषाण के राज्य को स्थापित किया, मध्य एशिया से आयी थी और इसका तुर्किस्तान तथा तुखार देश से स्पष्ट संबंध था।
इसीलिए पुराणों में इनको तुरुष्क (तुर्क) और तुखार (टोखारियन) कहा गया है। कल्हण की राजतरंगिणी में भी इन्हें तुरुष्कवंशी कहा गया है। राजतरंगिणी में कल्हण ने बताया है कि वे तुरुष्कवंशी होते हुए भी धार्मिक राजा थे और उन्होंने मठों तथा चैत्यादिकों का निर्माण कराया।
उनके राज्यकाल में कश्मीर में बौद्ध धर्म की भी उन्नति हुई। कल्हण के विचार पूर्णतः इतिहास सम्मत होते हुए भी आधुनिक इतिहासकारों द्वारा उपेक्षित रहे हैं। निश्चयतः तुरुष्क, म्लेच्छ और अधार्मिक तथा अच्छे घुड़सवार और युद्ध से मुँह न मोड़ने वाले लड़ाकू थे।
किंतु इतिहास से स्पष्ट है कि केजुल कैडफाइसिस, वीम कैडफाइसिस, कनिष्क, हुविष्क आदि धार्मिक सम्राट थे जैसा कि उनके सिक्कों और अभिलेखों से सिद्ध होता है। राजतरंगिणी, तुखारों को कम्बोज देश के पास ही स्थित बताती है और स्टाइन इनको यूचियों से संबंधित बताते हैं।
कुजुल कैडफ़ाइसिस कैडफ़ाइसिस प्रथम
इस शासक ने कुषाण राज्य की नींव डाली थी। वह एक विजेता था, जिसने अपनी विजयों द्वारा हिंदुकुश पर्वत को पार कर पूर्व की ओर (कश्मीर या काफिस्तान) काबुल पर अपना अधिकार स्थापित
किया। संपूर्ण अफगानिस्तान उसके अधिकार में था। उसके तांबे के सिक्के मिले हैं जिनसे ऐसा ज्ञात होता है कि काबुल नदी की घाटी में अंतिम यवन शासक हर्मेयस को पराजित कर उसने वहाँ अपना अधिकार किया था। सिक्कों से ही ज्ञात होता है कि वह एक धार्मिक सम्राट था और संभवत: वह बौद्ध धर्मानुयायी था ।
विमा कैडफाइसिस / कैडफाइसिस द्वितीय
अस्सी वर्ष की आयु में कुजुल कैडफाइसिस की मृत्यु हो गई और उसका पुत्र विमा कैडफाइसिस / कैडसाइसिस द्वितीय गद्दी पर बैठा। यह भी एक विजेता और आदर्शवादी धार्मिक सम्राट था,
जिसने अपने पैतृक राज्य को विस्तारित कर साम्राज्य का स्वरूप दिया। उसके समय में रोम राज्य से भी भारत का व्यापारिक संबंध बना। भारत का माल वहाँ पहुँचने लगा और रोम से सोना यहाँ आने लगा। रोम की सुवर्ण मुद्राओं का प्रचार भारत में हुआ तथा कैडफाइसिस द्वितीय ने रोमन सिक्कों (डिनेरियस ऑरियस) के समान तौल वाले सोने के सिक्के भारत में भी चलाए। इन सुवर्ण मुद्राओं पर ही शिव को नंदी के साथ खड़ा हुआ पाते हैं। वह कुशल शासक था एवं शैव था।
कनिष्क (प्रथम)
संभवतः कनिष्क ने गांधार की विजय अपने पिता के राज्यत्व काल में की थी जैसा कि मार्शल का मत है। स्मिथ के अनुसार, "कैडफाइसिस द्वितीय का राज्य अफगानिस्तान, पंजाब और पूर्व में गंगा और बनारस तक फैला हुआ था।
कुषाण वंश का सर्वश्रेष्ठ सम्राट कनिष्क प्रथम था जो कैडफाइसिस द्वितीय के बाद सम्राट हुआ।"
फिर भी चीनी ऐतिहासिक विवरणों, अभिलेखों और सिक्कों के आधार पर उसके राज्य-काल का अध्ययन करना उचित है। उसके राज्यकाल के कई अभिलेख तथा सोने और ताँबे के सिक्के उपलब्ध हैं। सभी लिपियों के राज्य वर्षों में उसका उल्लेख है, परंतु यह निश्चित नहीं है कि वह किस संवत् की हैं। अतः प्रथमतः कनिष्क का समय जानना आवश्यक है। कनिष्क और उसके उत्तराधिकारियों के बहुत से अभिलेख प्राप्त हैं, परंतु जैसा स्पष्ट है कि उनकी तिथियाँ इस प्रकार से दी गई हैं कि उनके भिन्न-भिन्न अर्थ लगाए गए हैं। निम्नलिखित कुषाण अभिलेख विभिन्न तिथियों में प्राप्त हुए हैं-
(प्रथम) कनिष्क के लेख राज्य
वर्ष 1 से 23 तक
वासिष्क
हुविष्क
24 से 28 तक
28 से 60 तक
(द्वितीय) कनिष्क (आरा लेख)
41
वासुदेव
67 से 98 तक
इन तिथियों के क्रमिक चढ़ाव से न केवल कुषाण साम्राज्य का विकास परिलक्षित होता है, अपितु इनसे कनिष्क (प्रथम) से किसी विशेष संवत् का प्रचलन भी प्रतीत होता है। इतिहासकारों के समक्ष यह समस्या है कि यह संवत् कौन-सा था? अधिकांश विद्वान कनिष्क को (78 ई. से प्रारंभ होने वाला) शक संवत् का चलाने वाला मानते हैं। कनिष्क की तिथि संबंधी मतों का विवेचन करने से स्पष्ट होता है कि सर्वमान्य संवत् शक संवत् ही है जिसे कनिष्क का संवत् माना गया है।
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